एक रात की रोशनी, एक बदली हुई नींद: एलईडी पर हुआ प्रयोग क्या बताता है

Gaon Connection | Feb 10, 2026, 18:13 IST
Share
घरों में इस्तेमाल होने वाली सफेद एलईडी (WLED) रोशनी पर किया गया एक नया भारतीय वैज्ञानिक शोध बताता है कि केवल 30 मिनट की तेज रोशनी भी दिमाग की सतर्कता को बढ़ा सकती है, लेकिन यही प्रभाव आगे चलकर नींद के प्राकृतिक चक्र को बिगाड़ने का कारण बन सकता है। “Impact of Domestic White LED Light on Cognitive Functions and Amelioration of Blue Light Blocking Lens (BBL) on Healthy Adults” नामक यह शोध मणिपाल अकादमी ऑफ हायर एजुकेशन, कर्नाटक से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। इस अध्ययन में यह समझने की कोशिश की गई कि घरेलू एलईडी रोशनी, दिमाग की कार्यक्षमता और नींद को कैसे प्रभावित करती है।
Image Feb 10, 2026, 05_48_08 PM
क्या आपको वो दिन याद हैं जब घरों के भीतर रात में पीले बल्ब की रौशनी हुआ करती थी। उस समय की नींद भी अक्सर याद ज़रूर आती होगी जब बिस्तर पर जातें ही कुछ ही देर में ऐसी नींद आती थी जो सीधे अपने समय पर खोलती थी। लेकिन वक़्त के साथ रौशनी ने अपना रंग बदला, पीली लाइट की जगह WLED की सफ़ेद रौशनी ने ली। फिर उसी के साथ दौर आया स्मार्टफोन्स का, लैपटॉप्स और घंटों के स्क्रीनटाइम का जिसके कारण ब्लू लाइट के साथ हमारा साथ बढ़ता गया। यह कोई एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि गांव से शहर तक फैलती एक नई आदत की तस्वीर है। इसी आदत के असर को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में एक नियंत्रित अध्ययन किया जहां रोशनी को मापा गया, दिमाग को पढ़ा गया और नींद के संकेतों को आंकड़ों में बदला गया।

कैसे किया गया शोध ?

यह अध्ययन किसी सर्वे या सवाल-जवाब पर आधारित नहीं था, बल्कि पूरी तरह नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में किया गया। इसमें 15 स्वस्थ वयस्कों को शामिल किया गया, जिनकी नींद सामान्य थी और जिनमें किसी तरह की गंभीर मानसिक या शारीरिक बीमारी नहीं पाई गई। शोध शुरू करने से पहले प्रतिभागियों की नींद की गुणवत्ता, याददाश्त और मानसिक स्थिति की जांच की गई, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि प्रयोग के नतीजे किसी बीमारी या पहले से मौजूद समस्या से प्रभावित न हों।

प्रयोग के दौरान प्रतिभागियों को एक खास कमरे में बैठाया गया, जहां दो सफेद एलईडी लाइटें लगाई गई थीं। इन लाइटों की तीव्रता 600 लक्स रखी गई इतनी रोशनी जितनी आमतौर पर घरों या दफ्तरों के कमरों में होती है। लाइटें आंखों के स्तर से लगभग 45 डिग्री के कोण पर और करीब 80 सेंटीमीटर की दूरी पर रखी गईं, ताकि रोशनी सीधे आंखों तक पहुंचे।

प्रतिभागियों को इस रोशनी के संपर्क में करीब 30 मिनट तक रखा गया। इस दौरान उनसे कंप्यूटर पर एक खास मानसिक परीक्षण कराया गया, जिसे “2-बैक टास्क” कहा जाता है। यह परीक्षण वर्किंग मेमोरी को परखने का तरीका है जिससे यह समझ आता है कि व्यक्ति कितनी तेजी और सटीकता से सोच सकता है। साथ ही, उनके दिमाग की गतिविधियों को मापने के लिए ईईजी (EEG) मशीन का इस्तेमाल किया गया। यह मशीन दिमाग की विद्युत तरंगों को रिकॉर्ड करती है और यह दिखाती है कि ध्यान, पहचान और प्रतिक्रिया के समय दिमाग कैसे काम करता है।

Setup
Setup


रोशनी के बाद दिमाग में क्या बदला

जब एलईडी रोशनी के संपर्क से पहले और बाद के आंकड़ों की तुलना की गई, तो एक साफ अंतर सामने आया। प्रतिभागियों ने मानसिक परीक्षण के दौरान सवालों के जवाब पहले की तुलना में ज्यादा तेजी से दिए। यानी उनका रिस्पॉन्स टाइम कम हो गया। यह बदलाव इतना स्पष्ट था कि इसे केवल संयोग नहीं माना जा सकता। हालांकि, एक दिलचस्प बात यह रही कि जवाबों की सटीकता में कोई खास सुधार नहीं हुआ। यानी तेज रोशनी ने दिमाग को ज्यादा सतर्क तो किया, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि सोचने की गुणवत्ता या सही-गलत का फैसला बेहतर हो गया। दूसरे शब्दों में कहें तो एलईडी रोशनी ने दिमाग की “स्पीड” बढ़ाई, लेकिन “क्वालिटी” को नहीं बदला।

लाइट का दिमाग पर असर

ईईजी के जरिए दिमाग की जिन तरंगों को मापा गया, उनमें खास तौर पर P300 नामक संकेत पर ध्यान दिया गया। यह संकेत ध्यान और पहचान से जुड़ा माना जाता है। वैज्ञानिक यह देखना चाहते थे कि तेज रोशनी दिमाग की इन तरंगों में कोई ठोस बदलाव लाती है या नहीं। नतीजों में पाया गया कि P300 की तीव्रता और समय में थोड़ा-बहुत अंतर तो दिखा, लेकिन वह इतना मजबूत नहीं था कि उसे निर्णायक बदलाव कहा जा सके। इसका मतलब यह हुआ कि व्यवहारिक स्तर पर भले ही व्यक्ति ज्यादा सतर्क दिखे, लेकिन दिमाग के गहरे संकेतों में कोई बड़ा और स्थायी परिवर्तन दर्ज नहीं हुआ।

यह भी पढ़े: 'गेमिंग डिसऑर्डर' - मोबाइल फोन की लत ग्रामीण बच्चों को दे रही नई बीमारी; गाँव कनेक्शन की ग्राउंड रिपोर्ट

नींद से जुड़ा असली सवाल

वैज्ञानिकों के अनुसार, हमारी आंखों में कुछ खास कोशिकाएं होती हैं जो रोशनी को केवल “देखने” के लिए नहीं, बल्कि शरीर की जैविक घड़ी को संकेत देने के लिए इस्तेमाल करती हैं। ये कोशिकाएं खासतौर पर नीली रोशनी के प्रति संवेदनशील होती हैं। जब तेज सफेद एलईडी जिसमें नीली रोशनी का हिस्सा ज्यादा होता है आंखों पर पड़ती है, तो दिमाग को यह संकेत मिलता है कि अभी दिन का समय है। इससे मेलाटोनिन नाम का हार्मोन कम बनने लगता है, जो शरीर को सोने का संकेत देता है। शोध में दिखी बढ़ी हुई सतर्कता इसी प्रक्रिया का नतीजा मानी जाती है। लेकिन रात के समय यही सतर्कता नींद में देरी, उथली नींद और बार-बार नींद टूटने की वजह बन सकती है।

ब्लू लाइट से बचाव का दावा और हकीकत

प्रयोग के एक हिस्से में प्रतिभागियों को ब्लू लाइट ब्लॉक करने वाले चश्मे पहनाए गए। बाजार में मिलने वाले इन चश्मों के बारे में कहा जाता है कि ये आंखों और नींद को बचाते हैं। लेकिन इस शोध में 30 मिनट की एलईडी रोशनी के दौरान इन चश्मों से कोई खास फर्क नहीं पड़ा। न तो प्रतिक्रिया समय में बदलाव रुका और न ही दिमागी संकेतों में कोई बड़ा अंतर दिखा। इससे साफ होता है कि तेज रोशनी के थोड़े समय के असर में ये उपाय उतने काम के नहीं हैं, जितना बताया जाता है।
Tags:
  • LED light effects on sleep
  • blue light and melatonin
  • sleep cycle disruption
  • LED lighting health impact
  • blue light exposure at night
  • sleep research study
  • artificial lighting effects
  • circadian rhythm disturbance
  • insomnia causes modern lifestyle
  • screen time and sleep