समय की मांग कृषि में निवेश, किसान की हालत सुधरने से देश को मिलेगी मंदी से राहत: देविंदर शर्मा

पिछले दो वर्षों में कृषि आय में वास्तविक वृद्धि लगभग शून्य रही है, इससे पहले भी जब नीति आयोग ने अनुमान लगाया था कि 2011-12 से 2015-16 के पांच वर्षों के दौरान वास्तविक कृषि आय प्रति वर्ष आधा पर्सेंट से कम की दर से बढ़ रही थी।

Devinder SharmaDevinder Sharma   9 Sep 2019 8:52 AM GMT

समय की मांग कृषि में निवेश, किसान की हालत सुधरने से देश को मिलेगी मंदी से राहत: देविंदर शर्मा

खिरकार सरकार ने संसद में स्वीकार कर लिया कि 2022 तक कृषि आय दोगुनी करना संभव नहीं है। समाजवादी पार्टी के नेता राम गोपाल वर्मा के राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कृषि राज्यमंत्री पुरुषोत्तम रूपाला ने स्पष्ट तौर पर कहा, 'हम राम गोपाल जी के प्रश्न से सहमत हैं कि कृषि क्षेत्र में मौजूदा ग्रोथ रेट के दम पर किसानों की आय दोगुनी करना संभव नहीं है।'

कृषि क्षेत्र की सालाना वृद्धि दर चार प्रतिशत के नीचे है, ऐसे में कृषि राज्यमंत्री ने मान लिया कि तय समय सीमा में किसानों की आय दोगुनी करना मुमकिन नहीं है। किसानों की आय दोगुनी करने के विषय में अप्रैल 2016 में गठित दलवई समिति ने अनुमान लगाया था कि ऐसा करने के लिए किसान की आय में 10.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी होनी चाहिए।

बहुत से अर्थशास्त्री भी कह चुके हैं कि इसके लिए बहुत ऊंची आर्थिक वृद्धि दर की आवश्यकता है। मुझे पता है कि यह अति महत्वाकांक्षी लक्ष्य है, इसलिए मुझे खुशी है कि मंत्री महोदय ने अंतत: एक ऐसे वादे पर फिलहाल विराम लगा दिया है जिसे आसानी से पूरा करना संभव नहीं था। वह इस बात पर सहमत हैं कि गैर-कृषि आय में बढ़ोतरी करने के लिए कुछ और विकल्पों पर काम हो सकता है।

उम्मीद है कि अब यह पता चल जाने के बाद कि ऐसा करना संभव नहीं था उन अनगिनत सेमिनारों, कॉन्फ्रेंसों और वर्कशॉप पर विराम लगा जाएगा जो किसानों की आय दोगुनी करने के लिए पिछले दो वर्षों से विश्वविद्यालयों, संस्थानों, कॉलेजों और नागरिक संगठनों द्वारा आयोजित की जा रही थीं।

यह भी पढ़ें : देविंदर शर्मा- 1700 रुपए महीने में एक गाय नहीं पलती, किसान परिवार उसमें गुजारा कैसे करता होगा?

पिछले दो वर्षों में कृषि आय में वास्तविक वृद्धि लगभग शून्य रही है, इससे पहले भी जब नीति आयोग ने अनुमान लगाया था कि 2011-12 से 2015-16 के पांच वर्षों के दौरान वास्तविक कृषि आय प्रति वर्ष आधा पर्सेंट से कम की दर से बढ़ रही थी, किसी ने भी उन मौलिक संरचनात्मक बदलावों की बात नहीं की जिनके लिए कृषि क्षेत्र तरस रहा है।

इसके बजाय मृदा स्वास्थ्य कार्ड, नीमकोटेड यूरिया, फसल बीमा योजना, राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-एनएएम), मोर क्रॉप पर ड्रॉप (कम पानी में अधिक फसल) आदि जैसी योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करके उपलब्ध तरीकों के उन्नयन और शोधन पर जोर दिया गया, जो महत्वपूर्ण तो हैं लेकिन निश्चित रूप से किसानों की आय दोगुनी करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

जबकि आवश्यकता है डायरेक्ट इनकम सपोर्ट की जो आय में बढ़ोतरी करने का एक बेहतर तरीका है।

सरकार ने दलवई समिति की सितंबर 2018 में पेश की गई रिपोर्ट की सिफारिशों के कार्यान्वयन और निगरानी के लिए एक कमेटी का गठन किया था। इसमें भी माना गया है कि अगले दो वर्षों में किसान आय को दोगुना करना संभव नहीं है। लेकिन यह निश्चित रूप से उन दीर्घकालिक सुधारों को शुरू करने में मददगार साबित होगी जिनकी इस क्षेत्र को सख्त जरूरत है साथ ही यह तय करने में भी सहायक होगी कि किस जगह ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

यह भी पढ़ें : बजट 2019: कृषि संकट को दूर करना हो सरकार की पहली प्राथमिकता

सबसे पहली और महत्वपूर्ण आवश्यकता है कृषि में सार्वजनिक क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा देने की। भारतीय रिज़र्व बैंक के आंकड़ों पर नज़र डालें तो कृषि को लेकर लगातार चल रहा यह पूर्वाग्रह स्पष्ट हो जाता है। ये आंकड़े बताते हैं कि 2011-12 और 2016-17 के बीच कृषि में सार्वजनिक क्षेत्र का निवेश सकल घरेलू उत्पाद के 0.4 प्रतिशत के आसपास रहा था। यह देखते हुए कि देश की लगभग आधी आबादी कृषि पर निर्भर है यह स्थिति बताती है कि हमारे देश में कृषि की जानबूझ कर अनदेखी की गई है।

मुझे नहीं लगता कि बिना पर्याप्त निवेश के कोई भी अर्थशास्त्री कृषि क्षेत्र में चमत्कार की उम्मीद कर सकता है। साल दर साल जीडीपी का आधा पर्सेट भी खेती में निवेश नहीं किया जा रहा है क्योंकि देश में यह आर्थिक सोच प्रभावी है कि खेती आर्थिक गतिविधि नहीं है। इसलिए खेती को एक व्यवहार्य और टिकाऊ उद्यम बनाने की जगह पूरा प्रयास इस बात पर केंद्रित है कि कैसे लोगों को खेती से निकाला जाए।

इसे बदलना होगा, इसका संकेत बीजेपी के घोषणा पत्र से मिला है जिसमें कृषि में 25 लाख करोड़ रुपयों के निवेश का वादा किया गया था। वर्ष 2019-20 के बजट में कृषि के लिए 1,30,485 करोड़ रुपये का प्रावधान किया जिसमें पीएम किसान योजना की शेष तीन किश्तों के लिए आवंटित 75,000 करोड़ रुपये भी शामिल हैं। इसके अलावा डायरेक्ट इनकम सपोर्ट (प्रत्यक्ष आय सहायता) के साथ-साथ कृषि बाजार के बुनियादी ढांचों (वेयरहाउस और गोदामों सहित) के उन्नयन के लिए बजटीय आवंटन और गाँवों को प्रस्तावित कृषि उपज मंडी समितियों से जोड़ने के लिए निवेश की भी आवश्यकता है।

दिलचस्प बात यह है कि जहां कृषि वैज्ञानिक और अर्थशास्त्री आम तौर पर खेती की वास्तविक आय बढ़ाने और खेती के खोए गौरव को लौटाने के लिए क्रांतिकारी कदम उठाने की बात कहने से हिचकते हैं, वहीं पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा था कि किसानों को संकट से बचाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएससपी) लागत का तीन गुना होना चाहिए।


यह भी पढ़ें : पहले किसानों को विकल्प मुहैया कराए तब गन्ने की खेती छोड़ने की नसीहत दे सरकार

'हालांकि 1965 से एमएसपी का ऐलान होता रहा है लेकिन कड़वी सचाई यह है कि यह किसानों की आय को बढ़ाने और उन्हें गरीबी से निकालने में नाकाम रहा है। अब समय आ गया है जब किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाने के लिए कानूनी अधिकार देकर एमएसपी को कानूनी बल दिया जाए।' उचित कानून लाकर एमएसपी को कानूनी दर्जा देने का यह निर्देश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और एचएस सिद्धू की खंडपीठ से आया है। इसमें उन्होंने बिचौलियों को दूर करने, गोदामों की स्थापना, मौसम आधारित फसल बीमा, इंटरनेट तकनीक का इस्तेमाल, ऋण सेवा संचालन सहित सुधारात्मक उपाय सुझाए।

इससे पहले, कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने भी एमएसपी को कानूनी अधिकार बनाने का आह्वान किया था। इसने विशेष रूप से इस बात पर प्रकाश डाला था कि कैसे सुदूर भागों में किसानों के पास विनियमित एपीएमसी बाजारों तक पहुंच नहीं है और इसलिए उन्हें एमएसपी से बहुत नीचे स्थानीय हाटों में अपनी उपज बेचनी पड़ती है।

पिछले दो वर्षों में किसानों ने कथित रूप से 20 से 30 प्रतिशत कम कीमत पर दाल, तिलहन और मोटे अनाज बेचे थे। यहां तक कि गेहूं और चावल के मामले में, जो दो फसलें सरकार खरीदती है, किसानों को केवल वहीं न्यूनतम दाम मिले जहां सरकार की बेहतर खरीद व्यवस्था है।

उदाहरण के लिए, बहुत से बेइमान व्यापारी बिहार में किसानों से कम कीमत पर गेहूं और धान खरीदते हैं और फिर इसे पंजाब और हरियाणा में ले जाकर ऊंची कीमतों पर बेचते हैं क्योंकि यहां एमएसपी अधिक मिलता है।

एमएसपी को कानूनी दर्जा देने से न केवल किसानों में विश्वास पैदा होता है, बल्कि किसानों को न्यूनतम कीमत का आश्वासन भी मिलता है, जिससे खेत की आय में वृद्धि होती है, कर्ज कम होता है और कृषि संकट कम होता है। इसके अलावा एमएसपी को उत्पादन की औसत लागत से तीन गुना तक बढ़ाना, जिसमें स्वामित्व वाली भूमि और पूंजी पर लगाया गया किराया और ब्याज शामिल है, निश्चित रूप से एक उचित कदम होगा। यह अकेले कृषि क्षेत्र के प्रदर्शन में उल्लेखनीय बदलाव लाने की क्षमता रखता है और इसे यह लागू किया जा सकता है।

यह भी पढ़ें : पानी की बर्बादी रोकने का जिम्मा सिर्फ किसान पर ही क्यों, अमीर भी पेश करें मिसाल

मेरा सुझाव है कि दो मूल्य स्तर बनाए जाएं- एक जिसमें एमएसपी पर खरीद होती है और दूसरा, वह वास्तविक कीमत जो किसान को चुकाई जाती है। आज जब सभी किसान जन धन बैंक खातों से जुड़े हुए हैं, दोनों स्तरों के बीच के अंतर को सीधे किसान के बैंक खातों में पहुंचाया जा सकता है।

इस तरह की वितरण प्रणाली यह सुनिश्चित करेगी कि खाद्य मुद्रा स्फीति नियंत्रण में रहे, और साथ ही किसानों को वह वैध मूल्य मिले, जिसके वे हकदार हैं, और वर्षों जिससे वे वंचित रहे। बीजेपी के घोषणा पत्र में 25 लाख करोड़ रुपये के निवेश का वादा किया गया है, लेकिन अगर सिर्फ 5 लाख करोड़ रुपये का वितरण पीएम किसान योजना के जरिए बढ़े हुए दामों के रूप में किया जाए तो भारतीय कृषि का चेहरा हमेशा के लिए बदल जाएगा।

अब समय आ गया है कि हम कृषि में बढ़त के आंकड़ों के प्रति लगाव से बाहर निकलें। अब समय है मानव संसाधन में निवेश करने की जो भारतीय कृषि की सबसे बड़ी ताकत है। जैसे-जैसे वास्तविक कृषि आय की बढ़ोतरी में अधिक निवेश किया जाएगा किसानों की अधिकांश पूंजी अपने आप कृषि तकनीकों को सुधारने में लगने लगेगी।

इससे भी अधिक जैसे-जैसे कृषि आय बढ़ेगी ग्रामीण क्षेत्रों में मांग भी बढ़ेगी और औद्योगिक विकास का पहिया भी तेजी से घूमने लगेगा। ऐसे समय में जब देश मंदी के दौर से गुजर रहा है, बाजार की मांग बढ़ाना एक बड़ी चुनौती है जो कि केवल खेती से ही पूरी हो सकती है। इसलिए अर्थव्यवस्था को राहत पहुंचाने का सबसे सुरक्षित तरीका है कृषि में निवेश करना। यही सबका साथ, सबका विकास का रास्ता भी है।

यह भी पढ़ें : सूखा या बाढ़ नहीं, किसान के लिए सबसे बड़ी त्रासदी है माटी मोल कीमतें

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top