एक तबका ऐसा भी, जो नोटबंदी की प्रक्रिया के बाद आए असर से अनछुआ है

एक तबका ऐसा भी, जो नोटबंदी की प्रक्रिया के बाद आए असर से अनछुआ हैहिंदुस्तान का एक तबका ऐसा भी है जो शायद नोटबंदी की प्रक्रिया के बाद आए असर से अनछुआ है।

पूरे भारत देश में नोटबंदी के बाद से हर तरफ एक ही चर्चा है कि आखिर सरकार का यह कदम उनके हित में है या उनके लिए नुकसान भरी एक बात। बात सोशल नेटवर्किंग की हो या चौराहे पर किसी पान की दुकान पर बात करते युवाओं का झुंड या सलून में आराम से दाढ़ी बनवाते हुए किसी व्यक्ति की बड़ी भारी सलाह, हर तरफ सिर्फ नोटबंदी की ही चर्चा हो रही है।

सरकार ने जब से 1000 और 500 के नोटों को बंद करने का ऐलान किया है, इस बात ने हजारों लाखों लोगों की नींद उड़ा रखी हैं और वहीं एक बड़ा तबका इसे सरकार का एक सकारात्मक कदम भी मान रहा हैं। कुल मिलाकर इस ऐलान के बाद हर एक आम नागरिक को जीवन में कम से कम एक बार ''अर्थशास्त्र'' जैसे विषय पर चर्चा करने का मौका जरूर मिल गया है और इसका परोक्ष या अपरोक्ष असर उनके आम जीवन पर भी जरूर पड़ा है, लेकिन हिंदुस्तान का एक तबका ऐसा भी है जो शायद नोटबंदी की प्रक्रिया के बाद आए असर से अनछुआ है। इसकी पहली मुख्य वजह उनकी अपनी आर्थिक माली हालत है और एक दूसरी मुख्य वजह उन लोगों का समाज की मुख्यधारा से जुड़ने में असफल होना भी है। कहीं ना कहीं बुराई के बीच यह एक अच्छाई भी है।

चलिए आपको ले चलता हूँ दक्षिण मध्य प्रदेश के सुदूर वनवासी क्षेत्र पातालकोट में, जहां ना तो नोटबंदी से पहले, ना ही नोट बंदी के बाद स्थानीय वनवासियों के जीवन में कोई फर्क आया है। छिंदवाड़ा जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर 79 स्क्वायर किलोमीटर में फैली पातालकोट एक विहंगम घाटी है जहां सैकड़ों सालों से गोंड और भारिया जनजाति के वनवासी अपना जीवन बसर कर रहे हैं। पातालकोट घाटी में करीब 12 गाँव और छोटे-छोटे करीब 16 कस्बें हैं। यकीन मानिये, 90 के शुरुआती दशक तक यहां के वनवासी सिर्फ नमक की खरीदी करने के लिए घाटी के बाहर लगने वाले साप्ताहिक बाजार पहुंचा करते थे क्योंकि इनके खानपान, रहन-सहन और आम जरूरतों का सामान और उनकी व्यवस्था इसी घाटी में हो जाया करती थी। ऋषि कुमार पातालकोट घाटी के एक गाँव चिमटीपुर के निवासी हैं।

करीब 45 साल के ऋषि कुमार अपनी यादों को कुरेदते हुए बताते हैं कि एक समय था जब यहाँ लोग हर्रा के पेड़ से फलों और पेड़ की छाल को चुनते, सुखाते और इनसे नमक तैयार करते थे। फिर एक दौर ऐसा भी आया जब किसी बाहरी व्यक्ति ने पातालकोट घाटी में प्रवेश किया और इन्हें नमक का स्वाद चखाया। चिमटीपुर से करीब 8 किलोमीटर की दूरी पर, घाटी के बाहर, 'छिंदी' एक छोटा सा गाँव है। मुख्य सड़क से जुड़े होने की वजह से व्यापार और व्यवहार की दृष्टि से आमतौर पर वनवासी हर गुरुवार को यहां छिंदी में लगने वाले साप्ताहिक हाट में खरीदी और बिक्री के लिए पहुंचने लगे। खरीदी के नाम पर नमक और कुछ मसाले जैसे लौंग, इलायची, दालचीनी, तेजपान और काली मिर्च आदि के लिए ये लोग बाजार पहुंचते और घाटी की वन संपदा जैसे हर्रा, बहेड़ा, आंवला, चारबीजी और स्थानीय फसलों जैसे मक्का, कोदो, कुटकी, मक्का आदि की बिक्री करते थे। इस तरह के व्यापार में किसी भी तरह से ज्यादा रकम उपयोग में नहीं आती थी। लोग अपनी गायों और भैंस को देकर दूसरों से खेती या उपजाऊ भूमि की खरीदी करते थे। यानी जमीन की कीमत 10 हजार या 20 हजार रूपये नहीं बल्कि 1 या 2 भैंस हुआ करती थी।

करीब 20 से 22 साल बीत चुके हैं और स्थानीय वनवासियों का जीवन जस का तस है। आज भी इन लोगों के लिए समृद्धि का तात्पर्य अच्छी सेहत और अच्छी फसल है। ये लोग अपनी फसलों के लिए पूरी तरह से मानसूनी वर्षा पर आश्रित हैं क्योंकि यहां की भौगोलिक स्थिति ही कुछ ऐसी है कि पहाड़ों से बहता पानी ठहर नहीं पाता है और ऐसे हालात में इन वनवासियों के पास सिर्फ मानसून ही एक समय होता है जब इन्हें अपनी फसलों की बुआई करनी होती है। फसल उत्पादन को सुरक्षित तरीकों संग्रहित भी करना एक चुनौती होती है। फसल उत्पादन के बाद बीजों के एक हिस्से को अगले वर्ष की फसल के लिए संभाल के रख लिया जाता है और बाकी बचे बीजों को दैनिक खानपान में इस्तेमाल में लाया जाता है।

किसी भी सूरत में इन्हें बीजों को खरीदने के लिए किसी मोनसेंटो जैसी कंपनी या बीज बेचने वाले दलालों के भरोसे नहीं रहना पड़ता है। इनके पास अपना पारंपरिक बीज बैंक होता है। और तो और, जरुरत पड़ने पर पड़ोसी या आजू- बाजू के गाँव के किसान लोगों को भी इन बीजों को निशुल्क दे दिया जाता है। मानसून और मानसून के बाद के छह महीनों तक वन संपदाओं और अपनी फसल के सहारे ये लोग अगले कई महीनों तक निश्चिन्त रहते हैं। एक बार हाट जाने पर इनका खर्चा ज्यादा से ज्यादा 200 से 300 रूपये होता है जो पूरे सप्ताह की कुछ खास जरूरतों की चीजों की खरीदी के लिए काफी होता है।

पातालकोट घाटी से चारों दिशाओं में कम से कम 25 किलोमीटर के बाद ही कोई एक बैंक की शाखा होगी या शायद एक एटीएम। ये लोग बैंकिंग व्यवस्था ना हो पाने की शिकायत करें भी तो क्यों? आखिर इन्हें इसकी खासी जरूरत भी नहीं। बीते महीनों में मोदी सरकार ने जनधन अकाउंट खुलवाने और श्रमिकों का वेतन सीधे उनके अकाउंट में डलवाने की व्यवस्था के लिए बैंकिंग सेवाएं लेने की अपील करी थी। जहां तक मेरा अनुभव है, पातालकोट जैसे इलाकों में ऐसी कई योजनाओं की हवा तक नहीं लगती, योजनाएं आती-जाती रहती हैं लेकिन समाज की मुख्यधारा से कटे ये लोग आज भी इन सब से बेखबर हैं। सच्चाई ये है कि घाटी से बाहर रहने वाले शहरी लोगों के लिए पातालकोट के ये लोग दीनहीन और जर्जर समझ पड़ते हैं। हम बाहरी लोग इन स्थानीय वनवासियों को विकसित करना चाहते हैं, इन्हें समाज की मुख्यधारा में जोड़ना चाहते हैं ताकि नोटबंदी जैसी व्यवस्थाओं से ये लोग भी परिचित हो जाएं फिर ये लोग भी किसी चौराहे पर खड़े होकर अपनी समस्याओं को लिए रोएं गाएं और ऐसे कई मुद्दों पर अपनी बात बेबात में राय देते रहें। इन्हें सुनेगा भी तो कौन?

शहरों ने गाँवों को निगल चुके हैं, शहरीकरण ने गाँव के युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित किया है और सुदूर ग्रामीण अंचलों से युवाओं ने पलायन करके किसी होटल में काम करना या किसी बड़े बिल्डर या ठेकेदार के साथ एक लेबर की तरह काम करना ज्यादा पसंद किया है।

चलिए अब बात करते हैं दक्षिण गुजरात के डांग जिले की जहां शत प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है। एक समय में हिंदुस्तान के सबसे पिछड़े 20 जिलों में से एक डांग के कई गाँव भी ऐसे उदाहरण है जहां पर नोटबंदी का ज्यादा खासा असर नहीं हुआ है। सुदूर इलाकों में बसे यहां के बाशिंदों को इतनी फुर्सत ही नहीं कि वे खुश रहने की इकलौती वजह करंसी को मान लें। सुबह जल्दी उठना, अपने चौपायों को चारागाह तक ले जाना, फिर वापस होना और भोजन-पान करके आराम करना और शाम को अपने कस्बे में नाच गाकर जिंदगी जी लेना, यहां के गामित और भील जनजाति के वनवासियों के लिए दैनिक क्रियाकलापों में से एक है। यहां पैसा कमाना जीवन का ध्येय नहीं बल्कि खुशनुमा माहौल में समाज में एक दूसरे का साथ देते हुए जिंदगी बसर करना इनके लिए सबसे बड़ी खुशी की बात होती है।

हनोथछोत गांव के युवा प्रवीण से बात करने पर साफ समझ आता है कि इस बस्ती के सभी लोग आर्थिक रुप से संपन्न नहीं है और यहां शायद ही किसी के पास 500 या 1000 का कोई नोट हो। प्रवीण के इस गांव में प्रवेश करते ही साफ समझ आता है कि यहां के लोग भले ही आर्थिक रुप से संपन्न नहीं है लेकिन इनकी समझ स्वच्छता के नाम पर हम शहरियों से कहीं ज्यादा है। गांव एक दम साफ सुधरा और बगैर किसी शोर-शराबे का दिखाई पड़ता है जैसे किसी पौराणिक या प्राचीन युग के विषय पर आधारित बॉलीवुड फिल्म का तैयार सेट। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की नोटबंदी वाली घोषणा और उसके बाद का असर इस गांव में भले ही ना दिख रहा हो लेकिन उनके स्वच्छता मिशन के लिए यह गांव ब्रांड एंबेसडर जरूर बन सकता है।

कालीबेल निवासी रमन भाई से बात करने पर जानकारी मिली कि उनके पास यदाकदा 500 का नोट आ जाए तो स्थानीय सहकारी बैंक में उसे जमा करा दिया करते थे। अब जबकि इस नोट को खारिज कर दिया गया है और नोटबंदी की घोषणा की जा चुकी है, तो उन्हें इस बात को लेकर किसी भी बात की फिक्र नहीं है। इनके सामान्य जीवन में इस नोटबंदी की प्रक्रिया के बाद किसी भी तरह का बदलाव नहीं आया है और उनका जीवन ठीक उसी तरह चल रहा है जैसा इस नोटबंदी के दौर से पहले था। ठीक इसी तरह का जीवन जिला मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर लिंगा गांव के विमल भाई और राजू भाई का भी बीत रहा है। इन्हें ना ही नोटबंदी से शिकायत है, ना ही ख़ुशी। इन्हें तो सरकार द्वारा लाए नए 2000 के नोट तक की कोई भी जानकारी नहीं। जिन्होंने अब तक बमुश्किल 500 के नोट देखें हैं उन्हें 2000 का नया नोट देखना नसीब होगा भी या नहीं, कहना मुश्किल है।

राजू भाई के घर में कुल 4 सदस्य हैं और इनके पास कुल 12 दुधारू पशु हैं। इनके परिवार और पशुओं का खानपान उनके खेतों के जरिए ही तैयार हो जाता है। एक साल में तैयार कुल अनाज की पैदावार को ये लोग बांस से बनी टोकरियों में संचित करके रख लेते हैं। जब जरूरत हो अनाज को इस में से निकाला जाता है और पकाकर खाया जाता है। गर्मियों के आते-आते खेत खलियान सूख चुके होते हैं और आसपास के जलस्रोतों में पानी की भारी किल्लत भी हो जाती है। इस स्थिति में राजू पूरे परिवार के साथ मिलकर नजदीकी पूर्णा नदी के किनारे पर अपना डेरा डाल लेते हैं क्योंकि इनके गांव में गर्मियों में परिवार के पीने लायक पानी की व्यवस्था तो होती है लेकिन इनके पशुओं के लिए पानी उपलब्ध नहीं होता है। पशुओं की जरूरत के हिसाब का पानी ना मिल पाने की दशा में वे अपने पूरे परिवार के साथ नदी के तट पर एक अस्थाई झोपड़ी बनाकर रहते हैं, पूरे 3 से 4 महीने। जैसे ही मानसून की शुरुआत होती है, ये अपना बोरिया बिस्तर उठाकर वापस अपने गांव लिंगा पहुंच जाते हैं। तीन से चार महीनों तक घर से दूर अपने पशुओं के भले के लिए जीने वाले यह वनवासी पैसों पर नहीं अपने जीने के तरीकों पर ज्यादा भरोसा करते हैं।

बात पातालकोट जैसी गहरी घाटी में बसे वनवासियों की हो या डांग जैसे सुदूर पिछड़े वनवासी क्षेत्र की, यहां पूंजीवाद राज नहीं करता है बल्कि स्थानीय वनवासियों के बीच समाजवाद और सौम्यवाद आज भी जिंदाबाद है और ऐसे माहौल में जीवन ज्यादा सुकून देने वाला होता है। यह बात अलग है कि हम शहरी और तथाकथित मॉडर्न समाज के लोग समाजवाद से दूर पूंजीवाद को प्राथमिकता देते हैं और तभी तो नोटबंदी के असर के होने या ना होने की चर्चाओं को तूल देते रहते हैं। न जाने कब हम पातालकोट और डाँग के वनवासियों से कोई सीख ले पाएंगे? यह सीख औपचारिक नहीं बल्कि अनौपचारिक जरूर लगे लेकिन है बड़े काम की, क्योंकि असल जीवन नोट खाकर नहीं जिया जा सकता। भोगी या रोगी होकर नहीं बल्कि असल जीवन योगी होकर ही जिया जा सकता है। हम शहरी लोग भोगी और रोगी हैं..कुछ लोग 2000 के नए नोटों को पाकर भोगी हो जाएंगे, कुछ पुराने 500 और 1000 के नोटों को देख देखकर रोगी हो चुके हैं लेकिन असल योगी तो पातालकोट और डाँग के वनवासी ही है जिन्हें नोटों जैसी किसी 'माया' की जरूरत ही नहीं।

(लेखक गाँव कनेक्शन के कन्सल्टिंग एडिटर हैं।)

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