भारतीय क्रिकेट की ताकत के कहने ही क्या  

भारतीय क्रिकेट की  ताकत के कहने ही क्या  इतिहासकार रामचंद्र गुहा को लेकर प्रसन्न हैं कि उन्होंने एक बहादुर सचेतक की भूमिका निभाई।

माननीय उच्चतम न्यायालय ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) में सुधार का एक नेक प्रयास किया लेकिन अब भारतीय क्रिकेट की हालत ऐसी बन गई है मानो किसी शल्य चिकित्सक ने ऑपरेशन के लिए मरीज की चीरफाड़ कर दी हो लेकिन उसे सिल नहीं पा रहा।

इंग्लैंड में आयोजित चैंपियंस ट्रॉफी में अपने खिताब का बचाव करने उतरी भारतीय क्रिकेट टीम को अपने खेल पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय बीसीसीआई के प्रतिनिधियों के सवालों का जवाब देना पड़ रहा है कि वे अपने कोच को क्यों नापसंद करते हैं? भारतीय क्रिकेट, ग्रेग चैपल वाले प्रकरण के बाद सबसे अधिक बंटी हुई दिख रही है।

यहां कुछ भी कहने से बचना ही समझदारी होगी क्योंकि कुछ ही दिन पहले दिल्ली क्रिकेट को संभालने के लिए अदालत की ओर से तैनात वरिष्ठ न्यायाधीश ने एक पत्रकार को अवमानना के मामले की धमकी दे दी। पत्रकार का कहना था कि न्यायाधीश ने अपने लिए मुफ्त पास का बंदोबस्त किया था।

उसके पास उनकी बेटी की सहभागिता को लेकर भी कुछ प्रश्न थे। वहीं प्रशासकीय समिति और लोढ़ा समिति की मदद कर रहे एक अधिवक्ता ने पहले ही आलोचकों को चेतावनी दे दी है कि अदालत का धैर्य कम होता जा रहा है।

परंतु अकाट्य तथ्यों को तो सामने रखना ही होगा। महज एक साल पहले तक दुनिया में सबसे ताकतवर रही भारतीय क्रिकेट बड़े संकट से जूझ रही है। हकीकत यह है कि भारतीय टीम और उसका प्रबंधन पूरी तरह बंट गए हैं। आईसीसी के बोर्ड रूप में भारत का दबदबा कमजोर पड़ चुका है क्योंकि बीसीसीआई के प्रबंधन और सुधारों के लिए न्यायालय ने प्रशासकीय समिति नियत कर दी है। वह अपना काम करने के बजाय हितों के टकराव में उलझी है।

बतौर क्रिकेट प्रेमी हम इतिहासकार रामचंद्र गुहा को लेकर प्रसन्न हैं कि उन्होंने एक बहादुर सचेतक की भूमिका निभाई। भले ही हम उनकी बात से सहमत हों या नहीं। क्रिकेट में न्यायिक हस्तक्षेप की शुरुआत चार साल पहले स्पॉट फिक्सिंग विवाद के साथ हुई। तब सेवानिवृत्त न्यायाधीश मुकुल मुद्गल के अधीन जांच शुरू की गई।

बाद के वर्षों में यह सिलसिला बढ़ता गया और आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश आर एम लोढ़ा के अधीन सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। एक साल की मेहनत के बाद समिति ने रिपोर्ट पेश की और कहा कि बीसीसीआई के संचालन में भारी बदलाव की जरूरत है।

अदालत ने बीसीसीआई को निर्देश दिया कि वह अक्टूबर 2016 के आखिर तक इन सिफारिशों का क्रियान्वयन करे। ऐसा न होने पर उसने बोर्ड अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और सचिव अजय शिर्के को पद से हटा कर प्रशासकों की एक समिति नियुक्त की ताकि सुधारों का क्रियान्वयन हो सके। इस समिति का अध्यक्ष पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक विनोद राय को चुना गया क्योंकि न्यायमूर्ति लोढ़ा को उन पर पूरा यकीन है।

पद पर रहते हुए भी उन्होंने केरल के समृद्ध और विवादास्पद पद्मनाभस्वामी मंदिर का प्रबंधन एक समिति को सौंपा और राय से कहा था कि वह वित्तीय अंकेक्षण का काम संभालें। बाद में भारतीय चिकित्सा परिषद में सुधार की समिति का अध्यक्ष बनाए जाने पर भी न्यायमूर्ति लोढ़ा ने राय को उसमें शामिल किया। शेष तीन सदस्यों में वित्तीय फर्म आईडीएफसी के प्रबंध निदेशक और सीईओ विक्रम लिमये का चयन संभवत: राय ने किया होगा क्योंकि वह उनकी कंपनी में गैर कार्यकारी चेयरमैन हैं। डायना इडुलजी और गुहा का चयन कैसे हुआ यह पता नहीं। समिति चार महीने से काम कर रही है और लोढ़ा समिति के सुधार प्रवर्तन का क्या असर हुआ है यह अब तक पता नहीं। न ही इस बात पर कोई स्पष्टता है कि प्रशासकीय समिति कैसे नियंत्रण करना चाहती है। अदालत ने कोई मियाद तय नहीं की है।

भारतीय क्रिकेट में न्यायिक हस्तक्षेप ने क्रिकेट से इतर कई गंभीर विषयों में नए तरह के विवादों पर रोशनी डाली है: ऐसा ही क्षेत्र है उच्च विनियमन वाले वित्तीय बाजार, बैंकिंग-नौकरशाही और कॉर्पोरेट जगत का गठजोड़। प्रशासकीय समिति पर इस कदर ध्यान ने हमें याद दिलाया है कि राय केंद्र सरकार के ताकतवर बैंकिंग बोर्ड ब्यूरो के भी चेयरमैन हैं। इसका गठन सरकारी बैंकों में सुधार के लिए किया गया है। वह आईडीएफसी के भी चेयरमैन हैं जो आईडीएफसी बैंक की प्रवर्तक है। यह सरकारी बैंकों का प्रतिस्पर्धी है। उन्होंने खुद अपने सीईओ लिमये को प्रशासकीय समिति में सहयोगी बनाया।

लिमये नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के चेयरमैन चुने जा चुके हैं जहां देश के करीब 80 फीसदी लेनदेन होते हैं। यह संस्था न केवल महीनों से अध्यक्षविहीन है बल्कि अनियमितता के लिए तीन स्तरों पर फोरेंसिक अंकेक्षण के दायरे में है। लेकिन वह अपना पद नहीं संभाल पा रहे क्योंकि सेबी उनके प्रशासकीय समिति का सदस्य रहते उनकी नियुक्ति को मंजूरी नहीं देगा। सेबी की सराहना करनी होगी कि उसकी दृष्टि तीक्ष्ण है। उसने लिमये की दोहरी भूमिका के टकराव को पहचाना। अधिकांश आईपीएल फ्रैंचाइजी की एक या अधिक कंपनियां एनएसई में सूचीबद्ध हैं जहां लिमये को प्रमुख का पद संभालना है। क्या वह बीसीसीआई और एनएसई दोनों जगह रह सकते हैं? क्या देश के प्रमुख स्टॉक एक्सचेंज का सीईओ इतना समय रखता है कि वह बीसीसीआई को संभालने जैसे समय खपाऊ और विवादास्पद काम के लिए वक्त निकाल सके।

कुछ दिन पहले इकनॉमिक टाइम्स ने कहा था कि लिमये ने सेबी को संकेत दिया था कि प्रशासकीय समिति में उनका काम अगस्त तक समाप्त हो जाएगा, वह अदालत से गुजारिश करेंगे कि उनको मुक्त किया जाए। अगर गुहा के बाद समिति से एक और विकेट गिरता है तो क्या होगा? क्या इस बीच एनएसई मुखियाविहीन रहेगा? इस बीच खबर आई कि एनएसई के उप प्रमुख रवि नारायण ने इस्तीफा दे दिया क्योंकि सेबी ने अवैध अल्गोरिथम कारोबार को लेकर जांच तेज कर दी थी। यानी एनएसई पूरी तरह मुखिया विहीन हो चुका है। आने वाले दिनों में वित्तीय और बैंकिंग क्षेत्र में ऐसे टकराव के कई मामले सामने आएंगे। ये सब क्रिकेट की सफाई के लिए न्यायिक हस्तक्षेप के अनचाहे परिणाम के रूप में सामने आएगा। किस्सा फिर वही होगा। क्रिकेट का गठजोड़, पैसा और ताकत, भले ही तरीका अलग हो। जब प्रशासकीय समिति ने काम संभाला तो राय ने कहा था कि वह क्रिकेट के प्रहरी की भूमिका निभाएंगे लेकिन ताकत अच्छे-अच्छों को बिगाड़ देती है और क्रिकेट की ताकत के तो कहने ही क्या।

(लेखक अंतराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं यह उनके निजी विचार हैं।)

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