विश्व टीकाकरण सप्ताह के अंतर्गत लोगों को किया जा रहा जागरूक 

विश्व टीकाकरण सप्ताह के अंतर्गत लोगों को किया जा रहा जागरूक टीकाकरण नवजात शिशु से लेकर बड़ों के लिए जरूरी होता है।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। टीकाकरण नवजात शिशु से लेकर बड़ों के लिए जरूरी होता है। संक्रामक रोग से बचाने और उसकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए टीका लगाया जाता है। 24 से 30 अप्रैल के सप्ताह को विश्व टीकाकरण सप्ताह के रूप में मनाया जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, विश्वभर में पांच बच्चों में से एक बच्चे को महत्वपूर्ण टीके नहीं लगते हैं। टीकाकरण से डिप्थीरिया, खसरा, काली खांसी, निमोनिया, पोलियो, रोटावायरस दस्त, रूबेला और टिटनेस लगभग 25 तरह की बीमारियों को रोका जा सकता हैं।

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स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के महानिदेशक नीना गुप्ता ने बताया, “हजार की जनसंख्या पर एक आशा और 5000 की जनसंख्या पर एक एएनएम रखी गयी है। इनका काम यही होता है कि ये घर-घर जाकर टीकाकरण के कार्यक्रम को लोगों को समझाएं भी और ज्यादा से ज्यादा लोगों को टीका लगवाएं भी, उस समय इनकी अलग-अलग टीम बना दी जाती हैं।”

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा भारत के सभी बच्चों के लिए वर्ष 2020 तक टीकाकरण कवरेज के उद्देश्य को प्रसारित करने के लिए 25 दिसंबर 2014 को मिशन इंद्रधनुष का शुभारंभ किया गया है। मिशन इंद्रधनुष में 2020 तक 90 फीसद बच्चों को टीकाकरण के दायरे में लाने का लक्ष्य है। इसके अंतर्गत सात बीमारियों गलघोंटू (डिप्थीरिया), काली खांसी (परट्यूसिस), बच्चों को होने वाली टीबी, टिटनेस, पोलियो, हिपेटाइटिस-बी व खसरा के टीके लगाए जाते हैं। कुल 25 बीमारियां ऐसी हैं, जिनके टीके बाजार में मौजूद हैं और समुचित टीकाकरण कर बच्चों की जान बचाई जा सकती है।

टीकाकरण जन्म के साथ से लेकर 65 साल की उम्र से अधिक लोगों को लगवाना पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, विश्वभर में पांच बच्चों में से एक बच्चे को महत्वपूर्ण टीका प्राप्त नहीं होता हैं। टीकाकरण न करवाने पर लोगों को तमाम बीमारियों से जूझना पड़ता है। उन्होंने बताया, “पूरे प्रदेश में 76 प्रतिशत लोगों को टीकाकरण का लाभ मिल रहा है। टीकाकरण चलता ही रहता है और लगातार चलता रहेगा। जहां पर ऐसा प्रतीत होता है कि कम लोग जागरूक हैं वहां पर हम अलग से कार्यक्रम भी चलाते हैं। ये सारा कार्यक्रम विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ की मदद से होता है।”

आशा और एएनएम घर से लेकर लोगों को सेंटर तक टीकाकरण के लिए ले जाते हैं। लोगों में बच्चों से लेकर बड़ों तक के टीके लगवाने की जिम्मेदारी इनकी होती है। हम एक प्रशिक्षण भी देते हैं, जिनमें आशा और एएनएम के साथ गाँव कुछ पढ़ी-लिखी महिलाओं को भी लिया जाता है।
नीना गुप्ता, महानिदेशक, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग

उत्तर प्रदेश में भी जागरूकता कम

उत्तर प्रदेश में अभी 76 प्रतिशत ही टीकाकरण होता है, जिसे बढाने के लिए कार्य किये जा रहे हैं| यहां भी हर साल पांच साल से कम आयु के औसतन 3.8 लाख बच्चों की मौत हो जाती है। 2020 तक 80 फीसद और 2030 तक शत प्रतिशत टीकाकरण का लक्ष्य रखा गया है।

उत्तर प्रदेश में भी जागरूकता कम

उत्तर प्रदेश में अभी 76 प्रतिशत ही टीकाकरण होता है, जिसे बढाने के लिए कार्य किये जा रहे हैं| यहां भी हर साल पांच साल से कम आयु के औसतन 3.8 लाख बच्चों की मौत हो जाती है। 2020 तक 80 फीसद और 2030 तक शत प्रतिशत टीकाकरण का लक्ष्य रखा गया है।

नहीं लगवाते टीका, होती है मौत

हाल में जारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों की मानें तो भारत में सिर्फ 62 फीसद बच्चों का पूरा टीकाकरण होता है। यूनिसेफ की रिपोर्ट कहती है कि हर साल पांच लाख से ज्यादा बच्चे ऐसी बीमारियों से जान गंवा देते हैं, जिनके टीके होते हुए भी वो लगवाते नहीं हैं। इनमें भी निमोनिया व डायरिया सबसे आगे हैं। वर्ष 2016 में ही पांच साल से कम उम्र के तीन लाख से अधिक बच्चों की मौत निमोनिया व डायरिया के कारण हुई थी।

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