सिर्फ चार दिन और एक नुक्कड़ नाटक ने तोड़ी सदियों की चुप्पी

सिर्फ चार दिन और एक नुक्कड़ नाटक ने तोड़ी सदियों की चुप्पी

सौम्या बैजल

आवाजें जब आवाजों से मिलती हैं तो और बुलंद बनती हैं, जिन्हें अनसुना करना मुश्किल हो जाता है। यही सच था मेरे 4 दिन के सफर का, जो मैंने हाल ही में बज्जू, राजस्थान में बिताए। राजस्थान, जहां बीते हुए दौर की, उसकी खामोशी की, स्थिरता की, मासूमियत की झलकियां आपको गांव के आज में नजर आ जाएंगी। लेकिन बीते हुए दौर की दिक्कतें उनके आज की सामान्य स्थिति का भी हिस्सा हैँ। जातिगत भेदभाव, बाल विवाह, पितृसत्ता और कई ऐसी सामाजिक धारणाएं, शिक्षा की कमी, बेरोजगारी के साथ मिलकर उनके आज को उनके अतीत से जुदा नहीं होने देतीँ। लेकिन गांव की खुशबू, उसकी मिठास शहरों की बेवजह की भीड़भाड़ और तनाव से कोसों दूर है।

सच है कि ग्रामीणों जैसे जुझारू, संवेदनशील और हिम्मती लोग भी कम हैं। जिस तरह वह आपको अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लेते हैं और आपकी जिंदगी का हिस्सा बनना चाहते हैं, उससे साथ रहने की, जीने की परिभाषा बदल जाती है। हमारे देश को, उसके शहर में बसे लोगों को गांववालों से सीखना होगा कि अलग होते हुए साथ रहना किसे कहते हैं।

उरमूल सीमांत समिति और बज्जू की लड़कियां



बज्जू में बसी उरमूल (उत्तर राजस्थान मिल्क यूनियन लिमिटेड) सीमांत समिति कई वर्षों से वहां अच्छा काम करती आई है। लोगों को समय-समय पर ट्रेनिंग, कसीदाकारी की जानकारी, महिला रोजगार, लड़के और लड़कियों की शिक्षा जैसे विभिन्न विषयों पर काम करना, सामाजिक कुप्रथाओं पर सवाल उठाना, सामुदायिक सोच बदलना उनका मकसद रहा है। उरमूल एक शांत जगह जैसी है। यहां सभी की दिनचर्या एक सी है। यह एक परिवार की तरह है जहां लोग एक-दूसरे के साथ खड़े हैं एक-दूसरे को सहारा देने एक-दूसरे को सशक्त बनाने के लिए।

यहां बज्जू में मेरी मुलाकात 11 लड़कियों से हुई, जो आसपास के गांवों में रहती हैं और मेरी वर्कशॉप का हिस्सा बनी थीं। 14 साल की बच्चियां जो मुझसे नुक्कड़ नाटक बनाने की प्रक्रिया, नाटक के रूप और नाटक की जरूरतों के बारे में समझना चाहती थीं। मुझे अब नुक्कड़ नाटक करते हुए लगभग 15 साल हो चुके हैं। लेकिन जब भी एक नए नाटक की, या नाटक बनाने की बात होती है तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसी सक्रिय और सार्वलौकिक कला ढूंढ़ना मुश्किल है जो किसी भी चीज पर निर्भर नहीं। न साज, न मंच, न वेषभूषा। सिर्फ अभिनेता, उसकी आवाज और लेखन … जो बात को उस तरह से कहे जिस तरह से वह सुनी जानी चाहिए। नाटक खुद उस तरह से लिखा जाए, उस तरह से बनाया जाए कि वह भाषा का भी मोहताज न रहे। नाटक की भाषा अपने आप में एक अलग भाषा है और इसीलिए नुक्कड़ नाटक में उसकी कथा और उस कथा को दिखाने और सुनाने वाला सबसे अनिवार्य होता है। वहीं से शुरू हुई हमारी 4 दिन की कहानी, बाल विवाह की कुप्रथा को खत्म करने के उद्देश्य से बना नाटक।

ढेरों सवालों ने गिरा दी हिचक की दीवार

पहले दिन लड़कियों की हिचकिचाहट स्वाभाविक थी। मैं उनके लिए बाहर से आई नई इंसान थी जो उनसे आवाज उठाने और खुलने की बातें कह रही थी। कौन थी मैं? क्यों मानें वह मेरी बातें? यह हिचकिचाहट विरोध करने के लिए नहीं, न समझ पाने की वजह से थी। इसलिए पहले 3 घंटे हमने बहुत सी बातें की। वे क्या बनना चाहती हैं, बाल विवाह के बारे में उनकी सोच, सहेलियों के हुए बाल-विवाह – इन सभी बातों से उन्हें और मुझे दोनों को अपनी दूरियां– वर्ग की, भाषा की, विशेष अधिकारों की कम होती नजर आईं। उनका पलटकर मुझसे वह सारे सवाल पूछना, मेरा घर, दोस्त और दफ्तर की तहकीकात करना और मेरा उन्हें उत्तर देना मुझे उनके करीब ले गया और वहां से हमारे नाटक बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई।

पहले दिन उरमूल में बसने वाले कई लोगों से मैंने आज भी बाल विवाह करवाने के कारण समझने की कोशिश की, जिसकी सबसे पहली वजह थी पैसा बचाना। बेटी को दूसरे घर तो जाना ही है, तो वे लोग ही उसे और उसके खर्च संभालें। जरा सोचिए, कुछ पैसा बचाने के लिए हम एक लड़की की इच्छाओं का, उसकी काबिलियत का, जिंदगी अपनी तरह जीने के हक का गला कितनी आसानी से घोंट देते हैं। अपनी वर्कशॉप की बच्चियों को यह दिखाने में और उनकी यह बात समझने में बिल्कुल वक्त नहीं लगा। जब बात एक विचार, एक धार्मिक उपदेश से निकलकर आम जिंदगी में होती नाइंसाफी की तरह दिखती है तो उसे समझना और उसका विरोध करना और भी आसान हो जाता है। धीमे-धीमे एकजुटता बढ़ी और नाटक जारी हुआ।

नाटक बना आत्मविश्वास जगाने का जरिया

उस रात अपनी झोंपड़ी के बाहर, आकाश तले लेटे हुए मैं नाटक की अहमियत के बारे में सोचती रही। लड़कियों में आत्मविश्वास की कमी नहीं थी, लेकिन वह दबा हुआ था और नाटक उसे बस उभार रहा था। बाल विवाह के प्रति उनकी सोच को और बुलंद बना रहा था। उसी गांव में और 11 ऐसी आवाजें तैयार हो रही थीं जिन्हें इस कुप्रथा के बारे में जानकारी थी और आवाज उठाने का साहस था। नारीवाद पर हमारी बातें शायद उनकी सोच में थोड़े और बदलाव, थोड़े नए सवाल पैदा कर रही थीं। सवाल उठाना आपके अपने जीवन को सक्रिय बनाए रखने की विशेष खूबी रखता है। इतना सब कुछ एक कला ही कर सकती है। लेकिन इतना कुछ एक ही नाटक कर लेगा, मैंने यह नहीं सोचा था।

अगले तीन दिन तपती गर्मी में मैं उनका नाटक करने की प्रक्रिया से, उसके अंगों से परिचय कराती रही और ढाई दिन बाद हमारे नाटक का अंश तैयार हुआ। यह नाटक मेरे कहने पर उरमूल में ट्रेनिंग के लिए आए हुए दूसरे लोगों के सामने रखा गया, सिर्फ इसलिए कि नुक्कड़ नाटक का दर्शक और मंच पर होने वाले नाटक का दर्शक अलग होता है। नुक्कड़ नाटक के दर्शक दर्शक भी होते हैं और नाटक का हिस्सा भी। दर्शक और नाटक खेलने वाले समान स्तर पर ही खड़े या बैठे होते हैं। नाटक खेलते हुए इसका अंदाज रखना और दर्शक की आंखें खुद पर होने के आभास के साथ नाटक करना आसान नहीं होता। नाटक अच्छी तरह करने के लिए यह आभास उनसे लिए जरूरी थे।




बुलंद आवाजों के पीछे थे बुलंद इरादे

अगले दिन नाटक तैयार हुआ। मेरे लिखे हुए संवाद, गाने गा-गाकर याद किए गए और नाटक के कुछ अंक हमने रूपक की तरह दिखाए। जिन्हें करने में लड़कियों को भी बहुत मजा आया। तब तक उनमें बिना भूले अच्छा नाटक करने का जोश आ चुका था। उरमूल में हम रात को बाहर ही सोते थे और हमारी आंख सुबह की पहली किरण से ही खुलती थी। उस दिन मेरी आंख मेरी लड़कियों के वॉयस टेस्ट करती आवाजों ने खोली (जो हम नाटक करने वाले सभी लोगों को करना होता है, जिस से कि आवाज खुली रहे और गला न फटे) उनकी मेहनत और मेरे और नाटक के प्रति लगाव ने मेरे दिल को छू लिया।

अगले दिन सुबह उरमूल के सभी सदस्यों के सामने हमने नाटक का मंचन किया। लड़कियों की बुलंद आवाजें सुनकर और उनके पीछे के बुलंद इरादे, जिनसे मैं वाकिफ थी, और यह कहती हुईं वे आवाजें कि "न बाल विवाह करूंगी, न करने दूंगी" मेरा गुरूर बन गईं। उरमूल में नाटक के मंचन के बाद, वहां के कई सदस्यों ने यह प्रस्ताव रखा कि हम नाटक का मंचन बाजार में भी करें। मेरा मानना है कि नुक्कड़ नाटक का असली इम्तिहान सिर्फ तब होता है जब उसे सच में एक नुक्कड़ पर अजनबियों के बीच खेला जाए। उसी से नाटक की शक्ति का अंदाजा होता है। यही प्रस्ताव मैंने अपनी लड़कियों के सामने रखा, जिस जोश से उन्होंने हां की वह मेरी सोच के भी बाहर था। इस तरह हम नाटक खेलने लड़कियों की टोली बाजार पहुंची।

तालियों की आवाज से ढहा पितृसत्तामक ढांचा

वहां दर्शकों को इकट्ठा करना था। लड़कियों ने जब चारों ओर देखा तो वह थोड़ा घबराईं। हल्की सी घबराहट नाटक के लिए जरूरी भी होती है। लेकिन अपने ही पिता, उनके दोस्तों के सामने नाटक खेलना, जिसमें नारीवाद के कई अंश मौजूद थे, एक पितृसत्तामक माहौल में उसे खेलना बिल्कुल भी आसान नहीं है। ज्यादातर दर्शक पुरुष ही होंगे यह बात भी साफ थी। वह सभी इस मुश्किल को महसूस कर रही थीं लेकिन उसे शब्दों में कोई नहीं उतार रहा था। यह देखकर मैंने पूरे बाजार में 'आओ, आओ नाटक देखो' चिल्लाकर दर्शकों को इकट्ठा किया। मेरी आवाज उनकी आवाजों से मिलते ही उनमें एक नया हौसला आया। एक बार जब नाटक शुरू हुआ तो मेरे गुरूर की कोई सीमा नहीं थी। जिस आत्मविश्वास के साथ, खुलकर वह अपने लोगों के बीच बाल विवाह के विरोध में बोलीं, नारीवाद की सबसे बड़ी बात – कि जिंदगी जीने का, आर्थिक सक्षमता का हक एक औरत को भी है और वह उसे छीन लेंगी, उन्होंने चिल्ला-चिल्लाकर कही। नाटक के दौरान कई संवादों पर तालियां बजीं। लेकिन लड़कियां रुकी नहीं। उस समय उनका सारा ध्यान सिर्फ नाटक अच्छा करने पर लगा हुआ था। नाटक खत्म होने के बाद जब तालियां फिर बजीं और वह दर्शकों से पूछने गईं कि उन्हें क्या याद रहेगा तो दर्शकों ने उन्हें अपनी-अपनी लाइन सुना दी, तब वह समझीं कि वे क्या कर आई हैं। फिर उनके जोश और खुशी की कोई सीमा नहीं थी। अगले दिन मेरे बिना (मेरे ही कहने पर) उनके अपने गांव में नाटक का मंचन किया गया।

4 दिन में आवाजें दहाड़ें बन चुकी थीं। पितृसत्तामक ढांचे को गिराने का एक यही तरीका है। आवाजें इतनी बुलंद और इतनी एकजुट हों कि उन्हें तोड़ा न जा सके। मैं एक आवाज वहां गई थी जो 11 और के साथ जुड़ी। अब वे 11 आवाजें आगे चलकर अपने साथ कुछ और आवाजें जोड़ेंगी और इसी तरह यह देश बदलेगा, क्योंकि हम बदलेंगे इसे।

(सौम्या बैजल, लेखक, कहानीकार और कवियित्री हैं। वह पिछले 15 वर्षों से नुक्कड़ नाटक से जुडी हुई हैं)

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