नई शक्ल ले रहा दुनिया में राष्ट्रवाद

नई शक्ल ले रहा दुनिया में राष्ट्रवादडोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति।

डॉ. रहीस सिंह

नवम्बर को डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए मिली जीत पर एक अमेरिकी अखबार में छपी टिप्पणी में इस तारीख को फ्रेंच रिवोल्यूशनरी कैलेंडर के अनुसार 18वां ब्रूमेयर कहा गया था है। यह वही दिन है, जब 1799 में नेपोलियन बोनापार्ट ने रिवोल्यूशनरी सरकार के तख्तापलट को नेतृत्व किया था और स्वयं को प्रथम कांसुल के रूप में स्थापित कर विश्व इतिहास को पुनर्निर्देशित करने वाली व्यवस्था पेश की थी।

सवाल यह उठता है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप नेपोलियन की तरह ही विश्व व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं? क्या ऐसी शंकाओं पर भरोसा किया जाना चाहिए? जिस तरह से डोनाल्ड ट्रंप कट्टर, उन्मादी राष्ट्रवादी और संरक्षणवादी की अपनी छवि के साथ अमेरिकी राजनीति में उभरे और राष्ट्रपति पद के लिए जीत हासिल की उससे शंकाओं को बल तो मिलता है। इस तरह के निष्कर्ष उन परिस्थितियों में और भी प्रासंगिक लगने लगते हैं जिनमें लगभग पूरी पश्चिमी दुनिया में दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद शक्ति प्राप्त कर रहा हो तथा पूरा मध्य-पूर्व एक नए ध्वंस का इतिहास लिख रहा हो। तो क्या विश्व इतिहास में एक ऐसा नया अध्याय जुड़ सकता है जो 18वीं-19वीं शताब्दी के इतिहास को दोहरा रहा हो?

अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए सम्पन्न हुए चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की विजय को कई विश्लेषकों एवं समीक्षकों ने सामान्य विजय के रूप में रेखांकित नहीं किया। वे ट्रंप को अमेरिकी राजनीति में एक उभार (इमर्जेंस) के रूप में देखते हैं। ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान यह बात बार-बार दोहराई कि वे अपनी सेना को इतना बड़ा और ताकतवर बना देंगे कि कोई अमेरिका से झगड़ने की हिम्मत न कर सके। उन्होंने सर्वअमेरिकावाद (पैनअमेरिकानिज्म) और सर्वसत्तावाद के तहत अमेरिका को सुनहरे युग में ले जाने की बात भी की। इस तरह से उन्होंने अपने चुनाव प्रचार के दौरान जो वातावरण निर्मित किया और अमेरिका की जो तस्वीर पेश की उससे अमेरिकी जनता में एक नया मनोविज्ञान विकसित हुआ। इसी मनोविज्ञान के कारण अमेरिकियों ने ऐसा नेता चुना जो कूटनीति में नहीं, धमकियों से बात करे, जो हर बात पर ‘सिर फोड़ देंगे’, ‘धक्के देकर बाहर निकाल देंगे’, ‘उठाकर पटक देंगे’, ‘मारकर भगा देंगे’ वाली भाषा बोले...। महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनाव जीतने के बाद ट्रंप कई मुद्दों पर बदलते नजर आ रहे हैं, लेकिन वे लगातार ऐसे संकेत दे रहे हैं, जो दुनिया को अज्ञात भय की ओर ले जाने वाले लगते हैं।

ट्रंप चीन से सीधे टकराव की ओर जाते दिख रहे हैं। 1978-79 से स्थापित अमेरिका-चीन संबंधों में परिवर्तन लाने के वे जो संकेत दे रहे हैं, वे एशियाई शांति के लिए खतरा बन सकते हैं। उनका ताइवानी राष्ट्रपति से बात करना और यह तर्क देना कि हम निक्सन की ‘वन चाइना पाॅलिसी’ से क्यों बंधे रहें, हम सौदेबाजी क्यों नहीं कर सकते। अथवा अमेरिका की ‘एशिया पीवोट’ नीति से ‘रसिया पीवोट’ की ओर खिसकने का संकेत, गहरे निहितार्थों वाला हो सकता है। इसके परिणाम एशिया-प्रशांत, यूरेशिया और मध्य-पूर्व में परिवर्तन ला सकते हैं और यूरोप में नए संयोजनों को जन्म दे सकते हैं। ट्रंप द्वारा पेंटागन के सबसे ऊंचे पद पर जनरल जेम्स मैटिस गेटी को, जो ‘मैड डाॅग’ के नाम से प्रसिद्ध रहे, नियुक्त करना एक खतरनाक संकेत है। ध्यान रहे, ये वही जनरल गेटी हैं जिन्हें लोगों को गोली मारने में मजा आता है। ऐसे व्यक्ति का, जिसके लिए युद्ध एक ‘फन’ हो और लोगों को गोली मारना आनंददायक लगता हो, अमेरिकी रक्षा मंत्री के रूप शांति की उम्मीदों के साथ स्वागत करना दूसरे तरह के परिणामों की संभावनाओं को स्वीकार करने जैसा है।

ट्रंप इस समय वैश्विक राजनीतिक गतिविधियों के केन्द्र में हैं, इसलिए उनके द्वारा उठाए गये कदमों से वैश्विक राजनीति प्रभावित होगी लेकिन इसके साथ ही दुनिया पूरी दुनिया में कुछ नए उभारों को देखा जा सकता है, जो विश्व शांति को प्रभावित कर सकता है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यूरोप में दक्षिण पंथ का उभार है, जिसमें वही विशेषताएं देखी जा सकती हैं जो ट्रंप में देखी जा रही हैं। इन्हीं उभारों के कारण ही ब्रिटेन में ब्रिक्सिट के पक्ष में जनमत रहा, जर्मनी में पेगिडा जैसा आंदोलन शक्ति प्राप्त कर गया, फ्रांस में मरीन ली पेन का उभार देखा जा रहा है... आदि।

ब्रिक्सिट को लेकर ब्रिटेन में 23 जून 2016 को हुए मतदान में ब्रिटेन के 52 प्रतिशत लोगों ने ‘लीव ईयू’ के पक्ष में मत दिया था जबकि 48 प्रतिशत ने ‘रिमेन’ के पक्ष में। ब्रिक्सिट यानि ब्रिटेन के ईयू से एक्जिट पर ब्रिटिश जनमत संग्रह ने न केवल ब्रिटेन के सामने बल्कि दुनिया के सामने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं और सम्भवतः चुनौतियां भी पेश कर दी हैं जिनका निराकरण आसान नहीं होगा। इसने यह बता दिया था कि बाजार शक्तियों के अधीन निर्मित विश्व व्यवस्था अब चरमरा रही है। जो देश कभी इस व्यवस्था के अगुआ थे, वे अब कट्टर राष्ट्रवादी एवं संरक्षणवादी होकर इसके ध्वंस का इतिहास लिखना शुरू कर रहे हैं। इसे कई संदर्भों और उदाहरणों के रूप में देखा जा सकता है। जैसे-ब्रिक्सिट पर जनमत के निर्णय को यूके इंडिपेंडेंस पार्टी (यूकिप) के नेता नाइजेल फैराज ने ‘स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में पेश किया था। यह स्थिति ब्रिटेन में ही नहीं है बल्कि जर्मनी में भी कुछ समय पहले हुए तीन राज्यों के चुनावों भी देखी गयी जहां जर्मनी की चांसलर मर्केल की कंजर्वेटिव क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन तीन राज्यों में से दो में हारी और उग्र दक्षिणपंथी विचारों वाली पार्टी एएफडी को भारी जीत मिली। इस पार्टी ने मर्केल की शरणार्थियों के प्रति नरम नीति बरतने के खिलाफ अभियान छेड़ा था।

स्विट्जरलैंड में हुए चुनावों में स्विस पीपुल्स पार्टी को जीत हासिल हुई जिसे कुछ हद तक कट्टर राष्ट्रवादी कहा जा सकता है। इस समय यूरोप में स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क, नार्वे ...आदि सभी देशों में प्रवासियों से जुड़ी नीतियों के प्रति सख्त रवैया और कमोबेश इस्लामफोबिया जैसा वातावरण दिख रहा है। भारत में इस तरह का वातावरण कुछ हद तक बनता हुआ देखा गया अथवा कई बार चीजों को इस दायरे तक खींचने की कोशिश होती दिखी है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से दो बातें स्पष्ट तौर पर देखी गई हैं। पहली यह कि उनके प्रत्येक निर्णय को कृत्रिम रूप से राष्ट्रवाद के खांचे में फिट करने की कोशिश की गई जिससे लोकतांत्रिक अधिकारों का कुछ हद तक हनन हुआ। द्वितीय-एक भय का वातावरण निर्मित किया गया, जिससे एक वर्ग विशेष में नकरात्मक सोच पनपी जबकि बहुल जातीय एवं विषम संस्कृति वाले राष्ट्र के लिए ऐसे प्रयास पूर्णतः अस्वीकार्य हैं और होने चाहिए।

फिलहाल अमेरिकी राजनीति में डोनाल्ड ट्रंप के उदय के समानांतर यूरोप में भी उग्रराष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी शक्तियों के उभार को देखा जा सकता है (हालांकि इससे भारत सहित एशिया के कुछ अन्य देश भी अछूते नहीं हैं) इनमें इस्लामफोबिया, इस्लामी आतंकवाद के विरोध के नाम पर पनपती नई विचारधाराओं के साथ कट्टर राष्ट्रवाद एवं संरक्षणवाद प्रमुखता से उभरा है। क्या राजनीति की इस नवराष्ट्रवादी विचारधारा से ऐसी विश्वव्यवस्था की अपेक्षा की जा सकती है, जहां शांति और स्वतंत्रता संरक्षित हो?

(लेखक आर्थिक व राजनीतिक विषयों के जानकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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