भारत में टाइफाइड का बढ़ता खतरा: जब दवाएं बेअसर और बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित
Gaon Connection | Jan 17, 2026, 16:52 IST
भारत में टाइफाइड सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि गंदे पानी, कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था और बढ़ते एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की चेतावनी बन चुका है। Lancet की 2023 स्टडी बताती है कि हर साल लाखों लोग संक्रमित हो रहे हैं और हजारों की जान जा रही है। जानिए क्यों बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं और यह संकट कैसे पूरे देश के लिए खतरा बनता जा रहा है।
भारत में टाइफाइड बुखार आज भी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। नए शोध के अनुसार साल 2023 में लगभग 49 लाख (4.7 मिलियन) लोग टाइफाइड से संक्रमित हुए, और करीब 7,400 लोग अपनी जान गंवा बैठे, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं
Lancet South Asia में प्रकाशित 2023 की एक स्टडी ने भारत में टाइफाइड के बोझ की गंभीर तस्वीर सामने रखी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह आंकड़े केवल रिपोर्ट हुए मामलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि असल संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में बहुत से मरीज अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाते।
स्टडी यह भी बताती है कि भारत में टाइफाइड के अधिकांश मामले ऐसे बैक्टीरिया से जुड़े हैं जो अब सामान्य दवाओं के खिलाफ मजबूत हो चुके हैं। करीब 77 प्रतिशत मामलों में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस देखा गया, यानी मरीजों को पहले से ज्यादा महंगा, लंबा और जोखिम भरा इलाज करना पड़ रहा है।
इस शोध में एक और डराने वाली बात सामने आई है- टाइफाइड का सबसे बड़ा बोझ छोटे बच्चों पर है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में संक्रमण का खतरा सबसे अधिक पाया गया। कमजोर प्रतिरोधक क्षमता, साफ पानी की कमी, पोषण की समस्या और समय पर इलाज न मिलना बच्चों को सबसे असुरक्षित बना देता है।
टाइफाइड का फैलाव सीधे तौर पर पानी, स्वच्छता और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ा है। भारत के कई हिस्सों में आज भी लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। पाइपलाइन लीकेज, खुले नाले, गंदे हैंडपंप और असुरक्षित भोजन इस बीमारी को लगातार हवा दे रहे हैं।
शहरों में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। बड़े महानगरों में सड़क किनारे खुले में बिकने वाला खाना, भीड़भाड़ वाले इलाके और सीवेज की खराब व्यवस्था टाइफाइड के लिए अनुकूल माहौल बनाते हैं। इसलिए यह बीमारी अब सिर्फ गांवों की समस्या नहीं रही। स्टडी के अनुसार दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी बड़ी संख्या में मामले दर्ज किए गए हैं।
टाइफाइड को लेकर सबसे बड़ी चिंता अब दवा प्रतिरोध बन गया है। डॉक्टर बताते हैं कि पहले जो एंटीबायोटिक दवाएं आसानी से काम कर जाती थीं, वे अब असर नहीं दिखा रहीं। इसका बड़ा कारण लोगों का खुद से दवा लेना, मेडिकल स्टोर से बिना पर्ची एंटीबायोटिक खरीदना और इलाज अधूरा छोड़ देना है।
जब मरीज पूरा कोर्स नहीं करता, तो बैक्टीरिया पूरी तरह खत्म नहीं होते और मजबूत होकर लौटते हैं। यही वजह है कि आज डॉक्टरों को दूसरी या तीसरी लाइन की महंगी दवाओं का सहारा लेना पड़ता है, जिससे इलाज का खर्च कई गुना बढ़ जाता है।
टाइफाइड का असर सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं रहता। यह परिवार की आर्थिक स्थिति को भी हिला देता है। दिहाड़ी मजदूर अगर बीमार पड़ता है तो घर की कमाई बंद हो जाती है। इलाज में हजारों रुपये खर्च होते हैं। कई बार बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है। महिलाओं को घरेलू जिम्मेदारियों के साथ बीमार परिवार के सदस्य की देखभाल करनी पड़ती है।
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Lancet की इस स्टडी में वैज्ञानिकों ने साफ कहा है कि केवल अस्पताल और दवाओं के भरोसे टाइफाइड को नहीं रोका जा सकता। असली समाधान रोकथाम में है। इसमें सबसे अहम भूमिका टाइफाइड वैक्सीन की है। शोधकर्ताओं के अनुसार अगर बच्चों में व्यापक स्तर पर टीकाकरण किया जाए तो लाखों मामलों को रोका जा सकता है और दवा-प्रतिरोध की रफ्तार को भी धीमा किया जा सकता है।
इसके साथ ही साफ पानी की व्यवस्था, हाथ धोने की आदत, खुले में शौच की समाप्ति और खाद्य स्वच्छता को मजबूत करना बेहद जरूरी है। जब तक बुनियादी सुविधाएं बेहतर नहीं होंगी, तब तक टाइफाइड बार-बार लौटता रहेगा।
यह रिपोर्ट भारत के लिए चेतावनी भी है और मौका भी। चेतावनी इसलिए कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में टाइफाइड और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा बन सकता है। मौका इसलिए कि सही नीतियां, टीकाकरण अभियान, जल-स्वच्छता योजनाएं और दवा के जिम्मेदार इस्तेमाल से इस बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
आज जरूरत है कि टाइफाइड को “साधारण बुखार” समझकर नजरअंदाज न किया जाए, बल्कि इसे एक सामाजिक और राष्ट्रीय संकट मानकर गंभीरता से लिया जाए। क्योंकि एक गिलास गंदा पानी सिर्फ बीमारी नहीं लाता, वह पूरे परिवार का भविष्य भी बदल सकता है।
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Lancet South Asia में प्रकाशित 2023 की एक स्टडी ने भारत में टाइफाइड के बोझ की गंभीर तस्वीर सामने रखी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह आंकड़े केवल रिपोर्ट हुए मामलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि असल संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में बहुत से मरीज अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाते।
स्टडी यह भी बताती है कि भारत में टाइफाइड के अधिकांश मामले ऐसे बैक्टीरिया से जुड़े हैं जो अब सामान्य दवाओं के खिलाफ मजबूत हो चुके हैं। करीब 77 प्रतिशत मामलों में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस देखा गया, यानी मरीजों को पहले से ज्यादा महंगा, लंबा और जोखिम भरा इलाज करना पड़ रहा है।
इस शोध में एक और डराने वाली बात सामने आई है- टाइफाइड का सबसे बड़ा बोझ छोटे बच्चों पर है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में संक्रमण का खतरा सबसे अधिक पाया गया। कमजोर प्रतिरोधक क्षमता, साफ पानी की कमी, पोषण की समस्या और समय पर इलाज न मिलना बच्चों को सबसे असुरक्षित बना देता है।
टाइफाइड का फैलाव सीधे तौर पर पानी, स्वच्छता और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ा है। भारत के कई हिस्सों में आज भी लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। पाइपलाइन लीकेज, खुले नाले, गंदे हैंडपंप और असुरक्षित भोजन इस बीमारी को लगातार हवा दे रहे हैं।
शहरों में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। बड़े महानगरों में सड़क किनारे खुले में बिकने वाला खाना, भीड़भाड़ वाले इलाके और सीवेज की खराब व्यवस्था टाइफाइड के लिए अनुकूल माहौल बनाते हैं। इसलिए यह बीमारी अब सिर्फ गांवों की समस्या नहीं रही। स्टडी के अनुसार दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी बड़ी संख्या में मामले दर्ज किए गए हैं।
Lancet South Asia में प्रकाशित 2023 की एक स्टडी ने भारत में टाइफाइड के बोझ की गंभीर तस्वीर सामने रखी है।
टाइफाइड को लेकर सबसे बड़ी चिंता अब दवा प्रतिरोध बन गया है। डॉक्टर बताते हैं कि पहले जो एंटीबायोटिक दवाएं आसानी से काम कर जाती थीं, वे अब असर नहीं दिखा रहीं। इसका बड़ा कारण लोगों का खुद से दवा लेना, मेडिकल स्टोर से बिना पर्ची एंटीबायोटिक खरीदना और इलाज अधूरा छोड़ देना है।
जब मरीज पूरा कोर्स नहीं करता, तो बैक्टीरिया पूरी तरह खत्म नहीं होते और मजबूत होकर लौटते हैं। यही वजह है कि आज डॉक्टरों को दूसरी या तीसरी लाइन की महंगी दवाओं का सहारा लेना पड़ता है, जिससे इलाज का खर्च कई गुना बढ़ जाता है।
टाइफाइड का असर सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं रहता। यह परिवार की आर्थिक स्थिति को भी हिला देता है। दिहाड़ी मजदूर अगर बीमार पड़ता है तो घर की कमाई बंद हो जाती है। इलाज में हजारों रुपये खर्च होते हैं। कई बार बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है। महिलाओं को घरेलू जिम्मेदारियों के साथ बीमार परिवार के सदस्य की देखभाल करनी पड़ती है।
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Lancet की इस स्टडी में वैज्ञानिकों ने साफ कहा है कि केवल अस्पताल और दवाओं के भरोसे टाइफाइड को नहीं रोका जा सकता। असली समाधान रोकथाम में है। इसमें सबसे अहम भूमिका टाइफाइड वैक्सीन की है। शोधकर्ताओं के अनुसार अगर बच्चों में व्यापक स्तर पर टीकाकरण किया जाए तो लाखों मामलों को रोका जा सकता है और दवा-प्रतिरोध की रफ्तार को भी धीमा किया जा सकता है।
इसके साथ ही साफ पानी की व्यवस्था, हाथ धोने की आदत, खुले में शौच की समाप्ति और खाद्य स्वच्छता को मजबूत करना बेहद जरूरी है। जब तक बुनियादी सुविधाएं बेहतर नहीं होंगी, तब तक टाइफाइड बार-बार लौटता रहेगा।
यह रिपोर्ट भारत के लिए चेतावनी भी है और मौका भी। चेतावनी इसलिए कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में टाइफाइड और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा बन सकता है। मौका इसलिए कि सही नीतियां, टीकाकरण अभियान, जल-स्वच्छता योजनाएं और दवा के जिम्मेदार इस्तेमाल से इस बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
आज जरूरत है कि टाइफाइड को “साधारण बुखार” समझकर नजरअंदाज न किया जाए, बल्कि इसे एक सामाजिक और राष्ट्रीय संकट मानकर गंभीरता से लिया जाए। क्योंकि एक गिलास गंदा पानी सिर्फ बीमारी नहीं लाता, वह पूरे परिवार का भविष्य भी बदल सकता है।
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