उत्तर प्रदेश का पहला डिजिटल स्कूल, इस स्कूल में 'पढ़ने' आते हैं विदेशी

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   24 Sep 2018 9:02 AM GMT

गोंडा। कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर खिटपिट करती बच्चों की अंगुलियां, डिजिटल बुक से पढ़ाई, अभिभावकों के लिए पैरेंटस काउंटर... ये वो खूबियां हैं जिन्होंने कर्नलगंज तहसील के प्राथमिक विद्यालय धौरहरा को देश-विदेश में खास पहचान दिलाई है। यह देश का पहला डिजिटल प्राथमिक विद्यालय बन गया है। विद्यालय की लोकप्रियता इतनी है कि अमेरिका,कनाडा, हॉन्गकॉन्ग, ब्रिटेन जैसे आधा दर्जन देश के शोधार्थी यहां शोध के लिए आ चुके हैं। स्कूल की इस बदली हुई तस्वीर के पीछे प्रधानाध्यापक की कड़ी मेहनत और जुनून है।

खुद की पढ़ाई के साथ ही अपने घर वालों को भी पढ़ाते हैं ये 'नन्हे शिक्षक'

धरौहरा प्राथमिक विद्यालय प्रदेश का पहला सरकारी विद्यालय है जिसे गूगल के वर्ल्ड मैप पर स्थान मिला है। इस स्कूल को संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से पर्यावरण के लिए किए गए काम के लिए सम्मानित भी किया जा चुका गया है। इस विद्यालय में पर्यावरण पर कई कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। पिछले वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस पर हुए कार्यक्रम को कोरिया से मॉनीटर किया जा रहा था। इस विद्यालय में होने वाले कार्यक्रम को विश्व पटल पर स्थान मिला और गूगल के वर्ल्ड मैप पर स्थान मिला।


विद्यालय के प्रधानाध्यापक रवि प्रताप सिंह ने बताया, 'वर्ष 2013 में मेरी स्कूल में नियुक्ति हुई। जब मैं यहां पहुंचा तो टूटी फर्श और दीवारों के उखड़े प्लास्टर स्कूल की दशा बयां कर रहे थे। छात्र भी पाठ्यक्रम से अंजान थे। मेरे सामने एक चुनौती थी। उसी वक्त मैंने संकल्प लिया कि स्कूल की तस्वीर को हर हाल

में बदलना है। शुरुआत में पैसे को लेकर थोड़ी मुश्किलें आयीं, लेकिन निजी खर्च और जनसहभागिता से उसे दूर करता गया। मेरे इस काम में विद्यालय प्रबंध समिति के सदस्यों की भी बड़ी भूमिका रही। हम सभी ने मेहनत करके आज विद्यालय को इस मुकाम तक पहुंचाया है। ग्रामीणों ने भी हमारा हमेशा सहयोग किया है। आज स्कूल में 324 बच्चे पंजीकृत हैं, जिसमें 183 छात्र और 141 छात्राएं हैं।'

विद्यालय प्रबंध समिति की कोशिशों से स्कूलों में आया बदलाव

किताबों की कमी को डिजिटल बुक ने किया दूर

रवि प्रताप ने बताया, 'बच्चों को समय पर किताबें नहीं मिलती थीं, ऐसे में पढ़ा पाना मुश्किल था। पुस्तकें देर से आती थीं। किताब नहीं मिलने के कारण बच्चों का पाठ्यक्रम भी समय से पूरा नहीं हो पाता था। इस समस्या से निजात पाने के लिए मैंने किताबों को स्कैन करके उन्हें सेव कर लिया। हम लोगों ने एक डिजिटल बुक तैयार की। इस नई विधा से पढ़ने में बच्चों का मन भी ज्यादा लगने लगा। इसके साथ ही छात्रों को पढ़ाने के लिए टीएलएम(टीचिंग लर्निंग मटीरियल) व नवाचार को माध्यम बनाया। अब तो बच्चे कम्पयूटर और टैबलेट से भी पढ़ाई करते हैं।'

कक्षा तीन के छात्र अरुण कुमार कश्यप ने बताया, 'हम लोग किताब के साथ-साथ डिजिटल बोर्ड पर भी पढ़ते हैं। सर ने हमें कम्प्यूटर चलाना भी सिखा दिया है। मुझे हिंदी और गणित पढ़ना बहुत अच्छा लगता है।' इस विद्यालय में डिजिटल बोर्ड पर पढ़ाई होती है, जिसकी वजह से इसे प्रदेश के पहले डिजिटल स्कूल का तमगा मिला हुआ है।


सवाल सुलझाने के लिए बना डाली मैथ्स किट

विद्यालयों में गणित किट की उपलब्धता को लेकर हमेशा से अध्यापक और छात्र परेशान रहते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए प्रधानाध्यापक रवि प्रताप ने अपने छात्रों के साथ मिलकर मैथ्स किट बना डाली। पहले तो कक्षा एक से कक्षा दो तक की किट तैयार की गई। बाद में इसे आगे बढ़ाते हुए कक्षा पांच तक के पूरे पाठ्यक्रम की किट तैयार की गई। प्राथमिक शिक्षा में मैथ्य किट बेहद उपयोगी साबित होती है। इसे बनाने के लिए स्पेशल फॉर्म, प्लास्टिक और रबर आदि बाहर से मंगाया गया ।

यकीन कीजिए, इस सरकारी विद्यालय में 1100 छात्र-छात्राएं हैं...

रवि प्रताप सिंह ने बताया, 'इस मैथ्स किट की बराबरी बाजार में बिकने वाली किट कभी नहीं कर सकती हैं, क्योंकि वह हमारे सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को कवर नहीं करती। इस किट को बेसिक शिक्षा परिषद के पाठ्यक्रम को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।'

विदेश तक है स्कूल की लोकप्रियता

विद्यालय में पाठ्यक्रम से इतर पर्यावरण, स्वच्छता सहित अन्य गतिविधियों से बच्चों को रूबरू कराया जाता है। इसी का परिणाम है कि वर्ष 2015 में व‌र्ल्ड गूगल मैप पर यहां की गतिविधियां डाली गयीं। थोड़े दिन बाद ही यहां व‌र्ल्ड एनिमल केयर यूनिट के हेड क्रिस हेगन ने अपनी टीम के साथ भ्रमण किया। कनाडा के शिक्षाविद् यहां आए और गतिविधियों पर अध्ययन किया। अमेरिका की टीएसए संस्था के यूनिट हेड वाइसी के साथ ही हॉन्गकॉन्ग विश्वविद्यालय के शोध विद्यार्थी भी यहां आए।

ब्रिटेन की यूनाइटेड किंगडम इंटरनेशनल संस्था के साथ ही काम करने का मौका दिया। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद ने यहां की शिक्षण व्यवस्था की तुलना सिंगापुर,चीन व फिनलैंड की शैक्षिक व्यवस्था से की है। इतना ही नहीं 2015 में साउथ कोरिया में जैव विविधता दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में स्कूल का काम दिखाया जा चुका है। रवि प्रताप से ने बताया, " हॉन्गकॉन्ग विश्वविद्यालय के शोध विद्यार्थी यहां पर ग्रामीण और समुदाय के सहयोग से कैसे किसी स्कूल की दशा दिशा बदली जा सककी है इस पर शोध करने आए थे।"

महिला शिक्षकों ने बदल दी स्कूल की सूरत


विद्यालय में मौजूद सुविधाएं

-प्रोजेक्टर के माध्यम से आधुनिक शिक्षा व्यवस्था

-शैक्षिक टेलीविजन के माध्यम से गतिविधि

-आधुनिक ओपेन व डिजिटल लाइब्रेरी

-हाई स्पीड ब्रॉडबैंड व वाई फाई युक्त परिसर

-बिजली, इनवर्टर, साउंड माइक व पंखों की सुविधा

-छात्रों के लिए डायनिंग टेबल की व्यवस्था

-बैठने के लिए आधुनिकतम फर्नीचर

-आधुनिक हैंडवॉश प्वाइंट की व्यवस्था

-टाई, बेल्ट, आई कार्ड व डायरी की व्यवस्था


विद्यालय की उपलब्धियां

-जिले के आदर्श विद्यालय के रूप में चयन

-प्रदेश के शैक्षिक कैलेण्डर में विद्यालय की गतिविधियों को स्थान

-राष्ट्रीय डॉल्फिन मेला एवं कैम्प में विद्यालय का चयन एवं आयोजित प्रतियोगिता

में छात्रों को दूसरा स्थान

-संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अंतर्गत विद्यालय को प्रशस्ति पत्र

-ग्रीन वेव कार्यक्रम में सम्मिलित होने पर विद्यालय को गूगल मैप पर स्थान

-विश्व गौरैया संरक्षण सूची में स्थान

-वॉशिंगटन से प्रमाण पत्र

-ब्रिटिश कौंसिल से सह-शिक्षा हेतु सम्बधता

स्कूल न आने पर घर से बच्चों को बुलाकर लाते हैं एसएमसी सदस्य और शिक्षक

बनाया पैरेंट्स काउंटर

प्रधानाध्यापक रवि प्रताप सिंह कहते हैं,'धौरहरा प्राथमिक विद्यालय में पैरेंट्स काउंटर भी है। यहां अभिभावकों के लिए बैंकों के ट्रांसफर वाउचर और विड्रॉल फार्म आदि भी उपलब्ध हैं। साथ ही किसानों के लिए चलाई जा रही सभी

योजनाओं के बारे में जानकारी उपलब्ध है। वहीं यहां से स्वास्थ्य विभाग द्वारा अस्पताल में चल रही योजनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।'



एसएमसी सदस्य रखते हैं स्कूल का ख्याल

विद्यालय परिसर में साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है। रोज स्कूल में सफाई होती है। स्कूल की सफाई की जिम्मेदारी एसएमसी सदस्यों ने ले रखी है। पूरे परिसर को बहुत सुंदर तरीके से सजाया गया है। बच्चों को प्रेरित करने के लिए देश के महान लोगों की पेंटिंग भी बनाई गई है। एसएमसी सदस्य अनोखे लाल ने बताया, 'इस स्कूल की वजह से हमारे गाँव की पहचान पूरे प्रदेश में होने लगी है। यह नाम और पहचान हमेशा बनी रहे इसके लिए हम लोग भी पूरे मन से जिम्मेदारी निभाते हैं और स्कूल को साफ सुथरा रखते हैं।'

एसएमसी सदस्य बुद्धू ने बताया, 'मैं पढ़ा नहीं हूं लेकिन चाहता हूं कि गाँव का हर बच्चा पढ़े। जो लोग अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते हैं उन्हें बताता हूं कि बच्चे को स्कूल जरूर भेजो नहीं तो हमारी तरह अनपढ़ रह जाएगा।'


दाखिले के लिए लगती है लाइन

'लगातार बढ़ती बच्चों की संख्या की वजह से स्कूल का परिसर छोटा पड़ने लगा है। आज हमारे विद्यालय में इतने बच्चे हो गए हैं कि उन्हें संभाल पाना मुश्किल होता है। अब हम नए बच्चों का प्रवेश लेने से मना कर देते हैं, बावजूद इसके कई अभिभावक जगह जगह सिफारिश कर यहां अपने बच्चों का नाम लिखवाना चाहते है।'

रवि प्रताप सिंह, प्रधानअध्यापक

'हमारे गाँव का स्कूल किसी प्राइवेट स्कूल से कम नहीं है। यहां पर बहुत अच्छी पढ़ाई होती है। हमारे छोटे-छोटे बच्चों को भी कम्प्यूटर चलाना आता है। स्कूल के सभी मास्टर साहब बहुत मन से हमारे बच्चों को पढ़ाते हैं।'

अली अहमद, अभिभावक

"मेरे दो बच्चे इस स्कूल में पढ़ते हैं। पहले मेरे बच्चे एक निजी स्कूल में जाते थे, लेकिन वहां पढ़ाई नहीं होती थी। वहां से नाम कटवाकर मैंने अपने बच्चों का नाम यहां लिखवा दिया है। अच्छी पढ़ाई का असर उनमें साफ देखा जा सकता

है।"

सत्यदेव, अभिभावक

"मैं कम्प्यूटर और लैपटॉप चला लेता हूं। स्कूल में रवि सर मुझे टैबलेट भी देते हैं उसी पर मैं सवाल सही करता हूं। मुझे इस स्कूल में बहुत अच्छा लगता है।"

अभिषेक, कक्षा तीन

"मुझे खुशी है कि मैं धरौहरा की प्रधान हूं। स्कूल की वजह से मुझे हर जगह सम्मान मिलता है। स्कूल और बच्चों के लिए जितना भी मद आता है शत प्रतिशत इस्तेमाल किया जाता है। रवि सर की वजह से हमारे स्कूल का नाम दूर-दूर तक फैला

है।"

रजनी गुप्ता, प्रधान


-----आंकड़े-----

जनपद में पूर्व माध्यमिक विद्यालय--898

जनपद में माध्यमिक विद्यालय--2232

जनपद में कस्तूरबा विद्यालय--17

जनपद में आश्रम पद्धति विद्यालय--3

जनपद में एडेड मदरसे---6

जनपद में राजकीय विद्यालय(जीआईसी )--1

जनपद में महिला राजकीय विद्यालय(जीजीआईसी)--2

माध्यमिक विद्यालय में बच्चों की संख्या--259162

पूर्व माध्यमिक विद्यालय में बच्चों की संख्या--69139

(छात्रों की संख्या सितंबर 2017 की है)

खुद पढ़े नहीं, लेकिन जगा रहे शिक्षा की अलख


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