0

क्यों दिशाहीन हो रहे हैं देश के नौजवान?

Dr SB Misra | Jan 10, 2026, 19:04 IST
Share
भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में आज नौजवान उद्दंडता, विद्रोह और अनुशासनहीनता की राह पर दिखाई दे रहे हैं। बेरोज़गारी, दिशाहीन शिक्षा, सामाजिक संस्कारों का अभाव और उचित मार्गदर्शन न मिलना, युवा ऊर्जा को रचनात्मक के बजाय विध्वंसक बना रहा है।
हम अपने गाँव या दूसरे गाँव में जब जाते हैं तो दिन के समय ऐसे लोग या तो ताश खेलते हुए या फालतू बातचीत करते हुए दिखाई पड़ेंगे और शाम के समय शराब की दुकान पर या उसके पास, पड़ोस में कहीं घूमते हुए नज़र आएँगे।
दुनिया के तमाम देशों में नौजवानों द्वारा उद्दंडता और विद्रोह देखा जा रहा है। नेपाल में जेन जी के नाम से जो क्रांति कुछ महीने पहले हुई, उसके घाव नेपाल में अभी ताज़ा हैं और वहाँ की अर्थव्यवस्था और प्रगति पिछड़ गई है, जिसे सुधारने में समय लगेगा। बांग्लादेश में उपद्रवी नौजवान धार्मिक आधार पर उद्दंडता दिखा रहे हैं और वहाँ के अल्पसंख्यकों पर तरह-तरह से प्रहार कर रहे हैं, यहाँ तक कि ज़िंदा जला रहे हैं। ईरान में इस्लामिक कट्टरता से त्रस्त नवयुवक और नवयुवतियाँ वर्षों पहले उद्वेलित हो चुके हैं। लड़कियों के उद्वेलित होने का कारण हिजाब और दूसरी धार्मिक पाबंदियाँ थीं और एक बार फिर धार्मिक पाबंदियों से त्रस्त होकर वे उद्वेलित हो रहे हैं। श्रीलंका सहित कुछ अन्य देशों में भी लगभग यही हाल है। टर्की और थाईलैंड जैसे देशों में भी युवा उद्दंडता देखने को मिलती है।

हमारे अपने देश में भी समय-समय पर नौजवानों का विद्रोह सामने आता है और देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कभी-कभी यह रचनात्मक भी होता है, जैसे वर्षों पहले असम के छात्र आंदोलन के परिणामस्वरूप असम गणतंत्र परिषद का जन्म हुआ और नई सरकार आई थी। या 70 के दशक में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल को हटाने के लिए लोग आंदोलित हुए थे। युवाओं द्वारा रचनात्मक कार्य तब होते हैं जब उचित मार्गदर्शन मिलता है और गलत मार्गदर्शन मिलने से विध्वंसात्मक कार्य होते हैं।

वर्तमान समय में हमारे देश के नौजवानों का जीवन दिशाहीन हो रहा है और ऐसा लगता है कि उनके पास कुछ सार्थक करने को नहीं है या फिर उन्हें दिशा देने वाले लोग अपना दायित्व नहीं निभा रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जैसे शिक्षण संस्थानों में छात्र हिंसक आंदोलन तथा विद्रोह तक कर रहे हैं। हम ग्रामीण नौजवानों को ही देखें तो वे पढ़ाई में ध्यान दे रहे हों और स्कूल जा रहे हों, तब ठीक है, लेकिन जो स्कूल नहीं जा रहे हैं, पढ़ाई या तो कर चुके हैं या छोड़ चुके हैं, उनका जीवन निठल्ला हो गया है।

हम अपने गाँव या दूसरे गाँव में जब जाते हैं तो दिन के समय ऐसे लोग या तो ताश खेलते हुए या फालतू बातचीत करते हुए दिखाई पड़ेंगे और शाम के समय शराब की दुकान पर या उसके पास, पड़ोस में कहीं घूमते हुए नज़र आएँगे। कुछ वर्ष पहले ऐसे नौजवान खेतों में काम करते हुए या पशुओं का चारा इकट्ठा करते हुए दिखाई पड़ जाते थे, लेकिन अब खेतों में काम बचा नहीं है या ट्रैक्टर, प्रेशर हार्वेस्टर द्वारा बस कुछ घंटों में समाप्त कर दिया जाता है और शेष समय न बड़े लोगों के लिए कुछ करने को है और न इन नौजवानों के लिए। यहाँ तक कि पढ़-लिखकर घर में रहने वाले नौजवान बीए, एमए की डिग्री लेकर बेकार घूमते हैं क्योंकि उन्हें कोचिंग आदि की सुविधा नहीं मिली और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता नहीं मिल पाई, तथा खेती के काम में रुचि नहीं रही और इस तरह वे घर के न घाट के रहे। चाहे धनाभाव के कारण अथवा उनकी रुचि के कामों के अभाव की वजह से वे अपने घर में व्यर्थ समय बिता रहे हैं।

हमारे अपने देश में भी समय-समय पर नौजवानों का विद्रोह सामने आता है और देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
<br>हमारे अपने देश में भी समय-समय पर नौजवानों का विद्रोह सामने आता है और देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है।


पहले ग्रामीण नौजवान, जब परिवार का पारंपरिक व्यवसाय होता था जैसे बढ़ई, लोहार, कुम्हार, दुकानदार, दुग्ध विक्रेता आदि, तो वही काम अपना लेते थे और जीवन-यापन का साधन मिल जाता था। अब ये लोग विद्यालय में पढ़ाई करने के बाद सफेद कॉलर वाला व्यवसाय चाहते हैं, यानी बुद्धिजीवी बनना चाहते हैं, लेकिन उनमें न प्रतिभा है, न क्षमता और न शायद रुझान, तो फिर वे बेकार हो जाते हैं। जो पढ़ाई उन्होंने स्कूल-कॉलेज में की है, उसके आधार पर वे बुद्धिजीवी नहीं बन सकते।

कुछ स्थानों पर तकनीकी कौशल विकास के विद्यालय सरकार द्वारा खोले गए हैं और वहाँ पढ़ाई करके सर्टिफिकेट या डिप्लोमा भी ले लेते हैं, लेकिन उसके पश्चात ये नौजवान अपना व्यवसाय करने के लिए प्रेरित नहीं हो पाते और सरकारी नौकरी मिलती नहीं। यदि तकनीकी शिल्पकार अपना काम आरंभ भी करें तो उनके द्वारा बनाए गए माल की खपत की समस्या आएगी। यह सच है कि सरकार ने बैंकों से पूंजी की व्यवस्था कर दी है, फिर भी कच्चे माल और बनाई गई सामग्री के लिए बाजार तो चाहिए होगा। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे उत्पादन केंद्र, चाहे सरकार बनाए या प्राइवेट सेक्टर में बनाने के लिए प्रेरित किया जाए, तब इन तकनीकी शिल्पकारों को उसमें काम मिल सकता है। यदि शिक्षित या अर्थशिक्षित अथवा अशिक्षित बेरोजगारों की संख्या बढ़ती गई तो एक न एक दिन अपराधों में बढ़ोतरी आएगी और कठोर शासन व्यवस्था भी उस पर नियंत्रण नहीं कर पाएगी।

ये भी पढ़ें: नोट बदले, सिस्टम नहीं बदला: काले धन की जड़ें अब भी मज़बूत

शहरों के पढ़े-लिखे बेरोजगारों के लिए व्यवसाय के अनेक अवसर हैं, फिर भी यदि वे बेकार रहते हैं तो अपराध जगत में चले जाते हैं। फिर चाहे साइबर अपराध हो, यौन अपराध हो अथवा अन्य कोई, सबमें ये नौजवान घुस रहे हैं। आमतौर पर देखा गया है कि शहरों के बच्चों को उनके कई संपन्न अभिभावक मोटरसाइकिल और कभी-कभी चार पहिया गाड़ियाँ भी उपलब्ध करा देते हैं, जिनका उपयोग या तो अपराध जगत में या तेज गति से दौड़ाने के लिए होता है। आए दिन हम टीवी पर देखते हैं कि कभी तेज रफ्तार गाड़ियाँ चलाते हुए नौजवान एक्सीडेंट का शिकार होते रहते हैं और ऐसा करते समय वे या तो नशे की हालत में होते हैं या अपना हुनर दिखाने के रूप में रहते हैं।

यदि शिक्षित या अर्थशिक्षित अथवा अशिक्षित बेरोजगारों की संख्या बढ़ती गई तो एक न एक दिन अपराधों में बढ़ोतरी आएगी और कठोर शासन व्यवस्था भी उस पर नियंत्रण नहीं कर पाएगी।
यदि शिक्षित या अर्थशिक्षित अथवा अशिक्षित बेरोजगारों की संख्या बढ़ती गई तो एक न एक दिन अपराधों में बढ़ोतरी आएगी और कठोर शासन व्यवस्था भी उस पर नियंत्रण नहीं कर पाएगी।


इतना ही नहीं, ये नौजवान कभी-कभी होटल में खाना खाकर पैसा नहीं देते और झगड़ा भी करते हैं या फिर सामान खरीदकर दुकानदार को पैसा नहीं देते। ऐसे ही अनेक उद्दंडता के कामों में लगे रहते हैं और इन सब छोटे-बड़े अपराधों को टीवी के लोग चटकारे लेकर दिखाते हैं, मानो दुनिया में अच्छे काम हो ही नहीं रहे हैं। संभव है कि अच्छे काम दिखाने से टीआरपी नहीं बढ़ती होगी। इस तरह के तमाम काम, चाहे यौन उत्पीड़न के हों या आपसी झगड़े के अथवा अन्य उद्दंडता के, सभी में अनुशासनहीन नौजवानों की ऊर्जा देखने को मिल जाती है।

देश के एक वर्ग विशेष द्वारा यौन उत्पीड़न की घटनाएँ सामान्य हो गई हैं, जिन्हें अनेक बार लव जिहाद की संज्ञा दी जाती है। तथाकथित लव जिहाद के कारण स्पष्ट नहीं हैं। कुछ लोग इसे डेमोग्राफिक बदलने की इस्लामिक विधा बताते हैं। जो भी हो, यह हमारे देश में हिंदू-मुस्लिम संबंधों को बिगाड़ने में बड़ी भूमिका अदा कर रहा है। यौन उत्पीड़न और बलात्कार के अपराध बढ़ते जा रहे हैं, जिनके लिए संस्कारों का अभाव और समाज में अनुशासनहीनता आदि को जिम्मेदार माना जा सकता है। हमारे देश में नौजवानों में नशाखोरी की आदत बढ़ती जा रही है और यह भी अपराध को जन्म देती है।

देश में 25 वर्ष तक की आयु को ब्रह्मचर्य आश्रम कहते थे, जो विद्यार्थी जीवन होता था और गृहस्थ आश्रम की तैयारी हो जाती थी। अब इसी आयु वर्ग के लोगों को जेन जी अथवा थ्री एज या फिर “गधा पचीसी” के नाम से पुकार दिया जाता है। ब्रह्मचर्य आश्रम जीविकोपार्जन के कौशल विकास का समय होता है, परंतु यदि असफल रहे तो ऐसे लोग विग्रह को पैदा करने वाले बनते हैं। एक तो इस कच्ची उम्र में उचित मार्गदर्शन और सही संगत का अभाव हो, तो भटकाव स्वाभाविक है। भारत में यही नौजवान वर्णाश्रम धर्म के अंतर्गत संस्कृति और कौशलपूर्ण बना करते थे और समाज की सर्वाधिक ऊर्जा इन्हीं में होती थी। हमारे यहाँ कितने ही लोगों ने बाल्यावस्था में महान कार्य किए हैं। राम और कृष्ण, तथा ध्रुव और प्रह्लाद एवं आल्हा-ऊदल तक सभी इसी आयु वर्ग में बड़े-बड़े काम करके चले गए। आशा की जानी चाहिए कि इस वर्ग को कुछ सार्थक बनाने के अवसर उपलब्ध रहेंगे, उचित मार्गदर्शन मिलेगा और इनके द्वारा राष्ट्र निर्माण हो सकेगा।

ये भी पढ़ें: जब गाँव बदले, खेती बदली और किसान अकेला पड़ गया

नौजवानों की अनुशासनहीनता और उद्दंडता को दूर करने के लिए सरकार को कुछ उपाय करने होंगे। पुरानी बात है, जब यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो हुआ करते थे, तब उनके देश में विकास का काम होना था और देश में नौजवान उपलब्ध थे, तो उन्होंने उन नौजवानों की लैंड आर्मी बनाकर राष्ट्र निर्माण का कार्य आरंभ कर दिया। फिर चाहे सड़कें हों, पुल हों या जो भी राष्ट्रकार्य ज़रूरी थे, सब उन्हीं के द्वारा कराए गए। इसी तरह एक समय चीन एक अफीमची देश था और माओत्से तुंग ने एक क्रांति के बाद प्रत्येक गाँव में एक ऐसा आदमी नियुक्त किया, जो पूरे गाँव वालों को तकनीकी ज्ञान और दूसरे उद्यमिता के उपाय बता सकता था।

दोनों ही हालातों में, चाहे लैंड आर्मी हो या गाँव के स्तर पर काम करने वाले नौजवान हों, उन सभी का पालन-पोषण सरकार करती थी और शायद उनके परिवारों को भी सरकार ही देखती होगी।

2047 तक हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाना चाहते हैं, तो ऐसे तमाम नौजवानों की, जिनके पास नौकरी नहीं है और जो हृष्ट-पुष्ट शरीर वाले हैं, लैंड आर्मी बनाकर राष्ट्र का निर्माण किया जा सकता है। ऐसे क्रांतिकारी उपाय करने के लिए प्रजातांत्रिक ढाँचा शायद अधिक उपयुक्त न रहे, फिर भी कोई न कोई बीच का रास्ता निकाला जा सकता है।
Tags:
  • Youth Crisis
  • Unemployment in India
  • Indian Youth
  • Directionless Youth
  • Gen Z India
  • Youth and Crime
  • Rural Youth India
  • Urban Unemployment
  • Skill Development India

Follow us
Contact
  • Gomti Nagar, Lucknow, Uttar Pradesh 226010
  • neelesh@gaonconnection.com

© 2025 All Rights Reserved.