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नोट बदले, सिस्टम नहीं बदला: काले धन की जड़ें अब भी मज़बूत

Dr SB Misra | Jan 03, 2026, 11:07 IST
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नोटबंदी को काले धन पर निर्णायक प्रहार बताया गया था, लेकिन क्या यह वास्तव में अपने उद्देश्य में सफल रही? यह लेख पड़ताल करता है कि कैसे काला धन केवल नोटों में नहीं, बल्कि ज़मीन, संपत्ति, सोना, राजनीति और विदेशों में छिपा रहा।
कैशलेस की ओर देश, लेकिन काले धन का रास्ता अब भी खुला
एक समय था जब अर्थव्यवस्था में कमियों के कारण गरीब और गरीब हुआ तथा अमीर और अमीर होता गया। धनकुबेरों ने अपनी इकट्ठा की गई संपत्ति को विविध रूपों में जमा किया और टैक्स बचाया। इस प्रकार जमा किए गए धन को काला धन कहा गया और इसके कारण देश का आर्थिक प्रबंधन बिगड़ता गया। यह काला धन देश में तो जमा था ही, विदेशों में ज्यादा जमा हुआ और अंतरराष्ट्रीय गोपनीयता नियमों के कारण पहुँच से बाहर रहा। जब सरकार ने कुछ कड़ाई आरम्भ की तो काला धन वाले ही देश से पलायन कर गए। भले ही स्विट्ज़रलैंड ने गोपनीयता में कुछ शिथिलता दी है और जानकारी हासिल हुई है, काला धन और उसके मालिकों को देश में लाना एक चुनौती आज भी बनी है।

इस प्रकार काले धन के दो वर्ग-स्वदेशी काला धन और विदेशी काला धन- ऐसे दो वर्ग बन गए जो अभी भी बने हुए हैं। नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे दर्जनों व्यक्ति विदेशों में रहकर अपने काले धन को बढ़ा रहे हैं और उसका भोग कर रहे हैं। हमारी सरकार न काले धन को और न ही काले धन वालों को स्वदेश लाने में कामयाब हुई है ताकि देश के कानून के हिसाब से उसका निस्तारण हो सके।

स्वदेशी काले धन को मुख्यधारा में लाने के लिए नोटबंदी का उपाय किया गया था। लेकिन उसकी सफलता पर बराबर संदेह व्यक्त किया गया है। वास्तव में स्वदेशी काला धन केवल नोटों के रूप में नहीं था बल्कि ज़मीन-जायदाद, सोना-चाँदी, भवन आदि के रूपों में भी था, जिन पर नोटबंदी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अब कैशलेस लेन-देन के माध्यम से काले धन पर लगाम लगाने का प्रयास चल रहा है। सुखद आश्चर्य यह है कि शायद यह सफल हो जाए, क्योंकि सुदूर गाँवों तक बैंकिंग व्यवस्था और मोबाइल पहुँच चुके हैं और कम पढ़े-लिखे लोग भी इनका उपयोग कर रहे हैं। विचार इस बात पर होना चाहिए कि नोट पर चोट किए जाने के बावजूद काला धन बच क्यों और कैसे गया।

प्रधानमंत्री मोदी ने सोचा ज़रूर होगा कि काले नोट पर चोट करेंगे तो वह किधर भागेगा अथवा पहले से ही कहाँ सुरक्षित बैठा है। शायद यह ध्यान न रहा हो कि आर्थिक ऑपरेशन उसी दक्षता से होना चाहिए जैसे सेना करती है। बेईमानों के साथी-संगी भी चपेट में आने ही चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी को चाल बदलनी होगी।

कैश में काला धन एक अंश मात्र है। असली खजाना तो कहीं और है, जिसके विषय में शायद मोदी जी सोच रहे हैं जब कहते हैं कि उनके दिमाग में अनेक योजनाएँ चल रही हैं। योजनाएँ तो वे जानें, लेकिन यदि काले धन पर असली चोट करनी है तो राजनेताओं की भी ख़बर लेनी चाहिए थी। राजनेता भी देश-विदेश में काला धन छुपाते घूमते हैं और समय-समय पर प्राइवेट विज़िट पर विदेश जाते रहते हैं। केवल राजनीतिक पार्टियों का अरबों रुपया ही नहीं, बल्कि उन लोगों के नाम भी सामने आने चाहिए जो इनके दानदाता हैं। इन्हें दान में केवल काला धन मिलता है, इसलिए स्रोत तक पहुँचा जा सकता था, लेकिन हमारी सरकार ऐसा कर सकेगी, इसमें संदेह है।
जो ज़मीनें नोटबंदी के पहले 20–25 लाख रुपये प्रति एकड़ बिक रही थीं, वे नोटबंदी के बाद घट गई थीं।
जो ज़मीनें नोटबंदी के पहले 20–25 लाख रुपये प्रति एकड़ बिक रही थीं, वे नोटबंदी के बाद घट गई थीं।


काले धन का एक बड़ा अड्डा है संपत्ति में, विशेषकर ज़मीन में। बड़े इंजीनियर, वकील, आरटीओ, पुलिस अधिकारी, सोना-चाँदी के व्यापारी और राजनेता गाँवों में जाकर खेती की ज़मीन खरीदते हैं और बैनामा में लिखते भी हैं कि खेती के लिए खरीद रहे हैं। उन ज़मीनों पर बड़े फार्महाउस बनाते हैं, जिनका उपयोग साल में एकाध बार रुतबा जमाने के लिए पार्टी या सामाजिक आयोजन करते हैं। खेती की ज़मीन केवल किसान के पास होनी चाहिए जो वहाँ रहता और खेती करता है। इसी लिए कहा गया है- “सबियाँ खेती उसकी जो हल गहा, आधी खेती उसकी जो संग रहा।”

यदि कोई धनवान समाज सेवा के लिए ज़मीन चाहता हो तो खेती की ज़मीन खरीदकर उसका भू-उपयोग बदलवाकर विद्यालय, अस्पताल, धर्मशाला आदि बना सकते हैं। लेकिन कृषि भूमि उन्हीं के पास होनी चाहिए जो खेती करें।

सरकार के ध्यान में बेनामी ज़मीन और बेनामी संपत्ति तो है, लेकिन बड़े भवन, कई बिल्डिंगों के मालिक, सोना-चाँदी का लाखों में अम्बार, एक परिवार में बेतहाशा कीमत की गाड़ियाँ और फिर विदेशी बैंकों में जमा धन को भी ध्यान में रखना होगा। इस सब पर प्रहार की प्राथमिकता क्या होगी, शायद सरकार ने सोचा होगा। शुरुआत कैश से हुई है, कोई बात नहीं, लेकिन यह कैश किधर भागेगा यह भी सोचना चाहिए था। एक आदमी कई-कई बार नोट बदलेगा, इसकी ओर भी ध्यान जाना चाहिए था। आशा है अगले प्रहार के समय तैयारी पूरी होगी और मायावती जैसे नेताओं को यह कहने का मौका नहीं मिलेगा कि बिना तैयारी के नोटबंदी कर दी।

जिनके पास बेतहाशा काला धन है, वे इसे बेरहमी से खर्च भी करते हैं। अभी बेंगलुरु में रेड्डी बंधुओं के कार्यक्रम में कितना खर्च हुआ, यह जानने की किसी आयकर वाले ने कोशिश नहीं की। यह वही रेड्डी बंधु हैं जिन्हें भारतीय जनता पार्टी से खनन माफिया होने के कारण निकाला गया था। ऐसा कार्यक्रम किसी दूसरे देश में होता हो। काले धन के अड्डे बिना पता लगाए यदि प्रहार होगा तो निशाना खाली जा सकता है, बेगुनाहों को भी चोट लगेगी। शायद यही हो रहा है-गेहूँ के साथ घुन पिस रहा है। काले धन वालों ने बैंक कर्मचारियों के साथ मिलकर नोटबंदी को विफल करने का पूरा प्रयास किया और सफल भी हुए। नोट बदलने के लिए, कहा जाता है, उन्होंने पिछले दरवाज़े का प्रयोग किया और बिना किसी लिखापढ़ी के पुराने नोट बैंक को सौंप दिए और कमीशन देकर नए नोट हासिल कर लिए। ऐसा सुनने में आया था। यही कारण है कि बैंकों का कैश यथावत रहा और काला धन सफ़ेद हो गया। देश का काला धन विदेशों में पहुँचा, इसमें बैंकों और सरकारी कर्मचारियों का भी योगदान रहा होगा। काले धन पर नियंत्रण के लिए केवल कैश पर नियंत्रण कामयाब नहीं होगा। ज़मीन आदि की बिक्री एवं रजिस्ट्रेशन और कब्जा दाख़िल-ख़ारिज (म्यूटेशन) में पंचायतों, पंचों और प्रधानों की भूमिका आनी चाहिए और गवाही भी होनी चाहिए। रजिस्ट्री के कागज़ दिखाकर बैनामा से बैनामा करने की परंपरा समाप्त होनी चाहिए। होता यह है कि सर्किल रेट के हिसाब से बैंकों के माध्यम से लेन-देन होता है और काला धन पहले ही एडवांस के रूप में दे दिया जाता है, जो सामने नहीं आता।

जहाँ कहीं भी काले धन का खुलकर उपयोग हुआ है, वहाँ महँगाई बहुत तेज़ बढ़ी है। जब मैं कई साल कनाडा में रहकर भारत आया था तो 1500 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से कुछ ज़मीन खरीदी थी, जिस पर भारतीय ग्रामीण विद्यालय स्कूल आरम्भ किया था। तब तक काले धन का रोग नहीं फैला था। अब वही ज़मीन 25 लाख रुपये प्रति एकड़ के दाम वाली हो गई है। ज़मीनों के दाम जिस गति से बढ़े, उसी गति से दूसरी चीज़ों के दाम भी बढ़े होंगे। इस पक्ष पर विचार होना चाहिए था कि अचानक खेती की ज़मीन के दाम इतने अधिक क्यों बढ़ने लगे—नोटबंदी के पहले। मूल्य सूचकांक निकालने वाले लोग केवल सूचकांक न बताकर उसका कारण भी खोजें।

इस बात में संदेह नहीं कि नोटबंदी वर्ष 2016 की सबसे बड़ी घटना थी और इसका हमारे समाज की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ा है। यदि हम विपक्षी नेताओं की नज़रों से देखेंगे तो लगेगा देश में संकट आ गया है। इसके विपरीत यदि सत्ता पक्ष की नज़रों से देखेंगे तो लगेगा अब अच्छे दिन दूर नहीं। यदि आप नेताओं के भाषण छापने और इंटरनेट की जानकारी से दूर गाँव जाएँ और किसान, मज़दूर, छोटे व्यापारी से प्रत्यक्ष बात करें तो वह आपबीती बताएगा और वही यथार्थ होगा।

जब आप गाँव, शहर और कस्बों के लोगों से बात करेंगे तो पता चलेगा कि सब पर एक समान प्रभाव नहीं पड़ा है। किसान खेतों की बुवाई कर रहे हैं, बच्चे स्कूल जा रहे हैं, सड़क पर भूखे-नंगे लोग नहीं दिखाई पड़ रहे हैं, अपराधों में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हो रही है, आटा-दाल-चावल की मिलें काम कर रही हैं। मंत्रियों और अधिकारियों के लड़के जो शराब पीकर उद्दंडता कर रहे हैं, वे न तो भूखे हैं और न नंगे। इतना ज़रूर है कि जिसके पास एक जोड़ी कपड़ा है, वह दूसरी जोड़ी कपड़ा बनाने की जल्दी नहीं कर रहा है, मकान बनाने या खरीदने का फिलहाल कोई विचार नहीं कर रहा है। कुल मिलाकर नोटबंदी के बाद विस्तार नहीं हो रहा, लेकिन जीवन चलाने में संकट नहीं है।

जो ज़मीनें नोटबंदी के पहले 20–25 लाख रुपये प्रति एकड़ बिक रही थीं, वे नोटबंदी के बाद घट गई थीं।

मैं नोटबंदी को न तो अभिशाप कहूँगा और न वरदान। तटस्थ लोगों का यही मानना है कि इसे लागू करने का तरीका बेहतर हो सकता था। जैसे ही लेन-देन की लाइनों से नोट बदलवाने वालों को अलग किया गया, लाइनें दूसरे ही दिन छोटी हो गईं। लेकिन आज तक वित्त मंत्री अथवा प्रधानमंत्री ने यह नहीं बताया कि जो नए नोट बैंकों के चेस्ट बॉक्स और एटीएम के खाँचों में होने चाहिए थे, वे बैंकों से बाहर कैसे पहुँच गए और उनके बदले पुराने नोट कैसे आ गए, और बैंकों का कैश बिना लिखापढ़ी यथावत कैसे रहा।

मंदी के लिए यह बहाना ठीक नहीं कि दुनिया भर में मंदी का दौर है। पहले भी दुनिया में अर्थव्यवस्था धीमी गति से चल रही थी, लेकिन कहते थे कि मोदी के मार्गदर्शन में भारत की अर्थव्यवस्था सबसे तेज़ गति से बढ़ रही थी। सकल घरेलू उत्पाद, महँगाई और औद्योगिक विकास पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि आम आदमी का जीवन पुरानी ढर्रे पर कितनी जल्दी आएगा। जब वही मशीनें, कारीगर, इंजीनियर और वही कच्चा माल है, तो विकास की पुरानी गति न आने का कोई कारण नहीं। देखना है कितनी जल्दी आती है पुरानी गति।

नोटबंदी के संबंध में यह समझना भी ज़रूरी है कि इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी थी। मैं समझता हूँ कि इस कदम का मुख्य कारण था काले धन को बाहर निकालना और मुख्यधारा में लाना। एक जटिल प्रश्न यह भी है कि काले धन का जन्म ही कैसे हुआ। हमारे यहाँ 70 का दशक आते-आते जब कोई व्यापारी 100 रुपये कमाता था तो 97 रुपये तक टैक्स में चला जाता था। इसके बाद लोगों ने अपनी कमाई छुपानी आरम्भ कर दी—यहीं से जन्म हुआ काले धन का। देश में काला धन छुपाना कठिन पड़ा तो स्विट्ज़रलैंड जैसे तमाम देशों में खाते खोलकर पैसा जमा करने लगे। इसके साथ ही स्वदेशी काला धन विविध रूपों में चला गया। इसके लिए ज़रूरी था ज़मीनों की बिक्री और दाख़िल-ख़ारिज की निगरानी और आवश्यक कार्यवाही। लेकिन अब जो कैशलेस लेन-देन का प्रयास चल रहा है, वह शायद काले धन पर लगाम लगा सके। आशा की जानी चाहिए कि हमारी विदेश नीति प्रभावी होगी और नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे अनगिनत लोग सहयोग करने पर बाध्य होंगे। विदेशी काला धन देश में लाना हमारी सरकार की अग्नि परीक्षा है।
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