इन गुणोत्तर करों के बीच अधिकार भी हों  

इन गुणोत्तर करों के बीच अधिकार भी हों   नोटबंदी ने अनौपचारिक क्षेत्र को धराशाई कर दिया।

सामाजिक व कई वैचारिक पटलों हो रही बहसों में प्रायः जनापेक्षा एवं राज्य के प्रयासों के बीच एक गैप देखने को मिलता है, जिसे लेकर आम नागरिक दबावों और संशयों के साथ-साथ कुछ हद तक प्रतिक्रियात्मक मनोदशा के साथ दिखता है। एक आम नागरिक की अभिव्यक्ति कुछ इस प्रकार होती है-एक वेतन से कितने और कितनी बार टैक्स।

आम जरूरत की चीजें खरीदे तो टैक्स, गाड़ी खरीदें तो टैक्स, सड़क पर चलें तो टैक्स, घर खरीदें तो टैक्स, बाहर खाना खाएं तो टैक्स, राशन खरीदें तो टैक्स, दवाई खरीदें तो टैक्स, कहीं फीस, कहीं बिल, कहीं ब्याज, कहीं सेवा न जाने कितने तरह के टैक्स, इसके बाद कुछ सेविंग की तो टैक्स दिया।

सारी उम्र काम करने के बाद कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं, पेंशन नहीं, स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी अधिकार नहीं, अच्छे सार्वजनिक स्कूल नहीं, अच्छा पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं, सड़कें खराब, हवा खराब, पानी खराब, फल सब्जी जहरीली, हास्पिटल मंहगे, आपदाओं से निपटने की अच्छी व्यवस्था नहीं, आदि। फिर टैक्स का पैसा गया कहां?

इसी क्रम यह उत्तर दिया गया है कि करप्शन एवं इलेक्शन में। इस जनशिकायत का प्रतिनिधित्व करने वाली भावाभिव्यक्ति से किसी को भी सिद्धांततः तो ऐतराज नहीं होना चाहिए क्योंकि यह शिकायत न तो आधारहीन है और न ही तथ्यहीन।

‘बहुकर प्रणाली’ और ‘कर के ऊपर कर’ किसी भी देश के नागरिकों पर दबाव जो डालती ही है जिससे वह उत्पीड़ित महसूस करता है, खासकर तब और, जब उसे सामाजिक सुरक्षा एवं सार्वजनिक सेवाओं का अधिकार हासिल न हो। क्या इस बात से सहमत हुआ जा सकता है कि राज्य टैक्स के बदले सामाजिक सुरक्षा, सामुदायिक सेवा और आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं का सृजन नहीं करता अथवा आम नागरिक तक उसकी पहुंच सुनिश्चित कराने का प्रयास नहीं करता या वह अब तक इसमें पूरी तरह से असफल रहा है?

इस विषय पर यदि सापेक्ष-निरपेक्ष आकलन हो तब काफी हद ऊचित निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकेगा। इससे पहले एक प्रश्न और भी है, क्या राज्य आवश्यक सामाजिक व मानवीय सेवाएं उपलब्ध कराने में पूरी तरह से असफल रहा है? यदि भारत का नागरिक इनके लिए कतारों में खड़ा है तो क्या इसके लिए सिर्फ राज्य/सरकार ही दोषी है? क्या किसी लोकतंत्र को आगे बढ़ाने के लिए सिर्फ राज्य ही उत्तरदायी होता है, नागरिकों को का कोई दायित्व नहीं होता?

यदि गाँवों के सरकारी स्कूल बूचड़खाने जैसे हो गए हैं और माध्यमिक व इण्टरमीडिएट कॉलेजों की इमारतें अंदर खींचने की बजाय बच्चों को बाहर की ओर धकेलती हुई दिखती हैं, तो क्या उसके प्रबंधन, प्राध्यापक, लोकल बॉडीज आदि दोषी नहीं हैं? क्या भारत का नागरिक उस उच्चस्तरीय दायित्वबोध से सम्पन्न है, जो मानवीय, सामाजिक, सार्वजनिक एवं राज्यिक दायित्व के लिए उसे स्वतःस्फूर्त करे?

आज के दौर में ‘कोर सब्जेक्ट’ ‘कोर इश्यूज’ और ‘कोर प्राब्लम्स’ क्या हैं, कहां है, स्पष्ट नहीं हो पाता। यही कारण है विषय जल्दी-जल्दी बदलते रहते हैं और विज्ञापनों के जरिए जनता को अपनी उपलब्धियां बताने के लिए राजनीतिक नाटकों को मंचन किया जाता है। लोकतंत्र में यदि विकास के पैमाने विज्ञापन के जरिए स्थापित हो रहे हैं तो यह शर्मसार करने वाली बात है।

विकास की इन धाराओं का अंश प्रायः पूंजीवादियों की ओर ही जाता है आम जनता की ओर नहीं। क्या इस विषय पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है कि उच्च कराधान, शिथिल रेग्युलेशंस तथा शार्ट टर्म गेन जैसे मार्गदर्शी सिद्धांत समाजों में असमानताओं को तेजी से हवा दे रहे हैं। सरकारें बड़ी नामी गिरामी योजनाएं लाकर देश के नागरिकों को प्रत्येक स्थिति में यह बताते हुए स्वीकार कराना चाहती हैं, कि यही वह उपाय/नीति है जिसके जरिए न स्वर्णयुग तो संक्षिप्त स्वर्ण युग अवश्य आ जाएगा।

उदाहरण के रूप में केन्द्र सरकार द्वारा अपनाई गई नोटबंदी को लिया जा सकता है, जिसके जरिए भारत के गरीबों को यह स्वप्न दिखाया गया कि इससे सरकार के कोष में इतना धन आ जाएगा कि उनकी गरीबी, बेरोजगारी....सब दूर हो जाएगी धैर्य रखें। तमाम अर्थशास्त्रियों ने इसे लेकर जो भी शंकाएं जाहिर कीं उन्हें तर्कहीन आधारों के जरिए नेपथ्य की ओर धकेल दिया गया। पर क्या वही परिणाम आए, जिनका सपना गरीबी में जगाया गया था? क्या भ्रष्टाचार दूर हो गया?

सच तो यह है कि नोटबंदी ने अनौपचारिक क्षेत्र को धराशाई कर दिया। भारतीय अर्थव्यवस्था में अनौपचारिक क्षेत्र लगभग 35 से 40 प्रतिशत हिस्से को कवर करता है और कृषि के बाद सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार प्रदान करता है। क्या सरकार के पास इस बात की पर्याप्त व यथार्थ जानकारी है कि अनौपचारिक क्षेत्र को कितना नुकसान पहुंचा और उससे कितने बेरोजगार हुए।

फिलहाल तो इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आर्थिक विकास की दर घटकर 6.1 प्रतिशत पर आ गई है (वह भी तब, जब जीडीपी की गणना का आधार वर्ष बदला गया है, ग्रास वैल्यू एडेड के आधार पर इसका आकलन किया गया है और ऐसा करते समय डिफ्लेटर्स का प्रयोग सीएसओ ने कुछ इस तरह से किया है कि विकास दर बढ़ी हुई दर्ज हो) पिछले तीन वर्षों में तो उससे पहले के एक दशक के मुकाबले कहीं ज्यादा ‘जाबलेस ग्रोथ’ दी है जबकि युवाओं ने बीजेपी नीत राजग को इस उम्मीद से जिताया था कि वह 2004-14 के दशक में बेरोजगारी का श्राप झेल रहे युवाओं को श्राप मुक्त करेगी।

आज भी भारत में स्कूल की पढ़ाई करने वाले 9 में से 1 छात्र ही कॉलेज पहुंच पाता है। यही नहीं नामांकन अनुपात भी बेहद कम है (अमेरिका के 83 प्रतिशत के मुकाबले 11)। इसका उत्तरदायी कारण आर्थिक और सामाजिक साथ-साथ नामांकन के लिए अच्छे कालेजों में स्थानों की कमी और रोजगार की कम संभावनाएं हैं।

अब यदि भारत 11 प्रतिशत से 15 प्रतिशत तक नामांकन को ले जाना चाहता है तो उसे तत्काल 2,26,410 करोड़ रुपए का निवेश करना होगा जबकि अभी भारत इस मामले में बहुत पीछे है। इस दिशा में आगे बढ़ने को सरकार या तो राजकोष पर दबाव बढ़ाए या पीपीपी मॉडल का प्रयोग यहां भी करे।

पहली स्थिति में सरकार की अन्य योजनाएं व कार्यक्रम प्रभावित होंगे। राजकोषीय घाटे में वृद्धि प्रोत्साहित होगी जो अंतर्राष्ट्रीय साख और सरकार की वित्तीय प्रबंधन की योग्यता के लिहाज से नकारात्मक होगा। ऐसे में पीपीपी मॉडल का चुनाव या विशुद्ध रूप से निजी पूंजी को प्रोत्साहित करने की जरूरत होगी, जिसके अपने जोखिम हैं।

आजादी के पहले 50 वर्षों में में सिर्फ 44 निजी संस्थाओं को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। पिछले 16 वर्षों में 69 और निजी विश्वविद्यालयों को मान्यता दी गई। लेकिन शिक्षा के निजीकरण ने शिक्षा का अर्थ परीक्षा, अंक प्राप्ति, प्रतिस्पर्धा तथा व्यवसाय जिन को व्यवसाय नहीं मिलता वह बेकारी की सेना में भर्ती हो रहे हैं।

नैसकॉम और मैकिन्से के शोध के अनुसार मानविकी में 10 में से एक और इंजीनियरिंग में डिग्री ले चुके चार में से एक भारतीय छात्र ही नौकरी पाने के योग्य हैं (पर्सपेक्टिव 2020)। इस दृष्टि से भारत के पास दुनिया की सबसे अधिक तकनीकी और वैज्ञानिक मानव शक्ति का जखीरा है, इस दावे की यहीं हवा निकल जाती है। राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद का शोध बताता है कि भारत के 90 फीसदी कॉलेजों और 70 फीसदी विश्वविद्यालयों का स्तर बहुत कमजोर है।

अब जरूरत है ‘रन ऑफ द मिल’ यानी बने बनाए ढर्रे पर स्नातक पैदा करने की प्रवृत्ति से छुटकारा पाने की। लेकिन इसे करेगा कौन ? सरकारें जो शिक्षा को कोई खास विज़न लेकर नहीं आतीं, अधिकारी जो स्वयं इसके लिए जिम्मेदार हैं या अध्यापक जिनका बहुत हद नैतिक पतन हो चुका है?

कमोबेश यही स्थिति स्वास्थ्य एवं अन्य आवश्यक सेवाओं के सम्बंध में देखी जा सकती है। इसलिए यदि जनभावनाओं में ऐसे प्रश्न उभरते हैं कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर से दबे जा रहे आम नागरिक को आखिर सेवा और रोजगार पाने का मौलिक अधिकार क्यों नहीं?

(लेखक राजनीतिक व आर्थिक िवषयों के जानकार हैं यह उनके निजी विचार हैं।)

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