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Health Tips:- कितनी बार झपकाएं पलकें, मोबाइल कैसे खराब कर रहा आंखें?

Gaon Connection | Jan 19, 2026, 16:30 IST
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मोबाइल और डिजिटल स्क्रीन के बढ़ते इस्तेमाल से आंखों की बीमारियां तेज़ी से बढ़ रही हैं। स्क्रीन टाइम बढ़ने से ड्राई आई, सिर दर्द और आंखों की थकान आम समस्या है। डायबिटीज से कैसे खराब होती हैं आंखें?
तेज़ी से बढ़ रही आंखों की बीमारियां
आज के समय में मोबाइल, कंप्यूटर और दूसरे डिजिटल स्क्रीन हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। इनके ज़्यादा इस्तेमाल से आंखों की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। गांव कनेक्शन से विशेष बातचीत में लखनऊ के वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ डॉ. विनीत शाह ने बताया कि आज सभी लोगों में सबसे आम समस्या ड्राई आई यानी आंखों का सूखना बन गई है। जब हम लगातार स्क्रीन देखते रहते हैं, तो सामान्य तरह से पलकें नहीं झपकाते। आमतौर पर इंसान एक मिनट में 14–16 बार पलकें झपकाता है, लेकिन मोबाइल या कंप्यूटर देखते समय यह संख्या घटकर 8–10 रह जाती है। इससे आंखों में नमी कम हो जाती है और जलन, खुजली व थकान होने लगती है।

एसी और ग़लत बैठने का तरीक़ा भी नुक़सानदेह

एसी वाले कमरों में लंबे समय तक बैठने से आंखों की ड्राइनेस बढ़ जाती है, क्योंकि एसी कमरे की नमी कम कर देता है। इसके अलावा मोबाइल को झुककर देखने से गर्दन और आंखों पर ज़ोर पड़ता है, जिससे सिरदर्द और आंखों में दर्द की शिकायत आम हो गई है। यह समस्या बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक सभी में देखी जा रही है।

ख़ुद से आई ड्रॉप डालना हो सकता है ख़तरनाक

डॉ. विनीत शाह के मुताबिक, आंखों में अपने मन से दवा डालना सबसे बड़ी ग़लती है। अक्सर लोग आंखों में लाली या खुजली होने पर सीधे केमिस्ट से आई ड्रॉप ले लेते हैं। इनमें कई बार स्टेरॉयड मिले होते हैं। शुरुआत में इनसे आराम तो मिल जाता है, लेकिन लंबे समय तक इस्तेमाल करने से ग्लूकोमा और मोतियाबिंद जैसी गंभीर बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है।

ग्लूकोमा को ‘साइलेंट चोर’ कहा जाता है, क्योंकि इसमें दर्द नहीं होता और धीरे-धीरे आंखों की रोशनी कम होती चली जाती है। जब तक मरीज़ को इसका एहसास होता है, तब तक काफ़ी नुक़सान हो चुका होता है।

डायबिटीज़ का आंखों पर सीधा असर

डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए आंखों की नियमित जांच बेहद ज़रूरी है। डॉ. शाह बताते हैं कि डायबिटीज़ से आंखों के अंदर मौजूद ख़ून की नलियां कमज़ोर हो जाती हैं। इससे आंखों के पर्दे में सूजन और ख़ून का रिसाव शुरू हो जाता है, जिससे नज़र कम होने लगती है।

अगर समय पर इलाज न हो, तो आंखों के अंदर नई नलियां बन जाती हैं, जो फट सकती हैं और आंख के अंदर ख़ून भर सकता है। इससे अंधेपन का ख़तरा बढ़ जाता है। इसलिए डायबिटीज़ के मरीज़ों को साल में कम से कम एक बार आंखों की पूरी जांच ज़रूर करानी चाहिए।

बच्चों में ‘आलसी आंख’ की पहचान ज़रूरी

डॉ. शाह ने बच्चों में होने वाली बीमारी एंब्लायोपिया, जिसे आम भाषा में आलसी आंख कहा जाता है, के बारे में भी जानकारी दी। उनका कहना है कि चार–पांच साल की उम्र में बच्चों की आंखों की एक बार जांच ज़रूर होनी चाहिए।

आंखों का विकास 7–8 साल की उम्र तक होता है। अगर इस दौरान किसी एक आंख में ज़्यादा नंबर हो और समय पर सही चश्मा न लगाया जाए, तो वह आंख कमज़ोर हो जाती है। बच्चे को इसका पता भी नहीं चलता, क्योंकि दूसरी आंख से वह सामान्य काम करता रहता है।

ग्लूकोमा: बिना दर्द की ख़तरनाक बीमारी

ग्लूकोमा एक ऐसी बीमारी है, जिसमें आंखों का प्रेशर बढ़ जाता है और देखने का दायरा धीरे-धीरे कम होने लगता है। शुरुआत में इसके कोई लक्षण नज़र नहीं आते। जब मरीज़ को सामने का धुंधला दिखने लगता है, तब तक बीमारी काफ़ी बढ़ चुकी होती है।

डॉ. शाह ने ख़ास तौर पर स्टेरॉयड दवाएं लेने वालों को नियमित आंखों की जांच कराने की सलाह दी है। लंबे समय तक स्टेरॉयड लेने से ग्लूकोमा और मोतियाबिंद जल्दी हो सकता है।

कॉन्टैक्ट लेंस और ऑनलाइन चश्मे से सावधानी

कॉन्टैक्ट लेंस इस्तेमाल करने वालों को सफ़ाई का पूरा ध्यान रखना चाहिए। लेंस समय पर बदलना, रात में लेंस लगाकर न सोना और रोज़ सॉल्यूशन बदलना ज़रूरी है। थोड़ी-सी लापरवाही से आंखों में गंभीर इंफ़ेक्शन हो सकता है।

ऑनलाइन चश्मा ख़रीदने को लेकर भी डॉ. शाह ने सतर्क रहने की सलाह दी। बिना पूरी आंखों की जांच के लिया गया चश्मा नुक़सानदेह साबित हो सकता है।

आंखों को स्वस्थ रखने के आसान उपाय

डॉ. विनीत शाह का कहना है कि आंखों की ज़्यादातर बीमारियों से बचाव संभव है। इसके लिए साल में एक बार आंखों की जांच कराना, स्क्रीन देखते समय बार-बार पलकें झपकाना, सही तरीक़े से बैठकर मोबाइल या कंप्यूटर देखना और बिना डॉक्टर की सलाह कोई भी दवा आंखों में न डालना बेहद ज़रूरी है। डिजिटल युग में आंखों की देखभाल हमारी ज़िम्मेदारी है। थोड़ी-सी सावधानी हमें बड़ी परेशानी से बचा सकती है।

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