भारत में एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध का बढ़ता खतरा, उठाने होंगे कुछ कारगर कदम

साल 2050 तक, एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (एएमआर) की वजह से, दुनिया भर में हर साल एक करोड़ से अधिक मौतों का अनुमान है। जिनमें से 20 लाख मौतें अकेले भारत में होंगी। भारत में सेप्सिस (घाव से मृत्यु) की वजह से नवजात शिशुओं की होने वाली 30 प्रतिशत से अधिक मौतों का जिम्मेदार एएमआर है।

K Madan GopalK Madan Gopal   24 Nov 2021 1:55 PM GMT

मानव जाति ने अपने फायदे के लिए जिन चीजों की खोज की, उनमें से कई आज उनके के लिए खतरा बनती जा रही हैं। चाहे वो जीवाश्म ईंधन हो, परमाणु ऊर्जा, या फिर एंटीबायोटिक्स। यकीनी तौर पर एंटीबायोटिक्स को 20वीं सदी का सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अविष्कार माना जा सकता है। हां, इनकी वजह से आज तक कितनी जानें बचीं, इसका हिसाब लगा पाना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि समुचित आंकड़ों का अभाव है।

पेनिसिलिन पहली एंटीबायोटिक थी, जिसने 20 करोड़ से अधिक लोगों की जान बचाई है। अब 100 से ज्यादा एंटीबायोटिक्स मार्किट में मौजूद हैं जो हर दिन लाखों लोगों की जान बचा रही हैं।

पेनिसिलिन की खोज करने वाले अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने नोबेल पुरस्कार प्राप्त करते समय सबसे पहले इसके दुरुपयोग और अति प्रयोग के खिलाफ चेतावनी दी थी। उन्होंने बहुत पहले, साल 1945 में पेनिसिलिन के दुरुपयोग के खिलाफ दुनिया को आगाह किया था। उनके अनुसार, इन दवाओं के ज्यादा और अनियमित इस्तेमाल से बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम हो जाएगा, और एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (एएमआर) का कारण बन सकता है। एंटीबायोटिक प्रतिरोध एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध की एक उप-श्रेणी है, जिसमें एंटीबायोटिक्स प्रतिरोधी हो जाने वाले बैक्टीरिया को रखा जाता है.

आज, इस खतरे के बारे में दुनिया का सर्वोच्च नेतृत्व भी बात कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एएमआर को दुनिया के सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े पहले दस खतरों में से एक बताया है। मई 2015 में, WHO ने एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध पर वैश्विक कार्रवाई का समर्थन किया था।

भारत एक फार्मा-सुपर पावर के रूप में गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रक्टिस को अपनाकर दुनिया के सामने एक उदाहरण पेश कर सकता है।

पांच साल पहले, 2016 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा में राष्ट्राध्यक्षों ने कई क्षेत्रों में एएमआर से जुड़ी समस्याओं के मूल कारणों पर बात करने की प्रतिबद्धता जताई थी। इतिहास में यह सिर्फ चौथी बार था जब संयुक्त राष्ट्र महासभा में किसी स्वास्थ्य संबंधी चिंता पर इतनी गंभीरता से चर्चा की गई थी।

भारत में एएमआर का बढ़ता खतरा

अनुमान है कि 2050 तक, दुनिया भर में एंटीबायोटिक प्रतिरोध की वजह से एक करोड़ से ज्यादा लोगों की मौत होगी। इन मरने वालों में से 20 लाख लोग अकेले भारत से होंगे। ये अनुमान कोविड से पहले के हैं. अब संभावना है कि इस दिशा में वैज्ञानिक प्रयास होने पर इस आंकड़े में संशोधन हो और बढ़ोतरी हो.

भारत में सेप्सिस से होने वाली नवजात शिशुओं की 30 प्रतिशत से ज्यादा मौतों का कारण एएमआर है। अगर आंकड़ों के नजरिए से देखें तो हर साल कैंसर से पूरी दुनिया में एक करोड़ लोगों की मौत हो जाती है. वहीं कोविड-19 महामारी से अबतक 50 लाख लोगों ने दम तोड़ दिया है।

कोविड-19 रोगियों के इलाज के अतिरिक्त भार की वजह से वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली चरमरा गई थी। कई अध्ययनों से पता चलता है कि एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल से करोड़ों अतिरिक्त खुराकें बढ़ीं. शायद एएमआर के खतरनाक प्रभावों की वजह से इसका खतरा कई गुना और बढ़ा गया।

फार्मास्युटिकल कंपनियों के एक्टिव कंपाउंड्स (क्रियाशील यौगिकों) के अति प्रयोग, दुरुपयोग के कारण एंटीबायोटिक दवाओं सरीखे एंटीमाइक्रोबियल्स का प्रतिरोध बढ़ रहा है। WHO के ग्लोबल एक्शन प्लान में- एएमआर के बारे में जागरूकता, समझ में सुधार, निगरानी के माध्यम से जानकारी और साक्ष्यों को मजबूत करना, संक्रमण की घटनाओं को कम करना, स्वास्थ्य, जानवरों और भोजन में एंटीमाइक्रोबियल एजेंटों के उपयोग को बेहतर करते हुए एएमआर के लिए निवेश को बढ़ावा देना शामिल है।

2017 में नेशनल एक्शन प्लान ऑन एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (NAP-AMR) लाकर भारत ने एएमआर के खिलाफ लड़ाई में दुनिया का नेतृत्व करने की इच्छा दिखाई। अलग-अलग राज्य इन दिशानिर्देशों को लागू करने के विभिन्न चरणों में थे, पर बीच में जब कोविड-19 आ गया और एएमआर प्राथमिकता सूची में नीचे खिसक गया।

अब सवाल यह उठता है कि एएमआर के बढ़ते खतरे को कम करने में हम कहां खड़े हैं?

'वन हेल्थ' नजरिए की जरुरत

एएमआर एक जटिल मुद्दा है जो पशु, पर्यावरण और इंसानी इकोसिस्टम के बीच गुंथा हुआ है। यहां 'न्यू डेल्ही मेटालो-ए-लैक्टामेज-1 (एनडीएम-1)' का उदाहरण लिया जा सकता है– यह एक एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी सुपरबग है।

NDM-1 पहले भारत में उभरा और बाद में 100 से अधिक देशों में फैल गया। NDM-1 आर्कटिक के सुदूर क्षेत्र में भी पाया गया था। आर्कटिक में फैलने का संभावित कारण प्रवासी पक्षियों, अन्य वन्यजीवों या इंसानों का मल रहा है।

पांच साल पहले, 2016 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा में राष्ट्राध्यक्षों ने कई क्षेत्रों में एएमआर से जुड़ी समस्याओं के मूल कारणों पर बात करने की प्रतिबद्धता जताई थी।

मतलब साफ है कि कोविड-19 की ही तरह एएमआर के मामले में भी, कोई भी तब तक सुरक्षित नहीं है जब तक कि सभी सुरक्षित न हों।

इसलिए, एएमआर से लड़ने के लिए 'वन हेल्थ पर्सपेक्टिव' से तैयार किया जाना चाहिए, जिसमें इंसान, जानवर और पर्यावरण शामिल हो।

दुर्भाग्य से, वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर एएमआर के प्रसार को थामने के लिए 'वन हेल्थ' नज़रिये का पूरी क्षमता में इस्तेमाल नहीं हुआ है। भारत को एएमआर के प्रभाव के बारे में विशेष रूप से सतर्क रहना होगा क्योंकि यह न केवल सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है बल्कि विश्व स्तर पर एंटीबायोटिक दवाओं के शीर्ष दो उत्पादकों में से एक है।

2020-2030 तक, भारत की CAGR (कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट) में 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान है। इसका मतलब है कि इस दशक में एंटीबायोटिक दवाओं का उत्पादन दोगुने से अधिक होने की संभावना है।

दूरदर्शिता का अर्थ है- हमें यह आकलन करने की ज़रूरत है कि क्या एएमआर के प्रसार को रोकने के लिए पर्यावरणीय कारकों पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है?

पर्यावरणीय एएमआर के प्रसार को रोकने के लिए- अस्पताल के अपशिष्ट, फार्मास्युटिकल प्रदूषण, और पानी, सफाई और स्वच्छता जैसे कारकों पर केंद्रित प्रयास करने की आवश्यकता है।

राज्यों, फार्मेसियों, स्वास्थ्य पेशेवरों, जिम्मेदार नागरिकों और कृषि और पशुपालन कर्ताओं को एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री के कड़े नियमों का पालन करने की ज़रूरत है।


आइए इसे पहले स्वीकार करते हैं, कि केवल सरकार की कार्रवाई से एएमआर का समाधान नहीं किया जा सकता है। इसे सभी मोर्चों यानी अस्पतालों, उद्योग, नागरिक समाज संगठनों, फार्मास्युटिकल कंपनियों और नागरिकों की भागीदारी के साथ-साथ इस मुद्दे को लेकर पूरे समाज के एक सकारात्मक नजरिए की जरूरत है। हमारे हेल्थकेयर इकोसिस्टम को यह सुनिश्चित करना होगा कि कि एंटीबायोटिक दवाओं के अनुचित और ज्यादा प्रयोग न किया जाए और अस्पताल से निकलने वाले अपशिष्ट जल का ट्रीटमेंट किया जाए ताकि एंटीबायोटिक कचरे को फैलने से रोका जा सके।

फार्मास्युटिकल क्षेत्र को एएमआर के दीर्घकालिक प्रभाव का एहसास होना चाहिए. नई एंटीबायोटिक्स की खोज से पहले ही अगर पुरानी एंटीबायोटिक्स काम करना बंद कर देगीं, तो इनका उपयोग नहीं हो पाएगा और उत्पादन को भी नुकसान पहुंचेगा. इस पर अभी नियंत्रण होना संपूर्ण फार्मा क्षेत्र और सामान्य रूप से मानवता के भविष्य के लिए अच्छा संकेत है।

भारत एक फार्मा-सुपर पावर के रूप में गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रक्टिस को अपनाकर दुनिया के सामने एक उदाहरण पेश कर सकता है।

और अंत में, मेरी सभी देशवासियों से एक अपील है- हम सभी ने कभी न कभी बिना डाक्टर की सलाह के दवाईयों का सेवन किया है। हमें अपनी इस आदत को छोड़ना होगा। पिछले एक दशक में ही हमारी एंटीबायोटिक खपत में 103 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में आइए हम एंटीबायोटिक दवाओं का अपनी मर्जी से सेवन न करने का संकल्प लें और बिना डाक्टर की सलाह के दवाईयों को खाने की अपनी आदत को छोड़ दें।

एंटीबायोटिक्स के निर्माता और उपभोक्ता दोनों अगर एएमआर के खिलाफ लड़ने के लिए हाथ मिला लें तो हम इस समस्या से तेजी से निपट सकते हैं।

समाज में जीवन रक्षक परिवर्तन लाना होगा। महामारी से जूझने के बाद, हम एएमआर को लेकर लचीला रुख नहीं अपना सकते। अगर हमने अभी इस पर नजर नहीं रखी तो तो एएमआर की मूक महामारी हम पर भारी पड़ जाएगी।

डॉ के मदन गोपाल नीति आयोग के वरिष्ठ सलाहकार हैं। वह राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना लागू करने वाली टीम के सदस्य हैं। और अब आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना में योगदान दे रहे हैं।

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अनुवाद: संघप्रिया मौर्या

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