खुशहाल दिवाली पर पटाखों से रहें सावधान 

खुशहाल दिवाली पर पटाखों से रहें सावधान खुशहाल दिवाली पर पटाखों से रहें सावधान। फोटो: प्रतीकात्मक

स्वयं डेस्क

लखनऊ। प्रकाश और प्रसन्नता का त्योहार दीपावली नई उमंग लेकर दीवाली से कई आर्थिक और मनोरंजन परम्पराएं जुड़ी हैं। आतिशबाजी का बेतहाशा खेल इनमें सबसे प्रमुख है। आज हालत यह है कि दीवाली दीयों का कम बम और राकेट-पटाखों का त्योहार ज्यादा लगता है।

आतिशबाजी से निकलने वाले धुंए में कैडमियम, बेरियम, रूबीडियम,स्ट्रांसियम और डाइआक्साइन जैसे जहरीले तत्व शामिल होते है। इनके धुएं में कार्बन डाईआक्साइड के अलावा कार्बन मोनोआक्साइड, सल्फर डाइ आक्साइड जैसी विषैली गैसें भी शामिल रहती हैं। आतिशबाजी से उपजे प्रदूषण का धूल-गुबार भारत के जल, थल और वायुमण्डल पर कहर बन कर टूटता है।

आतिशबाजी के दौरान आस-पास के लोगों की आंखों में जलन, चुभन, दम घुटने जैसी स्थिति सामान्य तौर पर देखी जा सकती है। इसका धुएं में पाये जाना वाला तत्व पोटैशियम परकोलेट, आपकी थायराइड ग्रन्थि को प्रभावित कर सकता है। दरअसल यह रसायन, थायराइड ग्रन्थि द्वारा आयोडीन ग्रहण करने की क्षमता में कमी लाता है जोकि अन्ततः हाइपोथाइराडिज्म के रूप में परिलक्षित होती है। एक अन्य हानिकारक पदार्थ स्ट्रोन्सियम जन्म-जात विकृति, रक्ताल्पता और अस्थिमज्जा में नुकसान का सबब बन सकता है। आतिशबाजी से उत्पन्न डाइआक्सिन एक जाना पहचाना कैन्सर कारक पदार्थ है। यह हार्मोन असंतुलन पैदा करने के साथ-साथ ग्लूकोज की मेटाबोलिज्म में गड़बड़ी व त्वचा पर घाव जैसे दुष्प्रभाव भी डालता है।

कुछ अन्य सावधानियां और बचाव

  • आतिशबाजी खुले स्थान पर सावधानी से चलाएं।
  • धातु या शीशे पर रखकर पटाखे न जलाएं।
  • ज्वलनशील चीजों के पास पटाखे न जलाएं।
  • आतिशबाजी पर कड़ा सरकारी नियंत्रण हो खासतौर पर उन पटाखों पर जिनसे किसी भी किस्म के उल्लेखनीय प्रदूषण फैलने की संभावना हो। अपने पास पानी की बड़ी टंकी व बर्फ रखें जिससे जरूरत पड़ने पर प्राथमिक उपचार किया जा सके।

त्वचा सम्बंधित कुछ विशेष उपाय

  • ढीले-ढाले और सिन्थेटिक कपड़ों के स्थान पर चुस्त और मोटे-सूती कपड़े पहने।
  • बच्चों को पटाखों से दूर रखें और हमेशा उन पर नजर रखें।
  • पटाखे जेब में न रखे क्योकि ये बिना जलाये भी फट सकते हैं।
  • जली हुई जगह पर से तुरंत कपड़ा हटायें।
  • जली हुई जगह पर ठंडा पानी डालें।
  • जले स्थान पर मक्खन, चिकनाई, टेल्कम पाउडर या अन्य कोई चीज न लगाएं।

हृदय रोगियों के लिए कुछ सावधानियां

  • हाई ब्लड प्रेशर और स्ट्रोक से ग्रस्त लोगो को पटाखों की जबर्दस्त ध्वनि सुनने से दिल पर जोर पड़ता है। इससे हार्ट रेट बढ़ सकती है। इसलिए हदय रोगियों को दूर से ही धमाकेदार आतिशबाजी को देखना चाहिए।
  • अगर चक्कर आने की समस्या या उलझन या घबराहट महसूस हो तो इस स्थिति मे शीघ्र ही लेट जाए और फिर डॅाक्टर से परामर्श लेकर दवाएं ले या फिर डॉक्टर ने पहले से ही जो दवाएं इन लक्षणों के लिए बना रखी है, उन्हें लें।

आंखों का बचाव

  • पटाखा आंख में लगने पर आंख को रगड़ना या मलना नहीं चाहिए, साथ ही आंख में धसी चीज को निकालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। आंख जल जाने पर अपने हाथों को साबुन से अच्छी तरह धोएं फिर जली आंख को पानी से दस मिनट तक धोएं और जल्द ही डाक्टर को दिखाएं।
  • आतिशबाजी की रोशनी की तरफ सीधे न देंखे, हो सके तो प्रोटेक्टिव ग्लासेज पहनकर पटाखे चलाएं।

आतिशबाजी से प्रदूषण जल, थल और वायुमण्डल पर कहर बन कर टूटता है।

आतिशबाजी की चोट श्वसन तंत्र पर

  • भारत में तीन करोड़ लोग अस्थमा पीड़ित है इसके अलावा तीन करोड़ लोगों को सी़ओपीडी या एम्फाइसीमा की बीमारी है। आतिशबाजी से निकले सूक्ष्म पदार्थ आसानी से फेफड़ों में घुस कर एलर्जिक रिएक्सन चालू कर देते हैं। इससे निकली अति प्रतिक्रियाशील ओजोन गैस फेफड़ों की सतह को घायल कर तत्काल भारी नुकसान पहुंचाती है। इससे निकले प्रदूषक, सांस के रोगियों के श्वसन मार्ग की सूजन बढ़ा देते है जिससे उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। उन्हें दमा का दौरा पड़ सकता है।
  • सांस के रोगी जहां तक हो घर के अन्दर रहें, पानी और पेय पदार्थो का भरपूर सेवन करें, तथा भाप लें। जहां वायु में प्रदूषकों का घनत्व ज्यादा हो वहां मास्क का प्रयोग करें।
  • दमा के रोगी अपनी दवाएं नियमित रूप से लें और जरूरत पड़ने पर तुरन्त अपने चिकित्सक से सलाह लें। इसके अतिरिक्त दीपावली के दौरान सफाई, धुलाई व पेंट के समय सांस के रोगी बच कर रहें क्योंकि इस धूल, गर्दा, व पेंट की खुशबू से सांस का दौरा पड़ सकता है।

साभार: डॉ. सूर्यकान्त त्रिपाठी, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, पल्मोनरी मेडिसिन विभाग,

केजीएमयू, लखनऊ

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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