योगी आदित्यनाथ : महंत से मुख्यमंत्री तक टूटे कई मिथक

योगी आदित्यनाथ :  महंत से मुख्यमंत्री तक टूटे कई मिथकयोगी आदित्यनाथ की सरकार का अब कुछ ही दिनों में एक महीना पूरा होने वाला है।

यूपी के प्रथम भगवाधारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार का अब कुछ ही दिनों में एक महीना पूरा होने वाला है। अपने आलोचकों को गलत साबित करने निकले 44 वर्षीय मुख्यमंत्री के भीतर परिवर्तन होता दिख रहा है। बदलाव के निशान तभी से नज़र आने लगे थे जब महीने भर से भी कम वक्त पहले वो गद्दी पर बैठे थे।

वाक़ई एक हंगामाखेज़ कहे जाने वाले व्यक्ति के लिए एक उद्देश्यपूर्ण और सन्तुलित राजनेता में बदलना मुश्किल काम था। लेकिन सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्य के इस युवा मुख्यमंत्री के कार्य सिद्ध कर रहे हैं कि उनका मकसद एक अच्छी सरकार देना है।

योगी ने जब न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर के नारे के साथ ये नया अवतार लिया, तो किसी को खास विश्वास नहीं हुआ। उनके इस कथन को व्यंग्यात्मक रूप में लिया गया। जाहिर था कि ये कथन मुस्लिम वर्ग के परिप्रेक्ष्य में था, जो उनकी जीत के बाद से ही कुछ सहमा हुआ था पर मुख्यमंत्री का हर कार्य सिद्ध करता है, कि वो कितने गम्भीर और आत्मनिष्ठ हैं।

योगी ने जब न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर के नारे के साथ ये नया अवतार लिया, तो किसी को खास विश्वास नहीं हुआ। उनके इस कथन को व्यंग्यात्मक रूप में लिया गया। जाहिर था कि ये कथन मुस्लिम वर्ग के परिप्रेक्ष्य में था, जो उनकी जीत के बाद से ही कुछ सहमा हुआ था पर मुख्यमंत्री का हर कार्य सिद्ध करता है, कि वो कितने गम्भीर और आत्मनिष्ठ हैं।

उनके इस कथन की पुष्टि कुछ ऐसे तथ्य भी करते हैं जिनके बारे में अमूमन कम जानकारी थी। कौन सोच सकता था कि योगी ने न सिर्फ अपने गोरखनाथ मन्दिर का हिसाब-किताब एक मुस्लिम के हवाले किया हुआ है, बल्कि उनकी गौशाला की देखरेख का सर्वोच्च अधिकारी भी अल्पसंख्यक समुदाय से ही है। क्या वो यही आत्मनिष्ठा राजनीति में भी रख पाएंगे, यही वो महत्वपूर्ण प्रश्न है जो राजनैतिक गलियारों में तैर रहा है। ये महत्वपूर्ण है कि अभी तक उन्होंने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया, जो विचलन कहा जा सके।

उनकी सरकार का अंदाज़ पहले की सरकारों से बिलकुल अलग है खासतौर से मुलायम सिंह यादव, मायावती और अखिलेश यादव की सरकारों से। शायद वो उस प्राचीन मान्यता में यकीन करते हैं कि वही अधिकारी बेहतर काम कर सकेंगे जो जानते हैं कि वो किसी विशेष राजनैतिक दल के नहीं, बल्कि सरकार के लिए काम कर रहे हैं। बदकिस्मती से नए क्षेत्रीय दलों के उदय के साथ ही यह महत्वपूर्ण बात भुला दी गई, क्योंकि वो अफसरों पर अपना ठप्पा लगाना चाहते थे।

अभी तक चीफ सेक्रेटरी राहुल भटनागर हों, डीजी पुलिस जावेद अहमद या अखिलेश सरकार द्वारा नियुक्त अन्य उच्च पदधिकारीगण ही क्यों न हों, उन्हें नहीं बदला गया है। महत्वपूर्ण बदलाव केवल मुख्यमंत्री के प्रिंसिपल सेक्रेटरी का है, जिसमें आईएएस अनीता सिंह जो कि एक विवादित अधिकारी रही हैं, जिन्हें अखिलेश खुद भी पसन्द नहीं करते थे। योगी ने उनकी जगह अवनीश अवस्थी को नियुक्त किया, जिनकी छवि साफ़ सुथरे उधमी अधिकारी की रही है। उनको केंद्र सरकार से बाक़ायदा एयरलिफ्ट करवा लिया गया जहां वो बतौर जॉइंट सेक्रेटरी काम कर रहे थे।

शायद योगी अपने गुरु मोदी जी से सीख ले चुके हैं, जिन्होंने अपने अधिकारियों को केवल मनमोहन सरकार से पूर्व संबंधित होने के कारण ही नहीं बदला नहीं था, बल्कि उन्हें खुद को सिद्ध करने का मौका भी दिया था।

शायद योगी अपने गुरु मोदी जी से सीख ले चुके हैं, जिन्होंने अपने अधिकारियों को केवल मनमोहन सरकार से पूर्व संबंधित होने के कारण ही नहीं बदला नहीं था, बल्कि उन्हें खुद को सिद्ध करने का मौका भी दिया था। कुछ महीने बाद केवल वे ही हटाए गए, जो मोदी सरकार के ऊंचे रुतबे के हिसाब से काम नहीं कर सके। यहां भी आलसी अधिकारियों ने अपनी कमर कसनी शुरू कर दी है, और भ्रष्ट और बदनाम अफसर भी बचाव की तैयारियों में लग गए हैं, क्योंकि सन्देश साफ़ है "बदलो या भुगतो"।

योगी के पूर्ववर्ती मायावती और अखिलेश यादव अपने कार्यालय के बजाय सरकारी आवास से काम करना पसन्द करते थे पर योगी ने वो नियम बदल दिए हैं। मध्य रात्रि के बाद भी अपने कार्यालय में काम करते हुए योगी एक नया उदाहरण तो प्रस्तुत कर रहे ही हैं, साथ ही आलसी बाबुओं की नींदें भी हराम कर रखी हैं।

जनता से सीधे सम्पर्क के विषय में भी वो नियम बनाते दिख रहे हैं। मायावती के विपरीत जो लोगों से इतनी अलग-थलग रहा करती थीं कि उन्हें अपने सरकारी आवास से सटी सड़क पर भी लोगों का आनाजाना पसन्द नहीं था और अखिलेश यादव से भी उलट जिन्होंने जनता दरबार की शुरुआत की तो थी, पर बाद में वो भी मायावती के पद चिन्हों पर चलने लगे थे, योगी ने अपने दरवाज़े आम जनता के लिए खोल दिए हैं। अब हर गरीब आदमी की वहां पहुंच है, चाहे वो किसी भी जाति या धर्म का हो।

योगी चाहे नए हों, पर उनकी ताकत जो उनका नैतिक स्वरूप है, वो उन्हें अपने पूर्ववर्तियों से अलग करती है। वो सरकारी अधिकारी जिन्होंने उनको गोरखपुर में नज़दीक से देखा है, वो उनकी ईमानदारी की कसमें खा सकते हैं। हालांकि वो ये भी मानते हैं कि योगी कभी कभी तानाशाह भी बन जाते हैं, पर इसी वजह से ही तो वो उत्तर प्रदेश की भ्रष्ट और नाकारा नौकरशाही में जबरदस्त बदलाव ला पाएंगे। ऊपर से नीचे तक सभी अधिकारियों को चेतावनी दे दी गयी है कि वे अपनी चल-अचल सम्पत्ति का ब्यौरा दें, जिससे उनकी आय का अनुमान लगाया जा सके।

कहा जाता है कि अच्छी शुरुआत मतलब काम आधा खत्म, लेकिन इसको बनाये रखना भी जरूरी है। फिलहाल वो उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पाये हैं जो अवैध बूचड़ख़ानों के संचालन से जुड़े हुए थे। उन्होंने उन अति उत्साही एंटी रोमियो स्क्वायड के उन सदस्यों के खिलाफ भी कुछ नहीं किया जिन्होंने कुछ निर्दोष लोगों को परेशान किया था। जब हरेक दोषी को सजा मिलेगी, तब योगी सरकार की गम्भीरता सिद्ध होगी। जब तक कुछ सर लुढ़ककर नीचे नहीं गिरेंगे तब तक हमें आशान्वित रहना होगा।

लेखक- वरिष्ट पत्रकार हैं, ये उनके अपने निजी विचार हैं।

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