कमलापति त्रिपाठी: कांग्रेस में जिला पदाधिकारी से लेकर कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष तक की जिम्मेदारी उठाने वाले एक नेता

जन्मदिन विशेष- यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कमलापति त्रिपाठी के 70 साल के राजनीतिक जीवन के 50 साल संसदीय कार्यों में बीते। उन्होंने सीएम से लेकर केंद्र में कैबिनेट मंत्री तक की जिम्मेदारी निभाई।

कमलापति त्रिपाठी: कांग्रेस में जिला पदाधिकारी से लेकर कार्यकारी राष्ट्रीय  अध्यक्ष तक की जिम्मेदारी उठाने वाले एक नेता

कमलापति त्रिपाठी को परिवार में हम सब लोग 'बाबू' ही कहते थे। बाबू को परिवार के संस्कारों और परिवेश के प्रभावों ने मिलकर गढ़ा था। परिवार सनातनी धर्मनिष्ठा का था। जिस गांधीयुगीन परिवेश को उन्होंने अपनाया, वह सेकुलर था, लोकतांत्रिक था, राष्ट्रवादी था, समाजवादी रुझान वाला था। सो दोनों पक्ष बाबू में मजबूत थे, मुखर थे।

अपनी परंपरा और इन सब आधुनिक मूल्यों की एक साथ निष्ठा ने जहां उन्हें समय के साथ चलना, उनके तकाजों के साथ जीना सिखाया था, वहीं मूल्यों, विचारों, संस्थाओं और नेतृत्व के प्रति अपने विश्वास एवं अपनी आस्था को बिना विचलित हुए एकनिष्ठा के साथ ताजिन्दगी जीने का खास गुण भी उनको दिया था। बाबू जिससे एक बार जुड़े, तो जीवन भर निभाया। हमने अपने परिवार में, उनकी रक्त परंपरा में जन्म लेकर उनसे विरासत में यही सबसे अहम सबक सीखा और यही नसीहत पाई।

रेलमंत्री के रुप में परियोजना का शिलान्याय करते पं. कमलापति त्रिपाठी। सभी फोटो- परिवार द्वारा उपलब्ध कराई गई हैं।

हमारे परिवर के बाबू की काशी में प्रतिष्ठा पहले से तो थी, लेकिन पाण्डित्य के नाते, न कि राजनीति के नाते। यद्यपि मेरे परदादा शहर के विद्वत समाज के प्रतिनिधि के नाते सही, लेकिन 1905 में गोखले जी की अध्यक्षता में हुई ऐतिहासिक बनारस कांग्रेस की स्वागत समिति के सदस्य थे। बाबू का जन्म उसी साल बनारस कांग्रेस के तीन चार महीने पहले हुआ था और होश संभालने के साथ ही उनकी रुझान कांग्रेस, महात्मा गांधी, स्वतंत्रता आन्दोलन आदि के साथ दिखने लगी थी।

गांधी जी के असहयोग प्रस्ताव पर जब बनारस में कांग्रेस कार्यसमिति की हुई बैठक में कांग्रेस पहली बार विचार कर रही थी, तो अपने स्कूल के उस कक्ष में बाबू पानी पिलाने वाले एक स्वयंसेवक के रूप में मौजूद रहकर इतिहास बदलते देख रहे थे। तब उम्र थी चौदह साल की और साल भर बाद ही पन्द्रह साल की उम्र में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्कूल का बायकाट कर गांधी जी के असहयोग आन्दोलन में कूद ही नहीं पड़े, जेल गये। नाबालिग थे, माफी नहीं मांगी तो मजिस्ट्रेट ने तीन महीने की जेल और सौ रुपए जुर्माना तथा जुर्माना न भरने पर एक महीने और जेल की सजा सुना दी।

जेल से अपनी चिन्ता न करने की प्रार्थना के साथ पिता को लिखे पत्र में तर्क दिया कि कुछ डाकू घर में आ जाएं और माताजी के सीने पर सवार हो जाएं तो जो करने का मेरा धर्म होगा, वही भारत माता के लिये कर रहा हूं और इसमें तकलीफें तो आयेंगी ही। लौटने पर पिता से पूछा कि सुना आप नाराज हैं कि मेरा खान पान, धर्म नष्ट हो गया, तो पिता बोले मैं क्यों नाराज होंऊं ? तुम्हें तो राजदंड मिला है और मनुस्मृति में लिखा है कि राजदंड पाने वाले की सात पीढ़ी के पाप धुल जाते हैं और वैसे भी मैंने महामना मालवीय जी को वचन दिया ही था कि अपना एक पुत्र देश के काम के लिये दे दूंगा। इस तरह धर्म, परंपरा और युगधर्म दोनों के बीच की राह और बाबू उस राह पर चलते हुये पांच बार स्वतंत्रता आन्दोलन में जेल गये, साढे पांच साल जेलों में बिताये। जेलों रहकर कई ग्रन्थ भी लिखे।

बाबू ने राजनीति, पत्रकारिता एवं पत्र सम्पादन तथा लेखन आदि सभी माध्यमों से देश और समाज के लिये काम करने का रस्ता चुना था। सन् 1952 तक तीनों मोर्चे पर वह डटकर काम करते रहे। 29 साल की उम्र थी तो विदुर हो गये और खूब पारिवारिक दबाव के बावजूद दूसरा विवाह नहीं किया।

इंदिरा गांधी के साथ पं. कमलापति त्रिपाठी।

विधानसभा के लिये कठिन चुनाव में 1936 के निर्वाचन में चुने गये और 1946 में दोबारा चुने जाने के बाद भारत की संविधान सभा के भी सदस्य बने। देश का नाम 'भारत' रखवाने, हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनवाने की कोशिश, संविधान का हिन्दी अनुवाद करवाने, पहला हिन्दी अनुवाद संसार अखबार में छपवाने में जिसके वह 'आज' छोड़ने के बाद सम्पादक थे, आदि के उल्लेख योग्य योगदान बाबू ने संविधान सभा में दिये।

संविधान सभा का काम पूरा होने पर वह चाहते तो संसद में रहने का विकल्प था, लेकिन गोविन्द वल्लभ पंत जी के कहने पर विधानसभा में लौट आये, जिन्होंने 1952 के चुनाव के बाद की अपनी सरकार में बाबू को कैबिनेट मंत्री बनाया। उसके बाद पत्रकारिता छूट गई और बाबू पूर्णत: राजनीति के एवं कांग्रेस पार्टी के होकर रह गये। सत्तर साल के राजनीतिक जीवन में पूरे पचास साल संसदीय जीवन में लगातार रहकर विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा और राज्यसभा में तो नेता सदन एवं नेता विपक्ष की भूमिका में भी काम किया।

राज्य में लंबे समय मंत्री, उप मुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री तथा केन्द्र में रेलवे, जहाजरानी एवं सडक परिवहन आदि के मंत्री के रूप में काम करते हुये प्रभावशाली ढंग से विकास के लिये काम करने वाले एक दक्ष राजनीतिक प्रशासक की छवि अर्जित की। कांग्रेस पार्टी में राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष, लंबे समय तक कार्यसमिति के सदस्य तथा प्रदेश से जिला अध्यक्ष तक की भूमिकायें निभाईं।

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बाबू, काशी नगरी के थे, लेकिन वाराणसी शहर से एक बार ही चुनाव लड़े, जब 1980 में लोकसभा के लिये आदरणीय राजनारायण जी जैसे कद्दावर साथी के खिलाफ लोकसभा के लिये चुने गये थे। उनका राजनीतिक मुख्य कर्म एवं निर्वाचन क्षेत्र तो चन्दौली ही रहा, जो वाराणसी जिले में ही तब हुआ करता था। सन् 1936 से 1973 तक विधानसभा में चन्दौली का प्रतिनिधित्व वह करते रहे थे, यद्यपि उन्हें चन्दौली के प्रति पूरा समर्पण और प्रेम जीवन भर उसी तरह रहा। वह चन्दौली की राजनीतिक पहचान एवं गौरव के सबसे बड़े प्रतीक माने जाते रहे हैं। आज भी वहां उनके राजनीतिक विरोध से जुड़े रहे लोग तक उनके प्रति ऐसे ही भाव प्रकट करते सुने जा सकते हैं।

साढ़े तीन दशकों तक चन्दौली का राजनीतिक प्रतिनिधित्व करते हुये उन्होंने चन्दौली के विकास पर जो जैसी बेमिसाल छाप छोड़ी, उसका महत्व चन्दौली के इतिहास में और आज भी वहां आम जनमानस पर अंकित है।

बनारस के रहने वाले बाबू को 1936 में बनारस में गुरु सम्पूर्णानन्द के रहते हुये चुनाव का टिकट मांगना गंवारा न था, तो जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें चन्दौली से चुनाव लड़ने को कहा। बाबू बोले कि चन्दौली में तो मुझे कोई जानता नहीं, मैं तो वहां के रस्ते तक अच्छे नहीं जानता। सो कौन मुझे वोट देगा, हार जाऊंगा। उत्तर था कि जीतने के लिये कौन भेज रहा है। चुनाव के माध्यम से घर-घर जाओ, कांग्रेस का और गांधी जी का संदेश पहुंचाओ, जीतो या हारो। सो बाबू 1936 का चुनाव लड़े और कठिन चुनाव था, पर चुनाव जीते भी। उसके बाद तो वह चन्दौली में ऐसे रमे कि चन्दौली के होकर रह गये।

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के साथ।

उनकी शर्त पर कांग्रेस में उस दौर के सबसे बड़े स्टार प्रचारक पं.जवाहर लाल नेहरू ने चुनाव में अपने चुनाव प्रचार का अभियान चन्दौली से ही शुरू करने का वादा किया था और निभाया।

1952 के पहले वयस्क मताधिकार वाले आम चुनाव में बाबू चन्दौली-चकिया के संयुक्त चुनाव क्षेत्र से ही फिर विधायक बन कर प्रदेश में सिंचाई और सूचना मंत्री बने। पंत जी, सम्पूर्णानन्द, चन्द्रभानु गुप्त, सुचेता कृपलानी की सरकारों में वह मंत्री रहे। चन्दौली के विकास के कमलापति मॉडल की एक अलग पहचान मानी जाती है। एक ही साल में बाढ़-सूखा दोनों की नियति जीने वाले चन्दौली के उस विकास माडल ने इलाके को 230% सिंचाई के नायाब ढांचे की सौगात देकर, उसे धान का कटोरा बना दिया। कुछ लोग उसे धान का जंगल भी कहते हैं। दो हजार कि.मी. से भी ज्यादा लंबी नहरों पर आधारित सिंचाई प्रणालियां, 70% नहरों संग एक पटरी पर सड़कें, बाढ़ लाने वाली नदियों के मुहानों पर बन्धे बना कर पानी नहरों के रस्ते समान भाव से हर किसान के खेत की ओर दौड़ा देने का अनूठा माडल।

हिंदी समारोह में पं. कमलापति त्रिपाठी। हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाने में उनका अहम योगदान रहा।

गंगा नदी अन्य नदियों से कई छोटी बडी लिफ्ट प्रणालियों की अतिरिक्त पूरक व्यवस्था कर के क्षेत्र की सिंचाई को ऐसा पुख्ता करना कि अकाल और दुर्भिक्ष की कल्पना भी खत्म जाय। खास बात यह कि इन सब कामों के लिए क्षेत्र में जमीन के अधिग्रहण की कार्रवाईयों का कोई रेवेन्यू रिकार्ड नहीं। ऐसा प्रभाव व भरोसा लोगों के बीच कि जिधर से नक्शे पर छड़ी घुमा दी। बिना अवरोध नहरें बन गईं। लोग मान कर चलते रहे कि जब पंडित जी कुछ करा रहे हैं, तो जरूर भले के लिये ही होगा।

इसी तरह सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रेलवे आदि सभी प्रमुख क्षेत्रों में विकास का ठोस योगदान बाबू ने दर्ज किया। उनके चन्दौली से लगाव का ही परिणाम था कि उनकी पुत्रवधु और मेरी मां चन्द्रा त्रिपाठी भी चन्दौली की ही राजनीति कर वहां की सांसद बनी थीं और मेरे पिता लोकपति त्रिपाठी ने भी स्वास्थ्य व सिंचाई मंत्रित्व के अपने कार्यकाल में चन्दौली को विकास योजनाओं की कई सौगातें दीं।

लेखक, राजेश पति त्रिपाठी, पं. कमलापति त्रिपाठी के पोते हैं, ये उनके निजी विचार हैं।

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