क्या राजस्थान में प्रचार रणनीति में बीजेपी से पिछड़ रही है कांग्रेस

मौजूदा चुनावों में जहां मतदान के बाद जहां छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में कांटे की टक्कर बताई जा रही है वहीं राजस्थान को कांग्रेस की सबसे बड़ी उम्मीद कहा जा रहा है।

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छत्तीसगढ़, मिजोरम और मध्यप्रदेश में मतदान हो जाने के बाद अब राजस्थान और तेलंगाना में ही मतदान होना बाकी है। इन पांच राज्यों के चुनाव के नतीजे काफी अहम हैं क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले इन राज्यों के परिणाम मोदी सरकार और विपक्ष दोनों को ही मनोवैज्ञानिक बढ़त देंगे। मौजूदा चुनावों में जहां मतदान के बाद जहां छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में कांटे की टक्कर बताई जा रही है वहीं राजस्थान को कांग्रेस की सबसे बड़ी उम्मीद कहा जा रहा है। राजस्थान में हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन का इतिहास भी रहा है जो इस बार कांग्रेस के पक्ष में जाता है।

लेकिन क्या कांग्रेस राजस्थान में आसानी से जीत हासिल कर लेगी। 5 साल पहले 2013 में 8 दिसंबर को जब चुनाव के नतीजे आये थे तो बीजेपी ने 163 सीटें जीत कर कांग्रेस का सफाया कर दिया था। कांग्रेस तब 21 ही सीटें जीत पाई थी। माना जा रहा है कि इस बार जनता बदलाव के मूड में है और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को हटाना चाहती है। लेकिन चुनाव प्रचार से लेकर सोशल मीडिया रणनीति में भारतीय जनता पार्टी ने अब तक कांग्रेस को पीछे छोड़ रखा है।

राजस्थान में जहां बीजेपी ने प्रधानमंत्री मोदी की 10 रैलियों का कार्यक्रम बनाया है वहीं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के साथ मोदी कैबिनेट के तमाम मंत्री और पार्टी के बड़े नेता भी राज्य में ताबड़तोड़ प्रचार और जनसंपर्क कर रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस के पास अब तक राहुल गांधी के अलावा अशोक गहलोत और सचिनपायलट का ही चेहरा है जिनके दम पर वह प्रचार कर रही है। ऐसे में प्रचार की लड़ाई में बीजेपी कहीं मज़बूत पार्टी दिख रही है।

कांग्रेस की एक दिक्कत पार्टी के दो चेहरों गहलोत और पायलट के बीच अनबन भी है। दोनों ही नेता मुख्यमंत्री पद की दौड़ में हैं और पार्टी दो खेमों में बंटी है। राज्य में घूमने पर पता चलता है कि जहां जनता में बदलाव के सुर हैं। वहीं यह भी साफ दिखता है कि कांग्रेस अति आत्मविश्वास की वजह से प्रचार में बीजेपी की तरह आक्रामक नहीं हुई है।

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राजस्थान के एक बड़े अख़बार के संपादक का कहना है कि न्यूज़ रूम में ख़बरों की आमद के मामले में बीजेपी के सामने कांग्रेस कहीं भी नहीं ठहर पा रही है। "हर रोज़ बीजेपी नेताओं की रैलियों और जनसंपर्क के साथ प्रेस कांफ्रेंस इत्यादि की 40 से 50 ख़बरें हमारे पास आती हैं। वहीं कांग्रेस के दो ही नेता (पायलट और गहलोत) मैदान में दिख रहे हैं। हम ख़बरों में संतुलन कैसे बनायें।"

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इलेट्रॉनिक मीडिया में भी बीजेपी ने मज़बूत पकड़ बनाई हुई है और उनका सोशल मीडिया प्रचार कांग्रेस से कहीं आगे है। दैनिक भास्कर के स्टेट एडिटर लक्ष्मी प्रसाद पंत कहते हैं, "बात सिर्फ खबरों की संख्या तक ही सीमित नहीं है। बीजेपी प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री समेत अपने कद्दावर नेताओं को बदल-बदल कर प्रचार में उतार रही है। उनके सामने कांग्रेस के सचिनपायलट और गहलोत को ही कितनी बार छापा जा सकता है।"

कांग्रेस की एक दिक्कत पार्टी के दो चेहरों गहलोत और पायलट के बीच अनबन भी है। दोनों ही नेता मुख्यमंत्री पद की दौड़ में हैं और पार्टी दो खेमों में बंटी है। राज्य में घूमने पर पता चलता है कि जहां जनता में बदलाव के सुर हैं। वहीं यह भी साफ दिखता है कि कांग्रेस अति आत्मविश्वास की वजह से प्रचार में बीजेपी की तरह आक्रामक नहीं हुई है। राज्य में कांग्रेस के अति आत्म विश्वास को लेकर एक मज़ाक चल रहा है कि पार्टी ने चुनाव से पहले ही अपनी सरकार की कैबिनेट बना ली है उसे बस अपना मुख्यमंत्री ही तय करना है। लेकिन सच ये है कि कांग्रेस ने गांवों में पानी की कमी, किसानों की दुर्दशा और नौजवानों में बेरोज़गारी जैसे मुद्दे प्रचार में उस तरह से नहीं भुनाये हैं जिस स्तर पर वह इनका दोहन कर सत्ता विरोधी लहर को तेज़ कर सकती थी।

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प्रचार के अलावा टिकट बंटवारे और घोषणापत्र प्रकाशित करने के मामले में भी कांग्रेस सुस्त दिखी है। कम से कम 30 से 40 सीटों पर कांग्रेस के टिकट कमज़ोर उम्मीदवारों के पास गये हैं। जानकार कहते हैं कि इस गड़बड़ी की वजह बड़े नेताओं द्वारा अपने करीबियों को टिकट दिलाने की ज़िद है। इस वक्त सभी को लग रहा है कि कांग्रेस राज्य में सत्ता में आ रही है तो पार्टी में टिकट पाने और दिलाने की होड़ लगी है। इसके अलावा घोषणापत्र लाने के मामले में भी उसने देरी कर दी है।

हालांकि कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि मध्यप्रदेश में मतदान हो जाने के बाद अब कांग्रेस आखिरी हफ्ते में अपने पूरी ताकत प्रचार में झोंकेगी और इस कमी की भरपाई की कोशिश करेगी।


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