सर्जरी के लिए तैयार नहीं होते कुष्ठ रोगी

Darakhshan Quadir Siddiqui | Jan 31, 2017, 13:39 IST
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World Health Organization
सर्जरी के लिए तैयार नहीं होते कुष्ठ रोगी
लखनऊ। कुष्ठ रोगियों की सर्जरी कर उन्हें ठीक किया जा सकता है, लेकिन कुष्ठ रोगी सर्जरी कराने से परहेज करते हैं। ऐसे रोगियों का मानना है कि सर्जरी से उनके हाथ पैरों की बची हुई ताकत भी चली जाती है। यह कहना है राजधानी के आदर्श कुष्ठ आश्रम के सचिव कल्लू का।

आश्रम के सचिव आगे बताते हैं कि आदर्श कुष्ठ आश्रम में लगभग 200 रोगी हैं। लगभग सभी रोगियों का यह मानना है कि कुष्ठ रोग शल्य चिकित्सा से इनके हाथ पैरों में जो बची हुई ताकत है, वह भी खत्म हो जाती है। जबकि डाक्टर इनकी सर्जरी कर इन्हें ठीक करने का दावा करते हैं। वहीं, समाज कल्याण विभाग कुष्ठ रोगियों की सर्जरी के लिए आठ हज़ार रूपये का अनुदान देता है।

इसके अलावा केजीएमयू में दस साल में 346 कुष्ठ रोगियों को नि:शुल्क इलाज देकर स्वस्थ किया गया है। विभागाध्यक्ष एके सिंह का दावा है कि हम पूरी कोशिश करते हैं कि इनके हाथ पैर काम करने लगे। शुरुआत में पता चलने पर इसको जड़ से खत्म किया जा सकता है।

81 फीसदी नए आंकड़े दर्ज

दुनिया के ज्यादातर देशों ने कुष्ठ रोग से 15 साल पहले ही छुटकारा पा लिया। लेकिन, इस कलंक से लड़ने वाले देशों में भारत अब तक टॉप पर है। नए आंकलन के अनुसार, हर साल दुनिया में कुष्ठ के करीब 2,14,000 मामले सामने आते हैं, जिनमें से अकेले 60 फीसदी भारत में होते हैं। 2000 में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने घोषणा की थी कि कुष्ठ को दुनिया में खत्म कर दिया गया है। उस वक्त हर 10,000 में 1 लोग ही इस बीमारी से पीड़ित थे।

मगर डब्ल्यूएचओ के ताजा आंकड़ों के अनुसार, यह बात सामने आई है कि कुष्ठ के 94 फीसदी मामले 13 देशों में सामने आए हैं। यह बीमारी मरीज को जीवन भर के लिए अपंग बना देती है। अकेले भारत, ब्राजील और इंडोनेशिया में इनमें से 81 फीसदी मामले सामने आए हैं। ऐसे में डब्ल्यूएचओ ने अब नई रणनीति के साथ इस बीमारी के उन्मूलन की डेडलाइन 2020 रखी है। इसके लिए बच्चों में बीमारी को रोकने और कुष्ठ पीड़ित लोगों से भेदभाव रोकने के लिए कानून बनाने आदि का लक्ष्य रखा गया है।

आज लोग यहां से ले जाते हैं पानी

आश्रम के सचिव कल्लू ने बताया कि आज से करीब बीस साल पहले उनको यह रोग हुआ था। तब उनको उनके घर वालों ने निकाल दिया था। उस बीस साल पहले से आज के दौर में काफी अंतर आया है। आश्रम के बाहर ही एक नाला बहता था और उस नाले का ही गन्दा पानी हम पीते थे। क्योंकि लोग हमें साफ पानी नहीं पीने देते थे। किसी नल पर हम पानी नहीं पी सकते थे और आज हमारे आश्रम से लोग पानी पीने के लिए भरकर ले जाते हैं।

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