क्या फुस्सी बम हो जाएगा प्रधानमंत्री मोदी का कुशासन पर प्रहार

Dr SB Misra | Nov 23, 2016, 19:42 IST

अमीर-गरीब सबके मन में आशा के भाव ढाई साल से उमड़ते रहे है कि बाबू ईमानदार हो जाएंगे, किसान के साथ इंसाफ़ होगा, सड़कों पर गाड़ियां दौड़ेगी मगर साइकिल को कुचलती हुई नहीं, स्कूल में अध्यापक होंगे, जो पढ़ाएंगे और अस्पतालों में डॉक्टर होंगे जो इलाज़ करेंगे। सोचा था खेतों में पानी, खाद, बीज और उचित मूल्य के लिए मंडियां होंगी। सरकार ने अभियान चलाकर देश को स्वच्छ बनाने, विदेशों में भारतीयों को सम्मान दिलाने और दुनिया के देशों के साथ रिश्ता सुधारने का सफल प्रयास किया है लेकिन अंग्रेजी की एक कहावत है ‘चैरिटी बिगिंस ऐट होम’ यानी सुधारों का परिणाम घर में दिखना चाहिए था।

पट्टीदार, गुर्जर और जाट आन्दोलनों ने देश को तहस-नहस करने का प्रयास किया है, विश्वविद्यालयों के छात्र पढ़ाई छोड़ नारेबाजी में लगे हैं, भ्रष्टाचार बैंकों में घुसा था उसे निकालने के लिए नोट पर चोट खाली जाती हुई दिख रही हैं, पाकिस्तान की तमाम खुशामद का कोई नतीजा नहीं निकला, तेल की कीमतें घटने के बावजूद हमारी अर्थव्यवस्था में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं। संसद ना तो मनमोहन सिंह के समय में चलती थी और न अब चलती है, विकास में स्वदेशी कहीं खो गया है और विदेशी पूंजी निवेश भी जोर नहीं पकड़ रहा है।

यह सच है कि विदेशों में पहले की अपेक्षा भारत का सम्मान बढ़ा है, प्रवासी भारतीय खुश हैं, कुछ विदेशी उद्योगपतियों ने भारत में रुचि दिखाई है लेकिन इतने से काम नहीं चलेगा। भारत के निराश लोगों को लगना चाहिए कि ‘अच्छे दिनों’ की दूरी घट रही है। लगता था भू-अधिग्रहण और जीएसटी बिल पास होने से सब ठीक हो जाएगा लेकिन उसके भी आसार कम है। इतने महत्वपूर्ण बिलों को पास कराने में इतना समय नहीं लगना चाहिए था और लोकसभा तथा राज्य सभा का सम्मिलित सत्र बुलाकर समय बचाना चाहिए था। शायद सरकार गिरने का डर रहा था।

मोदी ने कहा था उन्हें सरकार चलाने के लिए दूसरों की जरूरत नहीं पड़ेगी लेकिन देश चलाने के लिए सब की जरूरत होगी लेकिन सरकार भी तो नहीं चल रही है। मंत्री और सांसद अनाप-शनाप बयानबाजी करते रहते हैं जो मनमोहन सिंह के दिनों में भी नहीं था। कार्रवाई करने की इच्छाशक्ति में कमी दिखाई दे रही है। नोटबन्दी के मामले में इच्छाशक्ति दिखाई लेकिन उससे चोट निशाने पर नहीं लगी। डीजल-पेट्रोल सस्ता हुआ तो रेल का किराया घटना चाहिए था। ऐसे उद्योगों के उत्पाद जहां लागत मूल्य में ढुलाई का अंश अधिक होता है जैसे सीमेंट, सरिया व अन्य बिल्डिंग मटीरियल, खाद्य पदार्थ, खाद और बीज आदि ये सब उसी अनुपात में सस्ते होने चाहिए थे, लेकिन हुए नहीं।

आम आदमी को कारें खरीदने का अवसर नहीं मिलता लेकिन यदि स्कूटर, मोटर साइकिल और साइकिल के दाम घटेंगे तो मध्यम वर्ग को कुछ राहत होगी और यदि रासायनिक खादों और बीज के दाम घटेंगे तो गरीब किसान का भला होगा। यदि सौन्दर्य प्रसाधन और ऐशो आराम की चीजें सस्ती हो भी जाएं तो मजदूर को इससे कोई सुकून नहीं मिलेगा। उसमें ‘फील गुड’ यानी अच्छा अहसास तब तक नहीं आएगा जब तक उसके उपयोग की चीजें सस्ती नहीं होंगी। थोक मूल्य कई बार घटे भी हैं लेकिन गरीब को कुछ लाभ नहीं मिला और वह कभी दाल तो कभी प्याज में उलझा रहा।

मनरेगा का काम लगभग बन्द पड़ गया है, गाँवों में कोई कुटीर उद्योग लग नहीं रहे हैं, खेती किसानी को इन्द्र देवता ने चौपट कर रखा है तो बैंक खाते खोलकर उनमें क्या जमा करेगा किसान। अटल जी की सरकार की सड़कों का स्वर्णिम चतुर्भुज और नदियों को आपस में जोड़ने की योजनाएं ठंडे बस्ते में ही पड़ी है। मोदी सरकार से स्वदेशी लॉबी नाराज है चाहे किसान या मजदूर संगठन हों या फिर संघ के कट्टर हिन्दूवादी लोग। सेकुलर लॉबी तो असहिष्णुता के नाम पर विरोध कर रही हैं। इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए परन्तु सरकार से सहानुभूति रखने वालों का भी धीरज टूट रहा है। मनमोहन को मौनमोहन कहा जाने लगा था और अब मोदी भी संवाद से बचते दिख रहे हैं।

स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेनें चलाने की बात तो दूर रेल दुर्घटनाएं और ऐक्सीडेंट बराबर यथावत हो रहे हैं और पटरियां जैसी की तैसी हैं। कानपुर में डेढ़ सौ के करीब लोग मरे और दो सौ के लगभग घायल हुए, पहले की ही सरकारों की तरह जांच कमिटी बिठा दी। इसी तह स्वच्छ भारत के मामले में भी फोटो खिंचाने वाले तो हैं लेकिन काम करवाने वाले नहीं। पार्टी और सरकार के लोगों ने सोच लिया है कि मोदी हैं तो जीतते रहेंगे परन्तु भ्रम टूटने में देर नहीं लगेगी।

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