सेहत को लेकर हम कितने गंभीर हैं?

सेहत को लेकर हम कितने गंभीर हैं?7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है।

लखनऊ । दुनियाभर में 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। बेहतर स्वास्थ्य, पोषक आहार और स्वस्थ जीवनचर्या जैसे विषयों पर लोग अपनी अपनी बातें रखेंगे, स्वास्थ्य से जुड़े अनेक कार्यक्रमों का संपादन भी जगह-जगह पर होगा। मैं सोचता हूं स्वस्थ रहने का मूल मंत्र ग्रामीण और वनांचलों में रहने वाले लोगों से मिल सकता है।

अनियंत्रित खाद्य शैली, रफ्तार भरी जीवन चर्या, पाश्चात्य भोज्य पदार्थों जिन्हें फास्ट फूड कहा जाता है, और आधुनिक समाज में तेजी से फैलता पिज्ज़ा कल्चर ने शहरी लोगों ‘बाहरी तौर’ से स्वस्थ महसूस कराया है लेकिन भीतर ही भीतर इस तरह की जीवनशैली से जीने वाले लोग कुपोषण से ग्रस्त हैं।

तथाकथित रूप से ‘मार्डन’ और ‘पाश्चात्य भोजन शैली’ के हम जैसे लोगों की औसत जीवन आयु 60 से 65 वर्ष है वहीं ग्रामीण और वनांचलों में रह रहे निवासियों की 80 से 85 वर्ष। आखिर ज्यादा विकसित और स्वस्थ कौन हुआ? हम या वो, जो आज भी वनवासी या आदिवासी कहलाते हैं। ज्यादा विकसित होने और पैसा कमाने की दौड़ में हमने अपने और अपने परिवार के लालन-पालन में पोषक तत्वों को कहीं खो दिया है।

आहार के नाम पर कृत्रिम रंगों से सजी सब्जियां और पाश्चात्य ‘फास्ट फूड’ का आगमन हमारी सेहत की बर्बादी के लिए किसी झनझनाते अलार्म से कम नहीं है। हमारी दैनिक जीवनचर्या इतनी रफ्तारमय हो चुकी है कि हम अपनी सेहत को लेकर बिल्कुल लापरवाह हो चुके हैं। कुछ लोग सचेत हैं, वे अपनी बॉयोलॉजीकल क्लॉक को संतुलित किए हुए हैं और कुछ ऐसे भी लोग हैं जो सुबह जॉगिंग पर जाते हैं, खान-पान पर ध्यान भी रखते हैं लेकिन मोबाइल और कंप्यूटर टेक्नोलॉजी ने उनकी बैंड बजा दी है।

अपने मोहल्ले के आस-पास सुबह घूमने जाइये तो कुछ लोग कानों में मोबाइल चिपकाकर बतियाते हुए पैदल चलते दिखाई देंगे, तो कुछ संगीत की धुनों पर दौड़ लगाते दिख जाते हैं। क्या हम अपने दैनिक जीवन के 2 घंटे मोबाइल, लैपटॉप से दूर रहकर नहीं बिता सकते? आप अपनी सेहत को लेकर चिंतित और जागरूक हैं, सुबह घूमने निकले हैं और साथ में मोबाइल फोन कानों से सटा हुआ है तो मान लीजिए कि आप बेजा लापरवाह भी हैं। जो देश युवा शक्ति के सहारे विश्वपटल पर अपना पताका लहरा रहा है, उसी देश का युवा 30-35 की उम्र आते तक बूढ़ा भी हो जाएगा। फेसबुक, ट्विटर और अन्य सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म ने इन्हें पंगु जो बना दिया है।

अहमदाबाद में आंबावाड़ी में मेरे घर के नजदीक नेचर लवर्स पार्क है। सरकार, गैर-सरकारी संस्थान और स्थानीय लोगों के सामूहिक प्रयास से इस पार्क को बिल्कुल जंगल की तरह तैयार किया गया है। आधे किमी के दायरे में बने इस पार्क में 100 से ज्यादा वृक्षों की प्रजातियां देखी जा सकती हैं। यहां मोर, गिलहरी, चील, बंदर, तितलियां और रंग-बिरंगे फूलों से लदी शाक-झाड़ियां, वृक्ष आदि जैवविविधता संरक्षण की अनोखी मिसाल पेश करते हैं। किसी भी बड़े शहर में इतने छोटे से इलाके में वृक्षों की इतनी सारी प्रजातियां मैंने आज तक नहीं देखी हैं। यहां आकर मैं खुद को प्रकृति की गोद में पाता हूं। इतना जबर्दस्त पार्क और उसका रखरखाव स्थानीय लोगों की सहभागिता के बगैर संभव नहीं।

एक बुजुर्ग ने एक दिन बताया कि इस पार्क के बनने की शुरुआत से ही लोग मिलजुलकर इसे जंगल का स्वरूप देने लगे। ये वही लोग थे जो कांक्रीट के जंगलों से त्रस्त हो चुके थे। अपनी और आने वाली पीढ़ी की बेहतर सेहत के लिए वनों का बना रहना जरूरी है, इसी सोच के साथ कंक्रीट के जंगलों के बीच लोगों ने एक असल जंगल तैयार कर दिया। यहां सप्ताह में दो से तीन दिन जानकार लोग पोषण और स्वस्थ जीवन के पाठ पढ़ाते हैं, यहां प्रतिदिन आकर मुझे एक नई ऊर्जा मिलती है।

कितनी अजीब बात है ना, दुनियाभर में मेडिकल कॉलेजों की संख्या हजारों होंगी लेकिन पोषण और स्वस्थ जीवन की शिक्षा देने वाले कॉलेजों की संख्या 100 भी नहीं। लोग ‘बीमारों के लिए मेडिसिन’ की पढ़ाई करना पसंद कर रहे हैं लेकिन ऐसे कितने लोग हैं जो ‘स्वस्थ जीवन के लिए स्वस्थ खान-पान’ पढ़ना पसंद करते हैं? क्या कभी आप अपनी सेहत की फिक्रमंदी के चलते 7 दिनों के लिए फेसबुक, ट्वीटर या कंम्प्यूटर पर अपनी उपस्थिती शून्य या बिलकुल कम कर सकते हैं?

(लेखक गाँव कनेक्शन के कंसल्टिंग एडिटर हैं और हर्बल जानकार व वैज्ञानिक भी।)

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