दिन-रात मेहनत करने वाले किसान, मजदूर इन बातों का रखें ख्याल तो बीमारियों से रहेंगे दूर

दिन-रात मेहनत करने वाले किसान, मजदूर इन बातों का रखें ख्याल   तो बीमारियों से रहेंगे दूर

पूरी दुनिया में खेती-किसानी को सबसे मेहनती काम माना जाता है। किसान दिन-रात काम करके हमारे लिए अन्न पैदा करता है बावजूद इसके वो दूसरों पर निर्भर रहता है। लगातार मेहनत के बीच किसान अपना ख्याल रखना भूल जाता है जिस कारण उन्हें कई सारी बीमारियां अपने चपेट में ले लेती हैं।

जैसा कि महाकवि कालीदास ने कहा, 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' अर्थात् शरीर की रक्षा करना मनुष्य का पहला धर्म है, जैसे विचार के पक्षधर जोधपुर निवासी ऑस्टियोपैथी (अस्थिचिकित्सा) चिकित्सक डॉ. गोवर्धनलाल पाराशर पिछले 35 सालों से देशभर के किसानों के हित और उनके स्वास्थ्य लाभ की दिशा में काम कर रहे हैं। बीते दिनों उनसे अन्नदाता किसानों की सेहत को लेकर एक चर्चा हुई, प्रस्तुत है किसानों के हितार्थ बहुमूल्य जानकारी-

वे बताते हैं, "भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के पूर्व निदेशक रहे डॉ. मंगला राय के आमंत्रण पर भी मैंने किसान सम्मेलन में भी यही बात साफ तौर पर कही थी कि प्राकृतिक माहौल में रहने के बावजूद भी किसानों को बीमारियों से छुटकारा क्यूं नहीं मिल रहा ? इसकी एक वजह यह भी है कि किसान भाई खेती में एक ही प्रकार का काम लगातार करते रहते हैं, एक ही शारीरिक स्थिति में लगातार रहते हैं। सभी कामों में रीढ़ की हड्डी को झुकाना, मोड़ना पड़ता है। दिनभर के थके हारे किसान शाम-रात को गांव-खलिहान में परंपरागत खाट (खटिया) में सो जाते हैं।


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आम तौर पर सारी खाटें झोलीनुमा या ढीली होती हैं, जिसमें रीढ़ की हड्डी सीधी ना रहकर मुड़ी रहती है। लगातार कई दिनों-महीनों तक यही स्थिति रहने से रीढ़ की हड्डी में स्थाई झुकाव बन जाता है, जिसके चलते भोजन तंत्र (पाचन तंत्र) को भी दबाव में रहना पड़ता है। किसान भाई काम की हड़बड़ी में भोजन शीघ्रता से करते हैं और समय पर शौच (हाजत) को भी रोके रहते हैं। दोनों ही परिस्थितियों में झुकी रीढ़ वाले किसान पेट के विभिन्न रोगों का शिकार हो जाते हैं।

एक अकेली 'कब्ज' सौ रोगों का घर है। भोजन में सड़ांध से गैस (एसिडिटी) होती है। भोजन सड़ने से बना एसिड भी रक्त संचरण के जरिए हाथ-पांव के जोड़ों में जाकर स्वस्थ मांसपेशियों कोमल ऊतकों (टिश्यू), उपास्थियों (कार्टिलेज) में जमा हो जाता है। इससे उनका स्वाभाविक लचीलापन घट जाता है। किसान भाई इसे थकावट मानकर काम चलाते रहते हैं। कुछ लोग दवाइयां भी लेते हैं, लेकिन गठिया रोग की जड़ को नहीं समझ पाते। इस नासमझी के कारण कई सारे साइड इफेक्ट भी हो जाते हैं।


रीढ़ की हड्डी झुकी होने से छाती झुक जाती है। हृदय को ज्यादा ताकत लगाकर रक्त संचरण करना पड़ता है, फेंफड़ों को जल्दी जल्दी सांस लेनी पड़ती है। किसान भाई इसे मेहनत के कारण सांस फूलना समझकर काम में लगे रहते हैं। इस प्रकार स्वाभाविक श्वसन तंत्र भी कमजोर हो जाता है। देखा जाए तो रीढ़ की हड्डी एवं अन्य मांसपेशियों की कमजोरी से दूसरे सभी तंत्र मसलन पाचन, श्वसन, रक्त संचरण, मलमूत्र विसर्जन, गुर्दा, तिल्ली, अंतःस्त्रावी ग्रन्थियों पर भी कुप्रभाव पड़ता है, जिसके चलते अब किसानों की औसत आयु घटने लगी है।

इसी तरह गलत तरीके से खेती का काम करने, क्षमता से अधिक वजन उठाने पर या दुर्धटनावश पांव में 'मोच' आ जाती है। बोली भेद में इसे 'मुरड़' भी कहते हैं। कमर में झटके के कारण 'स्लिप डिस्क' भी हो जाती है। कभी-कभी पसलियों के पास ऊपरी रीढ़ में भी कशेरूकों का स्थान थोड़ा बहुत बदल जाता है। आम लोग मारवाड़ी बोली में चणक, माची, मचक, आवणी कहते हैं, तो पंजाबी इसे 'चुक' कहते हैं।

इन सभी बीमारियों से बचाव ही उपचार है। सावधानी रखी जाए तो ऐसी नौबत ही नहीं आएगी। खेती में विकास के साथ परंपरागत पहनावे में भी बदलाव आया है। पहले किसान भाई तेल पिलाई हुई भारी जूतियां पहनते थे, जिनके उपयुक्त वजन के कारण घुटनों के जोड़ में आवश्यक गैप रहता था, लेकिन अब हल्के जूतों के कारण हड्डियों के जोड़ में गैप कम रहता है। भारी मेहनत के बाद भूलवश बायीं करवट (लेफ्ट) सो जाते हैं तो हृदय पर जोर पड़ता है तो गहरी नींद में भी बांयटे (ऐंठन) आ जाती है।

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पुराने जमाने में दादी मां के नुस्खे कारगर होते थे, लेकिन आजकल आम आदमी की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो गयी है। संकर बीजों से उत्पादन भले बढ़ा है, लेकिन पुराने बाजरे जैसी ओज अब इस दौर में नहीं रही। आज तो चोट/मोच, मुरड़, चणक, माची पड़ने पर रजका बांधने, बाजरा पुलहिस, अधपकी रोटी बांधने या कायफल का हलवा बांधने जैसे तरीके भी असफल हो चुके हैं, उलटे कुछ लोगों के शरीर में पस/मवाद पड़ जाता है। इसलिए काम करने की मजबूरी के बावजूद शरीर को बीच बीच में आराम देना, सही तरीके से उठना, बैठना, झुकना व सोना जरूरी है।

एक बात यह भी देखी गयी है कि किसान और खेतीहर मजदूर चाय, बीड़ी, तम्बाकू, चिलम, अफीम लेकर दर्द को भूलने का भ्रम आज भी पाले हुए हैं। कुछ लोग बिना डॉक्टरी सलाह के हरे पत्ते की गोली लेते हैं, जो इतनी घातक है कि उससे तीन माह में ही गुर्दों की पथरी हो सकती है।

एक बात यह भी उल्लेखनीय है कि धूप में अधिक रहने से किसानों के शरीर में 'विटामिन डी-3' की अतिरिक्त मात्रा जमा हो जाती है, जो कि उनकी स्वाभाविक विचार क्षमता पर दुष्प्रभाव डालती है। लगातार झुककर काम करने वाले किसानों का रीढ़ तंत्र जब कमजोर हो जाता है तो, यह दुष्प्रभाव खुलकर सामने आने लगते हैं। वैसे तो इन तमाम बीमारियों के लिए आयुर्वेद, ऐलोपैथी, यूनानी एवं सर्जरी के इलाज बताये जाते हैं, लेकिन हमारे पूर्वजों की सनातन परंपरा में ऑस्टेयोपैथी एक ऐसी विद्या है जिसमें कोई दवा नहीं, कोई टेस्ट का खर्च नहीं, सिर्फ सावधानी रखने की सलाह और जरूरत मुताबिक उपचार है।

डॉ. गोवर्धनलाल पाराशर

आज की तारीख में यह तकनीक इतनी सस्ती और सुलभ है कि बीमारी की मूल वजह को पहचान कर सटीक इलाज प्रदान करती है। अव्वल बात तो यह है कि किसान ही नहीं, हर गृहिणी, विद्यार्थी, कर्मचारी को अपने कार्यस्थल पर लगातार एक-सी स्थिति में नहीं रहना चाहिए। बीच-बीच में रीढ़ की हड्डी समेत पूरे शरीर में बदलाव लाना चाहिए। दिन भर कड़ी मेहनत के कारण रीढ़ की हड्डी में झुकाव को पुनः सही करने के लिए सदैव कड़ी शय्या, लकड़ी के पाट, प्लाईवुड के पलंग, चबूतरी, छत पर साधारण बिस्तर बिछाकर सोना चाहिए। जो लोग परंपरागत झोलीनुमा ढीली ढाली चारपाई, खटोला, माचली में सो जाते हैं, उनको रीढ़ की हड्डी का नुकसान उठाना पड़ता है, वहीं पर स्पंज, फोम, रूई के मोटे गद्दों पर सोने वाले भी क्षणिक आराम के नाम पर जिदंगी भर बीसियों रोगों को दावत देते रहते हैं।

सबसे जरूरी सलाह

किसान भाई इन छोटी-मोटी सावधानियों को बरतते हुए खुद ही ऑस्टियोपैथी को समझ कर अपना बचाव एवं उपचार कर सकते हैं,

उदाहरण के तौर पर...

◆ हार्ट-पैन (हृदय दर्द) होने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाना पड़ता है। हजारों रुपयों के टेस्ट के बाद छोटी-मोटी तकलीफ का पता चलता है। किसान भाई अपने स्तर पर ही इसका निदान कर सकते हैं। हार्ट-पैन के अक्सर तीन कारण होते हैं - पहला मस्क्यूलर पैन, दूसरा गेस्ट्रिक पैन और तीसरा वास्तविक हार्ट प्रॉब्लम।

◆ किसान भाई सख्त पाट या चबूतरी पर लेटकर गर्दन को बाहर की तरफ खुली लटकाकर दायें-बायें, ऊपर-नीचे हलका-हल्का घुमायें। यदि राहत मिल जाती है तो यह सिर्फ मस्क्यूलर पैन ही था, जो दवा लेने पर ठीक हो जाएगा।

◆ इसी प्रकार लेटकर खुली हवा में गर्दन लटकाकर हाथ पीछे सिर की तरफ लाकर ऊपर नीचे लाते रहें। इससे पेट पर खिंचाव बढ़ेगा। इससे किसी भी प्रकार की भोजन संबंधी गेस्ट्रिक प्रॉब्लम से राहत मिलेगी और हार्ट को आराम मिलेगा। इसका मतलब यह हार्टपैन नहीं गैस्ट्रिक इफैक्ट था, चिंता की जरूरत नहीं।

◆ लेकिन दोनों तरीके से थोड़ी सी राहत भी नहीं मिले तो फिर हार्ट, धमनी, शिरा में थक्का आदि कोई तकलीफ है, जिसके लिए हार्ट स्पेशलिस्ट की सेवाएं लेनी ही पड़ेंगी।

7000 कैम्प आयोजित कर चुके हैं डॉ पाराशर

2009 में आई 'ऑस्टियोपैथी चिकित्सा' (एक अनूठी एवं वैकल्पिक पद्धति) जैसी लेाकप्रिय पुस्तक के लेखक डॉ. गोवर्धनलाल पाराशर पूरी दुनिया में एक जाना-माना नाम बन चुके हैं, पूरे देश में लगभग 7000 कैम्प आयोजित कर लोगों को स्वास्थ्य लाभ प्रदान करना उनकी जीवन शैली का एक अभिन्न अंग बन चुका है। वह पूरी दुनिया मैं जाकर कैम्प आयोजित करने से मात्र 6 देश पीछे चल रहे हैं, अर्थात् विश्व विजेता होने से मात्र 6 देशों की दूरी पर हैं।

उनसे स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने वालों में आम किसान से लेकर अमिताभ बच्चन, सलमान खान, सचिन तेंदुलकर, प्रियंका चौपड़ा, मिथुन चक्रवर्ती, सुपर स्टार रजनीकांत, अटल बिहारी वाजपेयी, नरेंद्र मोदी, बराक ओबामा जैसे नाम तो मात्र एक बानगी भर हैं। देश-दुनिया के कई प्रतिष्ठित मान-सम्मान भी मिल चुका है।

‛ऑस्टियोपैथी' क्या है?

ऑस्टियोपैथी रोगी को बिना दवा खिलाए चिकित्सा करने की एक विधि है। जो लोग जीवनभर पीड़ा से ग्रस्त रहने के बाद अल्प समय में इस विधि से रोगमुक्त हुए हैं। ऑस्टियोपैथी मनुष्य के अस्थि-पंजर के जोड़-तोड़ मिलाकर रोग मुक्त करने की एक विधि है। इसके चिकित्सक परीक्षण से अस्थियों के स्थान का वास्तविक ज्ञान अंगुलियों से टटोलकर, रीढ़ व नाड़ी दाब की स्थितियों का पता लगा कर चिकित्सा करते हैं।

आप यह बात अच्छे से समझ लीजिए कि यह चिकित्सक मामूली हड्डी बिठाने वाले पहलवान नहीं होते, ऑस्टियोपैथी चिकित्सा भारत में बिल्कुल नया कॉन्सेप्ट है। इसकी तालीम लेने के लिए जर्मनी, इंग्लैण्ड और अमेरिका तक जाना पड़ता है।

इसमें रोगमुक्त किस तरह किया जाता है? ऑस्टियोपैथी में रोग निवारण का एक अनूठा तरीका है, मसलन सीने में दर्द के कारण को हृदय रोग माना जाता है, जिसे 'एन्जाइना पेक्येरिस' कहा जाता है। मगर जांच पर यह रोग न तो इसीजी में आता है न अन्य जांचों में। दरअसल वह दर्द, गर्दन की कोशिकाओं से संबंधित होता है जिसे केवल गर्दन का इलाज कर ठीक किया जा सकता है।


आमाशय की वजह से कन्धों में दर्द महसूस किया जाता है। कमर के निचले हिस्से का असंतुलित दबाव पैरों में महसूस किया जाता है। पेशाब से संबंधित परेशानी से पैरों में सूजन व दर्द पैदा हो सकता है। किडनी का रोग पैरों में महसूस किया जा सकता है। खड़े होने के तरीकों में गलतियां करते रहने से थकान अधिक व जल्दी होना शुरू हो जाती है, जिससे शरीर के अधिकतर भीतरी अंग एक-दूसरे के नजदीक आ जाते हैं या दूर चले जाते हैं।

कई बार मानसिक गिरावट, ताकत की कमी, अपचन, पुराना कब्ज व यकृत की खराबी केवल गलत खड़े होने के तरीकों से उपजी होती है। दर्दनाशक दवाओं को खाते-खाते ऊबकर अब अधिक से अधिक लोग ऑस्टियोपैथी की शरण में आने लगे हैं।

इस दायरे में कौन-कौन से रोग आते हैं?

स्लिप डिस्क से लेकर सर्वाइकल स्पोन्डीलाइसिस, टिश्यू से लेकर हिप्स इन्फेक्शन तक की हजारों-हजार ऐसी बीमारियां हैं जिनका उपचार इस विधि द्वारा सहज और सरल सुलभ है। थाइराइड, हार्मोनल इम्बैलेन्स, कैल्शियम डेफीशियन्सी, फ्रोजन सोल्डर, मसल्स प्रॉब्लम, ऑस्टियोपोरोसिस, आर्थराइटिस, सेरेब्रल पाल्सी, माइग्रेन, लेगामेन्ट टीयर्स, प्रोस्टेट, साइटिका, डायबिटीज, हाईट प्रोब्लम, मोटापा और पौरूष विकारों तक के ईलाज बिना दवा के केवल मैनीप्यूलेशन क्रिया से किए जा सकते हैं।

( लेखक कृषि पत्रकार और पर्यावरण प्रेमी हैं और डॉ पाराशर के आधिकारिक जीवनीकार हैं, उनकी बायोग्राफी लिख चुके हैं। ऑस्टियोपैथी पर प्रकाशित हिंदी- अंग्रेजी पुस्तकों का संपादन कर चुके हैं।)


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