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बच्चों की मानसिक सेहत एक अनदेखा संकट

Gaon Connection | Jan 06, 2026, 13:57 IST
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क्या आज का बच्चा सचमुच बचपन जी रहा है, या वह समय से पहले बड़ा होने को मजबूर कर दिया गया है? जब कंधों पर स्कूल बैग से ज़्यादा अपेक्षाओं का बोझ हो, और मुस्कान के पीछे डर व असुरक्षा छिपी हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। अंकों, तुलना और स्क्रीन की दुनिया में घिरा बच्चा चुपचाप टूट रहा है और हम उसे “सामान्य” समझकर आगे बढ़ जाते हैं। यही चुप्पी आज बच्चों की मानसिक सेहत को सबसे गहरा ज़ख़्म दे रही है।
घरेलू वातावरण भी बच्चों की मानसिक सेहत पर गहरा असर डालता है।
भारत में बचपन अब केवल उम्र का एक पड़ाव नहीं रहा, बल्कि निरंतर दबाव का अनुभव बनता जा रहा है। जिस उम्र में बच्चे खेलते हैं, सवाल पूछते हैं और दुनिया को समझने की कोशिश करते हैं, उसी उम्र में वे प्रदर्शन, प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं की कसौटी पर तौले जा रहे हैं। शिक्षा, जो कभी विकास का माध्यम थी, अब कई बच्चों के लिए चिंता और डर का स्रोत बन गई है। इस पूरे बदलाव में सबसे ज़्यादा उपेक्षित मुद्दा है- बच्चों की मानसिक सेहत।

2025 में स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, भारत के 13 से 17 वर्ष के लगभग 7.3 प्रतिशत किशोर किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य विकार से प्रभावित पाए गए हैं। यह आंकड़ा काग़ज़ पर भले छोटा लगे, लेकिन इसका अर्थ है कि हर स्कूल, हर कक्षा और हर मोहल्ले में ऐसे बच्चे मौजूद हैं जो भीतर ही भीतर संघर्ष कर रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है, क्योंकि मानसिक समस्याओं को आज भी खुलकर स्वीकार नहीं किया जाता।

2025 में ही तेलंगाना और कर्नाटक के स्कूलों में किए गए एक बड़े सर्वे में सामने आया कि लगभग 24 प्रतिशत बच्चों में गंभीर मानसिक तनाव के लक्षण थे। इनमें से 6 से 10 प्रतिशत बच्चों को तत्काल परामर्श और उपचार की आवश्यकता बताई गई। यह स्थिति किसी एक राज्य या वर्ग तक सीमित नहीं है; यह पूरे देश में फैलता हुआ संकट है। फर्क बस इतना है कि कहीं यह शोर बनकर सामने आता है और कहीं खामोशी में दबा रह जाता है। इस संकट का सबसे बड़ा कारण है शैक्षणिक दबाव। आज बच्चों की योग्यता का मूल्यांकन उनके अंकों, रैंक और तुलना से किया जाता है। “अच्छा बच्चा” वही माना जाता है जो बेहतर परिणाम दे सके। असफलता का डर, माता-पिता की अपेक्षाएँ और सामाजिक तुलना बच्चों के मन में स्थायी तनाव पैदा कर रही हैं। परीक्षा अब ज्ञान की जाँच नहीं, बल्कि मानसिक सहनशक्ति की परीक्षा बनती जा रही है। कई बच्चे इसी डर में अपनी नींद, रुचियाँ और आत्मविश्वास खो बैठते हैं।

ये भी पढ़ें: मानसिक सेहत पर बात करना क्यों है ज़रूरीइस शैक्षणिक दबाव के साथ-साथ डिजिटल दुनिया ने बच्चों की मानसिक दुनिया को और जटिल बना दिया है। 2025 में प्रकाशित एक राष्ट्रीय सर्वे के अनुसार, भारत में 60 प्रतिशत से अधिक बच्चे रोज़ तीन घंटे से अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं। सोशल मीडिया बच्चों के सामने एक ऐसी दुनिया रखता है, जहाँ सब कुछ सुंदर, सफल और परिपूर्ण दिखता है। इस निरंतर तुलना में बच्चा स्वयं को अधूरा और असफल महसूस करने लगता है। धीरे-धीरे यह भावना आत्म-सम्मान को कमजोर करती है और चिंता व अवसाद को जन्म देती है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन-टाइम का सीधा संबंध एकाग्रता में कमी, चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या और सामाजिक अलगाव से है। लेकिन विडंबना यह है कि इन संकेतों को अक्सर “मोबाइल की लत” या “अनुशासन की कमी” कहकर टाल दिया जाता है, जबकि असल समस्या कहीं गहरी होती है।

अब समय आ गया है कि हम बच्चों की मानसिक सेहत को दया या शर्म के चश्मे से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और समझ के साथ देखें।
अब समय आ गया है कि हम बच्चों की मानसिक सेहत को दया या शर्म के चश्मे से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और समझ के साथ देखें।


घरेलू वातावरण भी बच्चों की मानसिक सेहत पर गहरा असर डालता है। पारिवारिक तनाव, आर्थिक दबाव, माता-पिता के बीच तनाव या अत्यधिक नियंत्रण- ये सभी बच्चे के मन में असुरक्षा पैदा करते हैं। 2025 में उत्तराखंड में हुए भारत के पहले समुदाय-आधारित सर्वे में सामने आया कि 3500 से अधिक बच्चे और किशोर मानसिक विकारों, व्यवहारिक समस्याओं और विकास संबंधी चुनौतियों के साथ जीवन जी रहे हैं। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि मानसिक स्वास्थ्य संकट केवल महानगरों की समस्या नहीं, बल्कि गाँवों और कस्बों तक फैला हुआ है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि भारत में 80 से 90 प्रतिशत मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे बच्चों को कोई पेशेवर सहायता नहीं मिल पाती। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, प्रशिक्षित काउंसलरों का अभाव और सामाजिक कलंक इस समस्या को और गंभीर बना देते हैं। कई परिवार आज भी मानसिक परेशानी को कमजोरी या बदतमीज़ी मान लेते हैं। परिणामस्वरूप बच्चा अकेला पड़ जाता है।

यह अकेलापन ही सबसे खतरनाक है। जब बच्चा अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाता, जब उसकी चिंता को गंभीरता से नहीं लिया जाता, तब वह भीतर-ही-भीतर टूटने लगता है। कई बार यह टूटन पढ़ाई छोड़ने, आत्म-अलगाव या आत्म-नुकसान जैसे गंभीर रूप भी ले लेती है। ये घटनाएँ हमें झकझोरती हैं, लेकिन हम अक्सर उन्हें अपवाद मानकर आगे बढ़ जाते हैं। हकीकत यह है कि बच्चों की मानसिक सेहत को नज़रअंदाज़ करना उनके भविष्य को जोखिम में डालना है। बचपन में अनदेखी गई समस्याएँ आगे चलकर कम आत्मविश्वास, संबंधों में कठिनाई, कार्यक्षमता में कमी और गंभीर मानसिक रोगों का कारण बन सकती हैं। एक समाज के रूप में यह हमारी सामूहिक विफलता होगी।

अब समय आ गया है कि हम बच्चों की मानसिक सेहत को दया या शर्म के चश्मे से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और समझ के साथ देखें। स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य परामर्श को अनिवार्य करना, शिक्षकों को भावनात्मक संकेत पहचानने के लिए प्रशिक्षित करना और अभिभावकों को बच्चों से संवाद के लिए तैयार करना- ये कदम अब टाले नहीं जा सकते। बचपन को बोझ से मुक्त करना केवल सरकारी नीतियों का सवाल नहीं है; यह हमारे समाज की सोच की परीक्षा है। यदि हम सचमुच एक सशक्त और मानवीय भारत का सपना देखते हैं, तो हमें अपने बच्चों को केवल सफल नहीं, बल्कि मानसिक रूप से सुरक्षित और भावनात्मक रूप से मजबूत बनाना होगा।

(डॉ सुनिधि मिश्रा, स्वतंत्र लेखिका हैं)

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