कर्जदार अमीरों पर क्यों मेहरबान है सरकार?

कर्जदार अमीरों पर क्यों मेहरबान है सरकार?देवेंद्र शर्मा का लेख “जमीनी हकीकत”

आप में से कई लोग तड़के चार बजे ही कम्बल ओढ़कर बैंक के आगे लाइन लगा रहे हैं। कुछ तो दो बजे रात में ही बैंक के बाहर पहुंच रहे हैं और अपने 2000 रुपए वापस पाने के लिए घंटों लाइन में खड़े रहते हैं। मैं यह बात पक्के तौर पर कह सकता हूं कि गाँव में लोग काफी लंबी दूरी तयकर बैंक पहुंच रहे हैं और उन्हें तो कई दिनों तक लाइन में खड़ा होना पड़ रहा है।

मुझे देशभर से सैकड़ों फोन आए जिससे जानकारी हुई कि गाँव में इस नोट बंदी का क्या असर पड़ा है। ग्रामीणों ने मुझे फोन कर अपनी बेचैनी, गुस्से और कुढ़न के बारे में बताया। इनमें से कुछ फोन यह जानने के लिए आए कि 500 और 2000 रुपए के नोट बदलने की इस प्रक्रिया से खेती कैसे प्रभावित हो रही है, और इनमें कुछ यह जानने को उत्सुक थे कि विमुद्रीकरण अर्थव्यवस्था के लिए कैसे मददगार होगा लेकिन मदद के लिए लोगों की यातनाएं और रुलाई सुनने के बाद इच्छा हुई कि उनकी आवाज सरकार तक पहुंचाई जाए ताकि वह एपीएमसी को खरीद-फरोख्त शुरू करने का निर्देश दे, यह बताए कि कहां जाकर वे अपना आलू, प्याज और धान बेचें। कई लोगों ने मुझे बताया और बोलते-बोलते फफक पड़े कि कैसे वे रबी की फसल नहीं बो पा रहे हैं।

चाहे प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक, मीडिया में ग्रामीण भारत के इस दर्द और व्यथा को जगह नहीं मिल पाई। एक टीवी चैनल पर जब मैंने एक वरिष्ठ अर्थशास्त्री को यह कहते सुना कि किसानों के पास शिकायत करने की कोई वजह नहीं है क्योंकि वे अपना धान बाजार में बेच चुके हैं जिसके लिए उन्हें उनका न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिल चुका है, तो मैं भयभीत हो उठा। यह दर्शाता है कि कितने अनजान हैं ये लोग। भारत में सिर्फ छह फीसदी किसानों को एमएसपी का लाभ मिला है। इसका किसी को अहसास नहीं है कि जिन 94 फीसदी किसानों को अपना धान बेचना बाकी है उनको अब उसे बेचने में छीकें आ जाएंगी।

मंगलवार को जब पूरा देश कतार में खड़ा था तो एक अखबार में खबर छपी कि स्टेट बैंक ने 63 कर्जदारों पर बकाया 7016 करोड़ राइट-ऑफ किया। इसमें किंगफिशर एयरलाइंस के विजय माल्या का 1201 करोड़ शामिल था, जो पिछले कुछ समय से भगोड़ा हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड में 24 फरवरी, 2016 के लेख में इन इरादतन कर्जदारों को ‘बिगड़ैल कर्जदार-कॉरपोरेट और व्यक्तिगत’ बताया गया है। लेख में कहा गया है -’उनकी क्षमता कर्ज चुकाने की है लेकिन मंशा नहीं है। वे कथित तौर पर जानबूझकर ऐसा कर रहे हैं। बैंकों के लिए उनसे पैसा निकाल पाना टेढ़ी खीर है।’

हालांकि, मैं यहां एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाना चाहता हूं जिस पर मीडिया में चर्चा हुई लेकिन वह ज्यादा दिन तक छाया नहीं रहेगा। मंगलवार को जब पूरा देश कतार में खड़ा था तो एक अखबार में खबर छपी कि स्टेट बैंक ने 63 कर्जदारों पर बकाया 7016 करोड़ राइट-ऑफ किया। इसमें किंगफिशर एयरलाइंस के विजय माल्या का 1201 करोड़ शामिल था, जो पिछले कुछ समय से भगोड़ा हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड में 24 फरवरी, 2016 के लेख में इन इरादतन कर्जदारों को 'बिगड़ैल कर्जदार-कॉरपोरेट और व्यक्तिगत' बताया गया है। लेख में कहा गया है -'उनकी क्षमता कर्ज चुकाने की है लेकिन मंशा नहीं है। वे कथित तौर पर जानबूझकर ऐसा कर रहे हैं। बैंकों के लिए उनसे पैसा निकाल पाना टेढ़ी खीर है।'

ये दरअसल इरादतन मुजरिम हैं। वे बैंक से जानबूझकर कर्ज लेते हैं कि उसे चुकाना नहीं है। और मुझे क्या बात सबसे ज्यादा दुखी करती है कि एसबीआई ने वाकई इन इरादतन मुजरिमों का बकाया लोन राइट-ऑफ कर दिया है। हालांकि आप इस बात से सहमत होंगे कि बैंकों के पास उनको सलाखों के पीछे डालने का रास्ता मौजूद है।

संसद में बुधवार को वित्त मंत्री अरुण जेटली का वह बयान मुझे हैरान करता है। हिन्दुस्तान टाइम्स के 17 नवंबर के अंक में छपी खबर में बताया गया है कि वित्तमंत्री ने राज्यसभा में विपक्ष के सदस्यों को राइट-ऑफ के मूल अर्थ पर ध्यान न देने की बात कही। वित्त मंत्री ने कहा- 'इसमें कुछ झमेला हैं। इसके वास्तविक अर्थ पर न जाइए। राइट-ऑफ का कतई मतलब यह नहीं है कि कर्ज माफ कर दिया गया। कर्ज बना रहेगा और उसकी अदाएगी के लिए बैंक प्रयास करेंगे।'

एसबीआई की चेयरपर्सन अरुंधती भट्टाचार्या ने बाद में 63 इरादतन बकाएदारों के कर्ज राइट-ऑफ करने पर जारी बहस को हल्का करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि कर्ज माफ नहीं किया गया है बल्कि ऐसी सूची में डाल दिया गया है जिसे 'अकाउंट अंडर कलेक्शन' कहते हैं। इसके अनुसार ही बैंक अपना बकाया कर्जा वसूल करेंगे।

इस व्याख्या से मुझे लगाता है जैसे जानबूझकर लोन न चुकाने वालों यानि विलफुल डिफॉल्टर्स को छुपाने का इंतज़ाम किया जा रहा है। अगर इन डिफॉल्टर्स से लोन और उसका ब्याज़ निकलवाने का इंतजाम ये बैंक आज तक नहीं कर पाए तो आगे इनसे कालाधन निकलवाने का कौन सा खास तरीका अपनाने वाले हैं, ये समझ नहीं आता। सबसे ज्यादा खराब बात तो यह है कि डिफॉल्टरों को बचाने का ये सारा प्रयास ऐसे समय में किया जा रहा जब देश का हर इंसान देश की लंबी लाइनों में इस आशा के साथ खड़ा है कि अब कालेधान का खात्मा हो जाएगा।

ये कर्ज को 'राइट-ऑफ' करने की सुविधा केवल अमीरों को ही दी जाती है। इतना ही नहीं सरकार इन लोगों की पहचान भी गोपनीय रखने की सुविधा देती है। अगर आप को याद हो कि कुछ समय पहले सरकार ने ऐसे 57 डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया था जिनका 85,000 करोड़ रुपए का कर्ज़ बकाया था। 'ये कौन लोग हैं जिन्होंने कर्ज़ लिया था और अब नहीं चुका रहे हैं? इस तथ्य को सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?' मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अगुवाई वाली बेंच ने पूछा था।

आइए समझते हैं कि मुझे ये 'राइट-ऑफ' सिर्फ अमीरों को दी जाने वाली सुविधा क्यों लगती है। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब अख़बार देश के किसी एक हिस्से में किसान की आत्महत्या की ख़बर न छापते हों। एक अनुमान के अनुसार पिछले 20 साल में 3.20 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इनमें से ज्यादातर आत्महत्याएं इसलिए हुईं क्योंकि किसान अपने कर्ज नहीं चुका पा रहे थे। मैं खुद ऐसे कई किसानों को जानता था जिन्होंने 1.5 लाख रुपए के कर्ज़ के लिए अपनी जान ले ली। पंजाब के एक किसान ने तो अपने पांच साल के अपने बच्चे को सीने से बांधकर नहर में छलांग लगा दी। उसके ऊपर 10 लाख रुपए का कर्ज़ था, और कारण -- जिसकी वजह से वो किसान अपने बच्चे को भी लेकर कूदा -- ये था कि उसे लगा कि उसका बच्चा भी ज़िंदगी भर इस कर्ज़ के बोझ तले दबा रहेगा।

इसके विपरीत, मैंने आज तक किसी अमीर डिफॉल्टर को कर्ज़ न चुका पाने पर आत्महत्या करते नहीं सुना। ऐसे कर्ज़दार या तो देश छोड़कर भाग जाते हैं या फिर 'विलफुट डिफॉल्टर' की श्रेणी में डाल दिए जाते हैं। कई बार तो केवल डिफॉल्टर भर कहलाने से ही उन्हें एक सुरक्षा कवच मिल जाता है। ऐसे डिफॉल्टरों को पहले बैंकिंग की भाषा में 'अकाउंट अंडर कलेक्शन' की श्रेणी में डाल दिया जाता है फिर धीरे-धीरे इन्हें 'नॉन परफॉर्मिंग असेट' यानि निष्क्रिय खातों की श्रेणी में डाल दिया जाता है। कुछ समय बाद इन निष्क्रिय खातों को बैंकों के दस्तावेज़ों से 'राइट- ऑफ' कर दिया जाता है।

अमीरों को दी जाने वाली ये सुविधा मुझे सोचने पर मजबूर करती है किसान या आम आदमी को भी कर्ज़ न चुका पाने की स्थिति में 'अकाउंट अंडर कलेक्शन' की अलग श्रेणी में क्यों नहीं डाला जाता। बैंकों को लोन दी गई अपनी मूल राशि रिकवर करने का प्रयास करने दिया जाए, और जैसा एसबीआई ने इन 63 डिफॉल्टरों के साथ किया वैसे ही किसानों के कर्ज़ भी 'राइट-ऑफ' क्यों नहीं करते। मेरा विश्वास है कि बैंकों के इस अकेले कदम से ही पिछले 20 साल में आत्महत्या करने वाले 3.2 लाख किसानों में से 50 प्रतिशत जानें बचाई जा सकती थीं।

दूसरा, मुझे इसका भी कोई मतलब नहीं समझ आता कि क्यों कर्ज़ न चुका पाने वाले किसानों की तस्वीर, तहसीलों के नोटिस बोर्ड पर डिफॉल्टर घोषित कर चिपका दी जाती है, जैसे वो कोई अपराधी हों और अक्सर इन तरीकों से होने वाले अपमान के चलते ही कर्ज़दार किसान आत्महत्या कर लेते हैं। अगर अमीर कर्ज़दारों के नाम गोपनीय रखे जाते हैं तो डिफॉल्टर किसानों के नाम क्यों सार्वजनिक किए जाते हैं?

(लेखक प्रख्यात खाद्य एवं निवेश नीति विश्लेषक हैं, ये उनके अपने विचार हैं।)

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