हमे भिखारी मानसिकता नहीं, उद्यमशील सोच चाहिए
बहुत साल पहले तमिलनाडु सरकार ने चुनाव के समय टीवी बांटे थे और उत्तर प्रदेश सरकार ने लैपटॉप। इसके अलावा सरकारों ने मुफ्त में बिजली और पानी तथा लगान माफ़ी, बिना ब्याज का कर्ज़ तथा ऋण माफ़ी आदि के हथकंडे अपनाए हैं। जब इतने से तसल्ली नहीं हुई, तो दसों हजार रुपये प्रति माह और लाखों रुपया सालाना खैरात में बाँटा है। इस तरह की खैरात से आम आदमी में भिखारी मानसिकता पैदा होती है और वह ऐसी खैरात की प्रतीक्षा करता रहता है। गाँव का किसान जो कृषि और पशुपालन के कार्यों में दिन रात व्यस्त रहता था, वह अब साल में दस महीने बिना काम के रहता है।
इस प्रकार सरकारों द्वारा जो श्रम राष्ट्रीय उत्पादकता में लगाया जा सकता था, उद्यमशील नागरिक तैयार किये जा सकते थे, उन्हें आलसी और नाकारा बनाया जा रहा है। बैंकों से बिना ब्याज का पैसा या कर्ज़ बाद में माफ़ हो जाता है, यदि ऐसा नहीं हुआ और कर्ज़माफ़ी की प्रतीक्षा में बैंक द्वारा वसूली आरम्भ हो गई, तो किसानों को आत्महत्या तक करनी पड़ती है। इसका परिणाम यह है कि जिस देश में स्वाभिमानी और जुझारू ग्रामीण हुआ करते थे, उन्हें अब खैरात बाँट-बाँट कर भिखारी और नाकारा बनाया जा रहा है।
फ्री सामानों का लालच नहीं, रोज़गार बढ़े
एक समय था जब चीन के लोग अफीमची हो गए थे और दाने-दाने को मोहताज हो गए थे, उनके देश में तब माओत्से तुंग ने देशवासियों को जगाने पर जोर दिया था, जिस कारण आज चीन एक अग्रणी देश है। यह सच है कि चीन वालों ने अपने देश की प्रगति के लिए आजादी की बहुत बड़ी व्यक्तिगत कीमत चुकाई है। भारत की राजनीतिक पार्टियाँ जो खैरात बांट रही हैं, वह देश में प्रजातंत्र की जड़ों में मट्ठा डाल रहे हैं। हम दफ्तर के बाबू द्वारा रिश्वत लेने की आलोचना करते रहते हैं, लेकिन यह खैरात वोट के समय, वोट के बदले दी जाने वाली रिश्वत ही तो है, तो बाबुओं का क्या गुनाह ?
50 के दशक में भारतीय जनसंघ जो भारतीय जनता पार्टी की पूर्व अवतार थी, उसने उद्घोष किया था ‘हर हाथ को काम’ और ‘हर खेत को पानी’। यह बहुत ही सार्थक नारा था, लेकिन वर्तमान रूप में उसे भुला दिया गया। इसके विपरीत कम्युनिष्टों और समाजवादियों का नारा था, ‘धन और धरती बट के रहेगी’। यह खतरनाक नारा था, लोगों का सोचना था कि धनवानों और जमीदारों की सम्पत्ति को गरीबों में बिना प्रयास मुफ्त में बाँट दिया जाएगा। क्या हुआ उन पार्टियों का, क्योंकि उस नारे पर कार्रवाई नहीं कर पाए और आखिर जनता उनसे निराश हो गई। जब कांग्रेस ने 70 के दशक में ‘’गरीबी हटाओ’’ का नारा दिया, तो यह नहीं बताया कि गरीबी कैसे हटेगी? लोकलुभावन और खोखले नारे समय-समय पर दिए जाते रहे और आज भी दिए जा रहे हैं। लेकिन खैरात बांटना कामयाब हो रहा है और जनता को यह नहीं पता कि इस खैरात का अंजाम क्या होगा और हमारा भविष्य क्या होगा?
12 महीने हो कमाई का जरिया
जब गांव के लोगों को खैरात में पैसा मिलता है, चाहे महिलाओं के नाम से या पुरुषों के नाम से, वह सब पुरुषों के पास ही आता है और उसका सदुपयोग होगा यह गारंटी भी नहीं है। मुफ्त के पैसे से तमाम लोग शराब पियेंगे, जुआ खेलेंगे और कुछ काम न होने के कारण समय बर्बाद करेंगे। उनकी दशा उस भिखारी की तरह हो जाती है, जो दाता के इंतजार में सड़क किनारे बैठा रहता है, और जब कुछ नहीं मिलता, तो भूखे रहना भी पड़ता होगा। इस प्रकार खैरात बांटने वाली सरकारें आम आदमी को भिखारी मानसिकता की ओर ले जा रही हैं और प्रजातन्त्र का भविष्य अंधकार के अलावा कुछ नहीं। आजकल खेती-किसानी का काम मशीनों द्वारा होता है, किसी किसान के घर पर दो बैलों की जोड़ी नहीं दिखाई देती और किसानी का काम कुल मिलाकर 2 महीने में समाप्त हो जाता है। किसान करीब 10 महीने बिना काम के रहता है, यदि उस अवधि में उसको कुछ काम मिल जाए, तो उसकी कार्य क्षमता नष्ट नहीं होगी और भिखारी प्रवृत्ति जागृत नहीं होगी।
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किसानों को उपज का सही दाम
कुछ लोगों का सोचना है कि किसानों की पैदावार का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल जाए तो उनका जीवन सुधर सकता है, लेकिन समर्थन मूल्य से उन्हीं किसानों को लाभ होगा जो बड़ी मात्रा में अपनी पैदावार बेचते हैं। सामान्य किसान के पास ज्यादा बेचने को नहीं होता, आवश्यकता अनुसार कुछ पैदावार बेच पाते हैं, जिसे उन्हें गाँवों के व्यापारियों के हाथ ही बेचना पड़ता है, क्योंकि छोटे किसानों को पैसे की तुरंत आवश्यकता होती है, और सरकारी खरीद केन्द्रों पर पैसा महीनों बाद मिलता है। किसान की पैदावार कृषि आधारित उद्योगों के लिए कच्चे माल का कामकर सकती है, लेकिन इसका लाभ तभी होगा जब ऐसे उद्योग गाँवों में खोले जाएं। जहाँ कच्चे माल के रूप में कृषि उत्पाद काम आए और ग्रामीण किसानों तथा मजदूरों को काम मिल सके। अभी होता यह है कि किसान का गेहूं ₹25 प्रति किलो व्यापारी खरीद कर शहर ले जाकर वहां दलिया बनाता है और किसान के बेटे आवश्यकता पड़ने पर वही दलिया ₹60 किलो खरीदते हैं।
यही हाल चना दाल का है, जिससे बेसन बनाकर बिचौलिए और उद्योगपति लाभ उठाते हैं, किसान को इसका लाभ नहीं मिलता। इस तरह खाद्य पदार्थों की प्रोसेसिंग और किसानों द्वारा पैदा की गई पैदावार चाहे फिर वह अनाज हो, सब्जियां हो या फल हो, उन पर आधारित उद्योग खोले जाएं, तो किसानों को दरवाजे पर काम मिल सकता है और उनकी फसल का उचित दाम भी मिल सकता है। ऐसी हालत में किसान को खाली समय में काम मिल जाएगा, गाँव के मजदूरों को रोज शहर नहीं भागना पड़ेगा और किसानों की पैदावार का उचित दाम भी मिल जाएगा। ऐसी दशा में खैरात की आवश्यकता नहीं होगी और किसान या ग्रामीण लोग स्वावलम्बी हो सकेंगे। यदि खैरात की जगह स्वावलम्बन दे सकें, तो यह ग्रामीण क्षेत्र के लिए बहुत कल्याणकारी काम होगा।
यदि किसानों के लिए बिजली मुफ्त, पानी फ्री, लगान माफ और इस तरह के विविध फ्री वाले काम किए गए, तो फिर इसके लिए सरकार के पास पैसा कहाँ से आएगा? यह राजनेता शायद नहीं सोचते और यदि सोचते हैं तो उसके लिए गंभीर नहीं है। सच्चाई यह है कि खैरात के रूप में बांटा जाने वाला पैसा, देश में मूलभूत ढांचा खड़ा करने में लगना चाहिए।
रोजगार बढ़ाने वाली हो शिक्षा प्रणाली
ग्रामीण इलाकों में जो शिक्षा दी जा रही है, उसके बल पर ना तो कोई उद्यम कर पाना संभव है, और ना नौकरी मिल पाती है। शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए या प्राविधिक शिक्षा की व्यवस्था के लिए ठीक प्रकार का इंतजाम नहीं किया जाता और परिणाम यह होता है कि अनावश्यक रूप से हाई स्कूल, इण्टर फिर बीए और फिर एमए करता चला जाता है, और अंत में विद्यार्थी बिना रोजगार के घर में बैठता है। यदि यूनिवर्सिटी शिक्षा के पहले ही उन्हें कुछ शिल्प सिखा दिया जाए और वह अपना काम कर सकें, तो इतनी बेरोजगारी नहीं होगी और खैरात की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। स्वावलम्बन के लिए शिक्षा और रोजगार दिलाने वाली शिक्षा बहुत ही आवश्यक है, जिस पर जोर नहीं दिया जाता।
पुराने जमाने में जो पारिवारिक व्यवसाय होता था, वह एक मौका होता था लोगों को सीखने का और काम सीख कर पैसा कमाने का, फिर चाहे वह बढ़ाई, लोहार, प्लंबर या इलेक्ट्रीशियन का काम हो, सब यदि घर में या गाँव में सीखे और सिखाए जा सकें, तो फिर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट करने के बाद बेकार बैठने की नौबत नहीं आएगी। सरकार अपना व्यवसाय करने वालों को प्रोत्साहन देती है बैंक से कर्ज़ देती है, लेकिन व्यवसायी जब अपना माल तैयार करता है, तो उसके सामने मार्केटिंग की समस्या भी होती है, जिस तरह खेती के लिए प्रोत्साहन दिया जाता है, चाहे समर्थन मूल्य के रूप में अथवा फसल खराब होने पर मुआवजा के रूप में, इस तरह उनके द्वारा बनाए गए माल की बिक्री में भी सरकार का सहयोग चाहिए होगा, यदि खैरात बाँटने से छुटकारा पाना है, तो विविध क्षेत्रों में जानकारी, पूँजी और विपणन पर ध्यान देकर ग्रामीण लोगों के स्वाभिमान को बचाया जा सकता है।
जर्मनी और जापान जैसे यूरोप और एशिया के देश विश्व युद्ध की मार झेलने के बाद फिर से खड़े हो गए और वहाँ की प्रजा भीख माँगने या खैरात के रास्ते पर नहीं चली। हमारे देश में भी यह मानसिकता पहले नहीं थी। यहाँ के लोगों का मानना था कि उद्यम से ही कार्य सिद्ध होते हैं, मनोरथ से नहीं। खैरात की मानसिकता कुछ ही वर्ष पुरानी है।
देश की बहु पार्टी व्यवस्था में उनके पास उपलब्धियां बताने को तो हैं नहीं, वह खैरात बाटकर वोटर को खरीदना चाहती हैं। जब तक हमारे देश में खैरात जैसी अनैतिक सोच पर विराम नहीं लगेगा तब तक स्वस्थ प्रजातन्त्र विकसित नहीं होगा। इसके लिए शासक दल को इच्छा शक्ति का प्रदर्शन करना होगा, क्योंकि बाकी दलों के पास यह समस्या नहीं है, कि हम अपने वादों को पूरा कैसे करेंगे, बस वादे करना और चुनाव में जो कुछ मिल जाए उसे हासिल करना यही मानसिकता है उन सभी की। आशा की जानी चाहिए कि निकट भविष्य में इन सभी को सद्बुद्धि आएगी और स्वस्थ प्रजातन्त्र के मार्ग पर देश फिर से आगे बढ़ेगा।
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बेरोजगारी का एक प्रमुख कारण है दिशाहीन शिक्षा
आजकल जो नेता लोग बेरोजगारी की दुहाई दे रहे हैं। अगर उनके बारे में सोचा जाए, यदि वे मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए होते और जो योग्यता उन्होंने हासिल की है, उसके आधार पर नौकरी की तलाश में मार्केट में आ जाते, तो उन्हें कौन सी नौकरी मिलती? हो सकता है बाबूगीरी की नौकरी मिल जाती, कुछ को तो द्वारपाल की भी नौकरी मिलनी मुश्किल हो जाती। यह सब इसलिए कि उन्होंने एक बड़े परिवार में बिना कुछ किए धरे ही पार्टी के मुखिया बनने का अधिकार प्राप्त कर लिया। जब कोई एंपलॉयर एक कर्मचारी को रखेगा तो उसकी योग्यता, क्षमता, अनुभव आदि के बारे में विचार करेगा और तब उसे रोजगार देगा। मान कर चलिए कि जो लोग बेरोजगार हैं और पढ़े-लिखे भी हैं, उन्होंने डिप्लोमा कर-कर के डिग्रियाँ बटोर-बटोर कर अपने पास रख ली हैं, लेकिन किसी कम्टीशन में भाग लिया हो तो हैसियत का पता चले। मुख्य रूप से समस्या इस बात की नहीं है कि देश में काम नहीं है।
बेरोजगारी का एक प्रमुख कारण है दिशाहीन शिक्षा, जिसमें बच्चों को यह नहीं पता कि किस मंजिल तक जाने के लिए पढ़ रहे हैं और उसे पाने का रास्ता क्या है? घरवालों को भी यह नहीं मालूम कि वह अपने बच्चों को किस लिए पढ़ा रहे हैं। मुझे लगता है सरकार स्कूल दर स्कूल खोलती जा रही है, और वह यह नहीं जानती कि यह स्कूल हम किस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए खोल रहे हैं। 70 साल पहले से योजना आयोग बना था, लेकिन मैं समझता हूं शिक्षा के अलावा बाकी सब चीजों की प्लानिंग होती थी। अब तो नीति आयोग आ गया है और पुरानी व्यवस्था समाप्त हो चुकी है।
क्षमता और योग्यता के अनुरूप काम नहीं मिल पाता
जिन लोगों को काम की आवश्यकता होती है और भले ही किसी काम के लिए ओवर क्वालिफाइड होते हैं, तब भी वह काम को स्वीकार करने में संकोच नहीं करते। हमें ध्यान रखना चाहिए कि हमारे देश के बहुत ही महान गणितज्ञ रामानुजम, जो बाद में सारी दुनिया में मैथमेटिशियन के रूप में विख्यात हुए, उन्होंने प्रारंभिक दिनों में रेलवे में क्लर्क की नौकरी स्वीकार कर ली थी, शायद आर्थिक दशा ने मजबूर किया होगा। ऐसे अनेक उदाहरण हमारे सामने दैनिक जीवन में आते हैं जब योग्यता अधिक होते हुए भी क्षमता और योग्यता के अनुरूप काम नहीं मिल पाता। ऐसे लोगों को यदि चाहे तो बेरोजगार कह सकते हैं, लेकिन वे लोग कभी भी सड़कों पर हो हल्ला नहीं मचाते। सड़कों पर हो हल्ला मचाने के लिए बेरोजगार लोगों को इकट्ठा करके कुछ राजनेता जिनके पास काम नहीं है, और जो स्वयं बेरोजगार हैं, वह इन लोगों का मार्गदर्शन करते हैं। केवल बेरोजगारों का नहीं, बल्कि बात-बात में कभी किसानों को, कभी पहलवानों को बरगलाकर देश का कीमती समय बर्बाद करवाते हैं।
बेरोजगारी बढ़ने के अन्य कारण
बेरोजगारी बढ़ाने में कुछ नियम कानून भी बाधक होते हैं। जैसे हजारों लोगों की भर्ती हो जाने के बाद यदि आरक्षण कम हुआ तो सारी भर्तियां निरस्त कर दी जाती हैं। ऐसा एक बार नहीं अनेक बार किसी न किसी कारण से हो चुका है और इसका कोई पक्का निदान सामने दिखाई नहीं पड़ता, क्योंकि अनेक बार आरक्षण कोटा को भरने के लिए पर्याप्त कैंडिडेट नहीं मिल पाते और आरक्षण के नियम को पूरी तरह लागू नहीं किया जाता। अध्यापकों की भर्ती में अनेक बार करीब 60000 तो कभी और ज्यादा चयनित लोगों की भर्ती को निरस्त कर दिया जाता है, माननीय अदालत के द्वारा। अब यह है कि आरक्षण का सवाल और भी जटिल होने वाला है जब देश की 3000 जातियाँ गिन-गिन कर लामबन्द की जाएंगी और प्रत्येक जाति अपनी आबादी के हिसाब से आरक्षण मांगेगी। ऐसी हालत में एक अन्य तरफ दफ्तरों, कारखानों और उद्यम के प्रतिष्ठानों में जगह खाली रहेगी, तो दूसरी तरफ कितने ही लोग बेरोजगार पड़े रहेंगे। ऐसी विषम परिस्थिति मैंने पश्चिमी देशों में कभी नहीं देखी और मैं समझता हूँ कि समाजवादी और साम्यवादी देशों में भी यह स्थिति नहीं आती है।
बात सिर्फ रोजगार की नहीं, बल्कि विशेषज्ञता, स्वदेशी व्यवसाय और देश की प्रगति का भी है। जब देश आजाद नहीं हुआ था, तो तब के भारत में ढाका की मलमल से एक से एक अच्छे कपड़े बनाए जाते थे। लेकिन मैनचेस्टर से आने वाले कपड़ों ने हमारे जुलाहों द्वारा बनाए गए कपड़ों को दबा दिया और देश में न केवल विशेष प्रकार के वस्त्र, बल्कि सामान्य कपड़े भी नहीं बन पाते थे। गांधी जी ने इस समस्या को हल करने के लिए स्वदेशी खादी और विविध प्रकार के अन्य अवसर पैदा करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया। कुछ ही समय में खादी के वस्त्र प्रतिष्ठा का चिन्ह बन गए और न केवल राजनेता बल्कि अन्य लोग भी इसका उपयोग करने लगे। आजाद भारत में खादी फिर से बढ़ गई और बाहर से आने वाले कपड़े बाजार से हट गए। अब सवाल है कि उन विशेष कार्यक्रमों का क्या हुआ? उनके वंशज उस उद्योग को क्यों नहीं चला पाए।
क्रिएटिव लर्निंग की जरूरत
शिक्षा और रोजगार का सीधा घनिष्ठ संबंध है, परिवार जो प्रारंभिक पाठशाला हुआ करता था, वह अब नहीं रहा। स्कूलों में उद्योग से संबंधित आर्ट और क्राफ्ट का कुछ ज्ञान दिया जाता था जिससे बच्चों का रुझान क्रिएटिव दिशा में बढ़ सके। मैं नहीं जानता कि मुगल काल में शिक्षा व्यवस्था कैसी थी और भारतवासियों को किस प्रकार सनातन ज्ञान दिया जाता था, लेकिन कम से कम स्वतन्त्र भारत में शिक्षा व्यवस्था का राष्ट्रहित में नियोजन होना चाहिए था। अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि शिक्षा या तो साम्यवादियों द्वारा स्वतन्त्र भारत में अथवा विदेशों में पले-बढ़े लोगों द्वारा, जिन्हें भारतीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं का ज्ञान ही नहीं था, उनके द्वारा शिक्षा व्यवस्था चलाई गई। कहने को देश में योजना आयोग बनाया गया, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में कौन सी योजना थी? जिसके तहत भारत की आवश्यकताओं की पूर्ति हो पाई हो? कम से कम अब तो नीति आयोग का गठन हुआ है, लेकिन अभी भी कौन उच्च शिक्षा और कौन प्राविधिक शिक्षा का पात्र होगा? यह फैसला समाज के कर्ता-धर्ता नहीं करते।
मैंने दूसरे देशों में देखा कि बच्चे जब कक्षा 10 पास कर लेते हैं, तो उनके रुझान को देखते हुए उनके मन के विषयों में प्रवेश दिया जाता है और वह कहीं न कहीं अपने लिए स्थान बना लेते हैं, चाहे सरकारी प्रतिष्ठानों में अथवा व्यापारिक संस्थानों में या नहीं तो खुद के व्यवसाय में। उसके बाद अंडरग्रैजुएट छात्रों को उनके रुचि, रुझान और क्षमता के अनुसार सुविधा उपलब्ध है, जहां वे प्रवेश ले सकते हैं और समय से अपना जीवन आरम्भ कर सकते हैं। मैंने देखा कि विदेशों में एम्ए, एमएससी और पीएचडी की कक्षाओं में गिने चुने स्थानीय छात्र-छात्राएं होते हैं, बाकी बाहरी देशों से वहां पढ़ने के लिए जाते हैं।
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हमारे यहां कोई छात्र हाई स्कूल पास करके जब उसकी कुछ समझ में नहीं आता तो वह इण्टरमीडिएट में अपना नाम लिखा लेता है, और इण्टर के बाद बीए, बीएससी, बीकॉम में और तब भी कुछ रास्ता नहीं दिखाई पड़ा तो एम्ए, एमएससी और एमकॉम में नाम लिखा लेता है। इन कक्षाओं में जाने के लिए ना तो कोई एप्टीट्यूड टेस्ट होता है, ना उनकी क्षमता, योग्यता और रुझान पर ध्यान दिया जाता है, इसलिए नतीजा यह होता है कि हमारे विश्वविद्यालय से निकले हुए लाखों-लाखों छात्र-छात्राएं घर में बैठ जाते हैं और चाहते हैं कि उन्हें सरकारी नौकरी मिल जाए, क्योंकि अपना काम शुरू करने के लिए जो आवश्यकता है, उनके पास है नहीं, व्यापारिक संस्थान और कम्पनियां कितने लोगों को रखेंगी? आज के कम्प्यूटर के जमाने में, सरकार बहुत सी नौकरियां देती भी है, लेकिन उनमें कोई ना कोई खामियां निकल आती हैं, और वह नियुक्तियाँ निरस्त हो जाती हैं, जगहें खाली पड़ी हैं, अभ्यर्थी बेरोजगार घूम रहे हैं, यह बीच की दूरी कैसे समाप्त होगी? यह इसका उत्तर सरकारों को, समाजसेवियों को, बुद्धिजीवियों को या शिक्षा संस्थानों को तो खोजना ही होगा। देश की वर्तमान परिस्थितियों में ज्यादा विकल्प नहीं है। जरुरत इस बात कि है हमारे नौजवानों को समयानुकूल प्रासंगिक शिक्षा दी जाए जिससे वे बेकारी और भिखारी मानसिकता से मुक्ति पा सकें और स्वाभमानी नागरिकों के तरह जीवन बिता सके।