कब तक ये प्रभावशाली लोग और विशेषज्ञ मिलकर किसान को बलि का बकरा बनाते रहेंगे?

कब तक ये प्रभावशाली लोग और विशेषज्ञ मिलकर किसान को बलि का बकरा बनाते रहेंगे?देविंदर शर्मा के कॉलम ‘ज़मीनी हक़ीक़त’ में इस हफ्ते पढ़िए

नई दिल्ली में धुंध से धूप न निकलने पर वायु प्रदूषण से चिड़चिड़ाए लोग जल्द ही इसे भूल जाएंगे। स्कूल दोबारा खुल जाएंगे, डीजल जेनरेटर फिर गड़गड़ाने लगेंगे और निर्माण उद्योग पूरी रफ्तार से काम शुरू कर देगा। एक दु:स्वप्न की तरह, दिल्ली में धुंध के दिनों की ये खौफनाक यादें धूमिल हो जाएंगी लेकिन दिल्ली के बाशिंदों के जहन में यह बात हमेशा घूमेगी कि वायु प्रदूषण के बढ़ने की वजह पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के किसान द्वारा जलाया गया ठूंठ था। विशिष्ट, अमीर और ताकतवर, विशेषज्ञ और मीडिया ने असहाय किसानों को बलि का बकरा बनाने का काम सफलतापूर्वक किया।

यह मीडिया की ताकत है, जिसने ठूंठ जलते खेत की तस्वीरें लगातार दिखाईं। विभिन्न अखबारों ने जितना वर्गीकृत हो सकता है, उस रूप में खबरें छापीं कि वाहन इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं, गुनाह किसानों का है जो ठूंठ जला रहे हैं। अगर ऐसा है तो नई दिल्ली में पंजीकृत 8.8 लाख दोपहिया-चौपहिया और शहर में रोजाना प्रवेश करने वाले करीब 5.6 लाख वाहन, क्या ईंधन से नहीं पानी से चलते हैं? मीडिया ने किसानों पर यह गंभीर आरोप लगाते वक्त एकबार भी इस तथ्य की ओर ध्यान नहीं दिया। उन्हें इसका अहसास भी नहीं हुआ कि बेकसूर किसानों को खलनायक के रूप में पेश किया गया।

यह पहली बार नहीं है। हरेक बार जब भी कुछ गलत होता है तो वह निर्दोष किसानों के सिर मढ़ दिया जाता है। अगर शहरों में पानी की किल्लत हुई तो इसके लिए भी किसान जिम्मेदार। वे सिंचाई का पानी बर्बादी करते आए हैं, और तत्काल ही एक चालू ट्यूबवेल की तस्वीरें फ्लैश हो जाती हैं। अगर अनाज की कीमतें ऊपर गईं तो यह भी किसान की गलती है। बहस छिड़ जाती है कि उनको जो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिल रहा है उसके कारण ही महंगाई बढ़ी। इसलिए सरकार महंगाई की दर को नियंत्रण में रखने के लिए जानबूझकर किसान को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं चुकाकर अपाहिज बना देती है। अगर औद्योगिक उत्पादन घटता है तो भी किसान इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। यह तक कहा जाता है कि वह उद्योग को अपना खेत नहीं बेच रहे हैं जिससे औद्योगिक विस्तार प्रभावित हो रहा है।

और जहां किसान आत्महत्या कर रहे हैं तो भी उनकी गलती है। वे आलसी हैं, काम नहीं करना चाहते, पियक्कड़ हैं, और शादियों में अंधाधुंध रकम उड़ाते हैं। अनाज संकट के बने रहने की वजह भी वही हैं। वे नवीनतम तकनीक भी नहीं अपना पा रहे हैं जिसके कारण उनकी फसल की पैदावार हमेशा की तरह घट रही है। पैदावार जितनी कम होगी, कमाई उतनी ही घटेगी। जितनी आय घटेगी किसान उतना ही ज्यादा कर्जदार होता जाएगा और एक दिन उसके बोझ तले दम तोड़ देगा। आम धारणा है कि किसान अपनी ही गलतियों से जान गंवाता है, अपनी ही करनी से। गरीब किसान को मरने के बाद भी आरोपों के कटघरे में खड़ा किया जाता है। किसान सबसे आसान बलि का बकरा बन गए हैं, आसानी से उपलब्ध होने वाला पंचिंग बैग।

इन तौर-तरीकों पर हैरानी होती है। जब किसान ऊंचा एमएसपी मांगता है तो उसे कहा जाता है कि फसल उत्पादन की लागत घटाओ। कोई यह नहीं बताता कि यह कैसे संभव होगा जबकि खाद, बीज, कीटनाशक और मैकेनिकल औजार की ऊंची कीमतें उसके बस के बाहर की चीज हैं। अगर देश के 17 राज्यों के किसान परिवारों की औसत आय 20 हजार रुपए सालाना है तो मुझे हैरानी है कि कैसे विशेषज्ञ और नीति निर्माता उत्पादन की कीमत घटाने का सुझाव दे सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किसान की उत्पादन कीमत का ऊंचा रहना भी उसकी गलती है। उन्हें उत्पादन लागत घटाने के प्रबंधन के बारे में सीखना चाहिए।

लेकिन जब कर्मचारी मासिक वेतन बढ़ाने की मांग करते हैं तो मैंने कभी नहीं पाया कि किसी ने, चाहे नीति निर्माता हों या स्वयं वित्तमंत्री, उनसे आजीविका खर्च घटाने की बात कही हो। सरकारी कर्मचारी आपको सीना चौड़ा करके अपनी खरीदी हुई नई कार के बारे में बताता है और अक्सर कुछ तो अपनी महंगी एसयूवी की बात करते हैं, साथ ही कैसे उन्होंने अपनी पुरानी 42 इंच के टीवी सेट को बदलकर नई 48 इंच की एलईडी टीवी खरीदी, इसकी भी चर्चा करते हैं। कर्मचारी अपने महंगे गैजेट के बारे में बड़े फक्र से बताते हैं, खर्चीली पार्टियों में दावत उड़ाने की बात, महंगी शराब पीने का किस्सा और जो ब्रांडेड कपड़े वे पहनते हैं उसकी चर्चा। अगर किसी कर्मचारी के बेटे-बेटी की शादी में अश्लीलता का प्रदर्शन देखना है तो बस उस समारोह में जाकर देखिए, सब पता चल जाएगा।

मैंने कभी नहीं सुना कि किसी कर्मचारी ने अपनी खर्चीली जीवनशैली के लिए आत्महत्या की हो। न ही वित्तमंत्री या मुख्य आर्थिक सलाहकार को कर्मचारियों से यह अपील करते सुना है कि वे देश की अर्थव्यवस्था जो नाजुक दौर से गुजर रही है, के लिए अपनी आजीविका खर्च में कटौती करें। उन्हें सातवें वेतन आयोग में मासिक भत्तों में वृद्धि के साथ सैलरी में भारी भरकम बढ़ोतरी मिली है। केंद्रीय कर्मचारियों को कंडोम खरीदने के भत्ते समेत कुल 108 भत्ते मिले हैं। अगर आपको लग रहा है कि मैं इसकी शिकायत कर रहा हूं तो ऐसा नहीं है। मैं सिर्फ समाज में बढ़ती असमानता के स्तर को रेखांकित कर रहा हूं।

अगर किसी किसान को मिलने वाले एमएसपी के हिस्से के रूप में उसके उत्पादन की लागत पर 50 फीसदी मुनाफे का भुगतान किया जाए तो उद्योग कराहने लगता है, सरकार नाक-भौं सिकोड़ने लगती है लेकिन जब कर्मचारी सातवां वेतन आयोग पाता है तो उद्योग इसे अर्थव्यवस्था में उछाल का द्योतक बताता है और वित्तमंत्री के पास वित्तीय स्रोतों की कोई कमी नहीं रहती है। जब किसान कृषि ऋण की माफी की मांग करता है तो सरकार के पास धन नहीं होता और ऐसा करने से बैकों की सेहत खराब होने की दुहाई दी जाती है लेकिन जब उद्योगों के बकाया ऋण, जोकि लाख करोड़ रुपए के आसपास होते हैं, तब बैंकों की सेहत सुधारने के लिए प्रयास सबसे ज्यादा जरूरी हो जाते हैं। जब सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि उद्योग जगत के डिफाल्टरों के नाम क्यों नहीं उजागर किए जा रहे, सरकार का जवाब होता है कि इससे निवेशकों में गलत संदेश जाएगा, लेकिन डिफाल्टर किसान का नाम उजागर करने में कोई हर्ज नहीं है, वह भी अपराधियों के साथ पोस्टर में छापा जाता है, और उसे तहसील दफ्तर में टांगा जाता है जैसे कि वे भी हार्डकोर अपराधी हैं।

क्या ऐसे ही चलता रहेगा? मुझे लगता है, हां। अब किसान स्वयं इसके बारे में सोच-विचार कर फैसला करें और संयुक्त रूप से इस सोच के खिलाफ संघर्ष की रणनीति बनाएं। दो क्षेत्रों पर तत्काल ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है- पहला है, किसानों और शहरी जनसंख्या के बीच बढ़ती दूरी। छात्रों समेत शहर के लोग नहीं जानते कि किसानों का उनके जीवन में क्या योगदान है। जब वे भोजन करने बैठते हैं तो एकबार भी उस किसान के बारे में नहीं सोचते इसीलिए जब कोई किसान आत्महत्या करता है तो वे इससे चिंतित तक नहीं होते। किसान नेताओं और किसान संगठनों को साथ मिलकर इस लापता संपर्क को जोड़ना होगा और दूसरा, किसान यूनियनों को विचार मंच के गठन, शोध के लिए छोटा दल बनाने, और नीतियों पर सलाह देने व मीडिया से संपर्क रखने वाले विशेषज्ञों के लिए निवेश करना होगा। कहीं से शुरुआत होनी चाहिए, अगर वे इस आरोप-प्रत्यारोप के खेल से बाहर निकलना चाहते हैं तो जल्द प्रयास करने होंगे।

(लेखक प्रख्यात खाद्य एवं निवेश नीति विश्लेषक हैं, ये उनके अपने विचार हैं)

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