रामलला की राह तैयार करना

रामलला की राह तैयार करनाप्रतीकात्मक फ़ोटो

लखनऊ। इलाहाबाद' उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने 30 सितंबर, 2010 को बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद में जो निर्णय दिया था उससे यही लगा कि हिंदू कट्टरपंथी जो बात कहते आए हैं, वह सही है। इन्हीं विश्वासों के आधार पर इन लोगों योजना के तहत 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद का विध्वंस कर दिया।

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यह बात लिब्राहन आयोग कहती है। ऐसी ही धारणा भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी अन्य संगठनों की रही है। इनके नेताओं ने उस वक्त भीड़ को संबोधित किया और इस बात का आह्वान किया कि वे मस्जिद तोड़ दें। ऐसे में आम लोग इस बात की उम्मीद कर रहे थे कि सर्वोच्च अदालत इस विवाद में कोई अंतिम निर्णय देगी।

लेकिन निर्णय देने के बजाय भारत के मुख्य न्यायाधीश जेएस केहर ने विवाद से संबंधित सभी पक्षों को आपसी बातचीत के जरिए मामले को सुलझाने की सलाह दी और खुद मध्यस्थता करने का प्रस्ताव दिया। उनके बारे में यह खबर आई कि उन्होंने कहा, ‘थोड़ा दीजिए, थोड़ा लीजिए। इसे सुलझाने की एक कोशिश कीजिए। अगर सभी पक्ष वार्ता के लिए चुने जाने वाले मध्यस्थों को साथ मुझे बैठाना चाहेंगे तो मैं इसके लिए तैयार हूं।’ उनके मुताबिक यह मामला भावनाओं और धर्म से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि अगर आप इसका समाधान नहीं कर पाएंगे तो कोर्ट यह काम करेगी।

लेकिन क्या मौजूदा परिस्थितियां में ऐसी वार्ता बराबरी के स्तर पर हो पाएगी। खास तौर पर तब जब हिंदुत्ववादी सरकारें केंद्र और उत्तर प्रदेश में हों। बहुत लोग यह मान रहे थे कि भारत के मुख्य न्यायाधीश तथ्यों पर आधारित कोई फैसला देंगे। क्या वह मान्यता सही है कि मस्जिद के गुंबद के नीचे वाली जगह पर भगवान राम का जन्म हुआ था? और अगर यही सही भी है तो भी उस जमीन का मालिकाना हक उन्हें कैसे मिल जाएगा जिस पर 1528 में मस्जिद बनी थी? क्या मस्जिद बनाने के लिए किसी मंदिर को ढहाया गया था?

यह बिल्कुल साफ है कि भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि कब राज्यसभा में बहुमत मिले और वे विवादित जमीन पर राम मंदिर बनाने के लिए कानून पारित करवा लें। भाजपा घोषणापत्र में ऐसी बात कही गई थी। लेकिन उसके पहले उन्हें न्यायपालिका को इस मामले से बाहर करना होगा। क्या इससे इस मामले में भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी का अचानक शामिल हो जाना स्पष्ट हो रहा है। याद रहे कि स्वामी इस मामले में कभी शामिल नहीं थे।

22-23 दिसंबर, 1949 की रात को 50 लोगों ने मस्जिद में घुसकर तीन मूर्तियां स्थापित कर दीं। तब से लेकर 30 सितंबर, 2010 तक जब उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया तब तक न्यायपालिका और कार्यपालिका विवादित जगह पर रामलला की दावेदारी के पक्ष में ही दिखती रही है। कार्यपालिका तो इसके लिए 1993 में एक अधिग्रहण कानून भी लाया था। उच्च न्यायालय ने रामलला की दावेदारी को कानूनी मान्यता दे दी। अब उच्चतम न्यायालय तथ्यों और सबूतों के आधार पर निर्णय देने के बजाए दो असमान पक्षों को आपसी बातचीत से मामला सुलझाने का सलाह दे रही है।

संभव है कि राम मंदिर बाबरी मस्जिद की जगह पर बन जाए। लेकिन यह भारत की धर्मनिरपेक्षता की कीमत पर होगा। राम मंदिर बनाने की कीमत कई स्तर पर चुकानी पड़ेगी। लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठेंगे। लोकतंत्र इसका शिकार बनेगा। क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए धर्मनिरपेक्षता एक अनिवार्य शर्त है।

(यह लेख इकॉनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली से लिया गया है)

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