संवाद

ठग्गू , भ्रामक और आधारहीन विज्ञापन बन्द होने चाहिए

छह लोगों ने भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का नाम देख कर विश्वास किया और फ्लैट खरीद लिए। वर्षों बाद तक जब फ्लैट नहीं मिले तो धोनी से शिकायत की। धोनी ने वादा किया कि वह मकान दिलाएंगे लेकिन ऐसा हर विज्ञापनकर्ता नहीं कर सकता। बाबा रामदेव तो अपने नून तेल का विज्ञापन स्वयं कर रहे हैं इसलिए वे खुद ही जिम्मेदार है। परन्तु अमिताभ बच्चन और माधुरी दीक्षित जैसे स्वनामधन्य लोगों की प्रतिष्ठा पर आंच आती है जब मैगी में खोट निकलता है। बड़े लोगों की प्रतिष्ठा मात्र का सवाल नहीं है, प्रश्न है ग्राहक के ठगे जाने का।

एक विज्ञापन देखा था ‘‘हमारा सीमेन्ट सस्ता नहीं, सबसे अच्छा”  इसका सबूत तो सरकार को मांगना चाहिए, किस आधार पर सबसे अच्छा? खाद डालते ही फसल लहलहाने लगती है या मंजन करते ही अखरोट तोड़ने लगते हैं, या क्रीम लगाते ही गंजी खोपड़ी में बाल उगने लगते हैं अथवा टॉनिक पीते ही शीशे के दीवार चीर कर कूद जाते हैं अथवा एक बिस्किट खाते ही बच्चा एक बलशाली जवान को हरा देता है और बनियाइन पहनते ही लड़की चिपक कर खड़ी हो जाती है। ऐसे विज्ञापनों से बिकने वाली वस्तु की गुणवत्ता पता नहीं लगती बल्कि पता चलता है लफ्फाजी सबसे अच्छी कौन कर सकता है।  उचित होता अपने प्रोडक्ट के गुण, जांच रिपोर्ट के रिज़ल्ट और विशेषज्ञों की राय बताते।

 

किसानों ने अंग्रेजी खाद के विज्ञापनों के जाल में फंसकर अपने खेत बर्बाद कर दिए। कीटनाशक, खरपतवार नाशक रसायनों के दुष्प्रभाव का ज्ञान अब हुआ है। गनीमत है किसानों को सेक्स का फूहड़पन नहीं परोसा जाता। विज्ञापनों का उद्देश्य इतना ही होना चाहिए कि वे बिक्री वाली वस्तु के विषय में पूरी जानकारी उपलब्ध कराएं न कि उसके झूठे गुणगान करें। जब एक सीमेन्ट बेचने वाला कहता है ‘‘सस्ता नही सबसे अच्छा” तो उससे पूछा जाना चाहिए कि ऐसा कहने का तुम्हारा आधार क्या है। उचित होगा वह अपनी सीमेन्ट की बाइंडिंग स्ट्रेन्थ यानी जोड़ने की ताकत बता दें। पता चल जाएगा कि इससे अच्छी किसी और की सीमेन्ट है या नहीं। इसी तरह बिना औचित्य के महिलाओं को दिखाकर सेक्स भावनाओं का उद्रेक किया जाता है, यह दंडनीय अपराधों की श्रेणी में डालना चाहिए।

अमेरिका, इंग्लैंड और कनाडा में व्यवस्था है भ्रामक और झूठे विज्ञापन हटवाने की। वहां उपभोक्ताओं को ‘‘कंज्यूमर डाइरेक्ट” के माध्यम से व्यावहारिक सलाह की व्यवस्था है। हमारे देश में भी ऐसे कानून हैं जो झूठे, भ्रामक और धोखेबाज विज्ञापनों पर अंकुश लगाने के लिए बने हैं लेकिन शायद ऐसी संस्था नहीं कि झूठे वादे करने वाले विज्ञापनों पर कड़ी नजर रखे और अपने आप संज्ञान में ले । उदारीकरण के बाद तो ऐसे विज्ञापनों की भरमार हो गई है। हमारे देश में एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया नाम की स्वैच्छिक संस्था है परन्तु उसके पास सेंसर बोर्ड अथवा एलेक्शन कोड जैसे दिशा निर्देश लागू करने के लिए कोई अधिकार नहीं है। कुछ कानून जैसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 और मोनॉपली ऐंड रिस्ट्रिक्टिव ट्रेड प्रैक्टिसेज अधिनियम 1969 तभी लागू होते हैं जब खरीदार जोखिम उठा चुका होता है परन्तु भावी क्रेताओं को झूठे विज्ञापनों के जाल में फंसने से नहीं बचाते। शायद शुगर फ्री के एक विज्ञापन में एक महिला एक अधेड़ पुरुष के गाल नोचने हुए कहती है ‘‘इक्वल इक्वल।” जैसे-जैसे देश में शुगर फ्री की खपत बढ़ रही है उसी अनुपात में मधुमेह बढ़ रहा है। भारत दुनिया में मधुमेह की राजधानी बन चुका है।

 विदेशी कम्पनियां भारत में टिड्डी की तरह आ रही हैं जिनके विज्ञापनों पर अंकुश लगाना सरल नहीं होगा। हमारे देश में झूठे सच्चे वादों के साथ विज्ञापन संभव हैं क्योंकि इन पर कोई प्रभावशाली नियंत्रण नहीं है। मेक इन इंडिया के युग में अब समय आ गया है कि उत्पादन करने वाली कम्पनी अपना सामान बाजार में उतारने के पहले अपने उत्पादों की गुणवत्ता एक सक्षम आयोग के सामने प्रमाणित करें जिस प्रकार सेंसर बोर्ड के सामने फिल्म प्रस्तुत होती है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो हमेशा ही उपभोक्ता ठगा जाता रहेगा।

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