अब बदलना होगा पाकिस्तान को देखने का नज़रिया  

अब बदलना होगा पाकिस्तान को देखने का नज़रिया  पाकिस्तान ने कुलभूषण जाधव को दोषी पाए जाने के बाद फांसी की सजा सुनाई गई थी।

10 अप्रैल 2017 को पाकिस्तान के फील्ड जनरल कोर्ट मार्शल (एफजीसीएम) द्वारा भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव को सेना द्वारा लगाए गए सभी आरोपों में दोषी पाए जाने के बाद फांसी की सजा सुनाई गई थी। कूलभूषण जाधव के मामले में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि जाधव को मौत की सजा देकर पाकिस्तान की आर्मी कोर्ट ने सिद्ध कर दिया कि वह किस सीमा अंतरराष्ट्रीय मानकों की अवहेलना कर सकता है।

यही वजह है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल ने आर्मी कोर्ट ने भी कोर्ट मार्शल के फैसले पर सवाल उठाए और पिछले दिनों हेग स्थित इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने इस मामले में पाकिस्तान से यह सुनिश्चित करने के लिए आदेश दिया कि कुलभूषण सुधीर जाधव के सभी विकल्पों पर विचार करने से पहले फांसी न दी जाए।

सूत्रों ने इस न्यायालय के प्रेसिडेंट रॉन अब्राहम के हवाले से लिखा है कि उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को निर्देश दिया है कि वे भारत की अपील पर गौर करें और जब तक न्यायालय मामले पर सुनवाई नहीं कर लेता तथा आदेश पारित नहीं कर देता, तब तक कुलभूषण जाधव की फांसी पर रोक रहेगी।

पहला प्रश्न यह है कि कोर्ट मार्शल के फैसले की टाइमिंग को लेकर है, अर्थात पाकिस्तान ने कुलभूषण जाधव की फांसी की सजा के लिए यही समय क्यों चुना ? क्या कुलभूषण यादव को पाकिस्तान की ‘भारत नीति’ के लिए एक मोहरा बनाया गया है या फिर पाकिस्तान इसके जरिए पाकिस्तान को कुछ संदेश देना चाहता है? दूसरा यह है कि क्या पकिस्तानी स्टैब्लिस्मेंट में कहीं कोई अंदरूनी बदलाव भी आ रहे हैं ? यानि भारत में नीतिगत निर्णय राजनीतिक नेतृत्व यानि प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द घूमते हैं जबकि पाकिस्तान में नीतिगत वक्तव्य सेना की तरफ से आते हैं।

यहां पर कुछ बातें और भी ध्यान देने योग्य हैं-प्रथम: कुलभूषण जाधव को 3 मार्च, 2016 को ईरान से पाकिस्तान में अवैध घुसपैठ के चलते गिरफ्तार किया गया था और पाकिस्तान ने दावा किया था कि वह एक रिसर्च एंड एनैलेसिस विंग (रॉ) का एजेंट है, जबकि जाधव के पास भारतीय पासपोर्ट था और वह कानूनी तौर पर ईरान में अपना व्यापार कर रहे थे।

द्वितीय: पाकिस्तान सरकार या आर्मी के पास जाधव के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं थे, एक मात्र जाधव के कथित कबूलनामे के वीडियो के अतिरिक्त। महत्वपूर्ण बात यह है कि वीडियो के सामने आने के बाद दावा किया गया कि 358 सेकेंड के इस वीडियो में 102 कट थे। इसका तात्पर्य यह हुआ कि जाधव ने बयान स्वेच्छा से नहीं दिया बल्कि उन पर दबाव डालकर आरोपों को कबूल करवाया गया।

भारत में संसद पर हुए हमले के बाद डोमेस्टिक इंटेलिजेंस जुटाई गई जिसके बाद उन्होंने 2003 में इंडियन इंटेलिजेंस सर्विस ज्वॉइन की और 2013 में वे रॉ में शामिल हुए। वे ईरान से बलूचिस्तान में टेररिस्ट एक्टिविटीज को बढ़ावा दे रहे थे, जबकि भारत का पक्ष है कि जाधव कानूनीतौर पर ईरान में अपना व्यापार करते थे वहां से उन्हें अगवा किया गया और पाकिस्तान ले जाया गया। तृतीय: पाकिस्तान में जाधव को कांसुलर एक्सेस का अधिकार नहीं दिया जो कि विएना कन्वेशन का हिस्सा है।

भारत सरकार ने इस्लामाबाद में अपने उच्चायोग के माध्यम से 25 मार्च 2016 और 31 मार्च 2017 के बीच 13 से 15 बार के बीच कांसुलर एक्सेस के लिए अनुरोध किया लेकिन पाकिस्तान के अधिकारियों ने इसकी अनुमति नहीं दी थी।’ चतुर्थ: पाकिस्तान की तरफ से जाधव के खिलाफ सात आरोप लगाए गये थे, उनमें ग्वादर और चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) को सैबोटेज करने के अतिरिक्त बलूचिस्तान में आतंकी गतिविधियों को संगठित करने जैसे आरोप प्रमुख हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सातों कार्य कोई एक व्यक्ति अकेले कर ही नहीं सकता।

जहां तक टाइमिंग की बात है तो इसे तीन संदर्भों में देखने की जरूरत होगी। प्रथम पाकिस्तान के एक कर्नल का नेपाल से गायब होना जिसके विषय में पाकिस्तान यह आरोप लगा रहा है कि उसे भारत ने गायब किया है और उसे आईएसआई का एजेंट बनाकर मुकदमा चलाना चाह रहा है। द्वितीय- पनामा पेपर लीक।

भले ही पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को कुछ राहत दे दी हो लेकिन उनकी मुश्किलें कम नहीं हुई हैं क्योंकि पीएम नवाज़ शरीफ और उनके दोनों बेटों को इस संयुक्त जांच टीम के सामने जांच के लिए हाजिर होने का निर्देश दिया है। ध्यान रहे कि पांच जजों की पीठ में से 3 जजों ने इस केस में जांच के लिए और समय दिया है, लेकिन दो जज पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ को पीएम पद के लिए अयोग्य ठहराने के पक्ष में हैं।

तीसरा कारण बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद की भारत यात्रा मानी जा सकती है। दरअसल भारत बांग्लादेश के साथ अपने सम्बंधों को मजबूत करते समय 1971 के युद्ध को न केवल सामने रखता है बल्कि उसे सामने रखकर पाकिस्तान को कुछ संदेश भी देने की कोशिश करता है विशेषकर पाकिस्तानी सेना को (खासकर उस तस्वीर के जरिए जिसमें जनरल जे.एस. अरोड़ा के समक्ष जनरल नियाजी को औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण करते हुए दिखाया गया है)।

इसलिए भारत प्रत्येक स्थिति में पाकिस्तान को प्रभावी ढंग से काउंटर करने की कोशिश करनी चाहिए। आज अगर बीजिंग, मॉस्को, वाशिंगटन, इस्तांबुल, मस्कट, तेहरान आदि इस्लामाबाद विरोधी नहीं हैं अथवा उसके साथ एलायंस बना रहे हैं तो फिर इस विषय गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है।

यानि हम जिस पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित कराने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं उसी राष्ट्र को मध्य-पूर्व के 39 देश आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए अपनी संयुक्त सेना की कमान सौंप रहे हैं। फिर पाकिस्तान अलग-थलग कहां पड़ा। आखिर क्यों? एक तो वजह पाकिस्तान ‘इस्लामी डिप्लोमैटिक डिविडेंड’ सम्बंधी हो सकती है।

विशेषकर सुन्नी इस्लामी दुनिया पाकिस्तान द्वारा एटमी बम बनाने लेने के बाद उसे सुन्नी एटम बम बताकर ग्लोरीफाई कर रही है। दूसरा पक्ष ‘भौगोलिक लाभांश’ का लगता है क्योंकि अपनी इसी स्थिति के कारण वह चीन के लिए महत्वपूर्ण सारथी सिद्ध हो रहा है जैसा कि कभी अमेरिका के लिए रहा था। पुतिन भी इन्हीं वजहों के कारण अब उसके करीब जाना चाहते हैं। ये वे वजहें हैं, जो पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग नहीं होने देंगी। इसलिए भारत को पाकिस्तान को देखने और काउंटर अटैक करने का नजरिया व रणनीति बदल देनी चाहिए।

(लेखक अंतराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं यह उनके निजी विचार हैं।)

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