मीठे पेयों पर टैक्स क्यों ज़रूरी है: सेहत, आदत और रोज़मर्रा की ज़िंदगी का सवाल
Gaon Connection | Jan 15, 2026, 12:31 IST
WHO की 2025 की रिपोर्ट बताती है कि शुगर-मीठे पेयों पर टैक्स लगाना मोटापा, डायबिटीज़ और दिल की बीमारियों से लड़ने का असरदार तरीका है। रिपोर्ट के मुताबिक जहाँ टैक्स बढ़ा, वहाँ मीठे पेयों की खपत घटी और लोगों ने स्वस्थ विकल्प अपनाए।
कुछ साल पहले तक कोल्ड ड्रिंक या मीठे पैक्ड जूस को लोग कभी-कभार पीने वाली चीज़ मानते थे। आज स्थिति बदल चुकी है। शहरों में दफ़्तर जाते समय, स्कूल से लौटते बच्चे, खेतों में काम करते मज़दूर या बस स्टैंड पर खड़ा कोई भी व्यक्ति, सबके हाथ में मीठे पेय की बोतल दिख जाती है। यह केवल स्वाद का मामला नहीं रहा, बल्कि आदत बन चुका है। इसी बदलती आदत ने दुनिया भर में स्वास्थ्य को लेकर एक नई चिंता खड़ी कर दी है।
इसी मुद्दे पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एक विस्तृत रिपोर्ट जारी कर यह सवाल उठाया है कि क्या मीठे पेयों को सस्ता और आसानी से उपलब्ध रहने देना सही है।
WHO की रिपोर्ट साफ़ कहती है कि मीठे पेयों का बढ़ता चलन मोटापा, डायबिटीज़ और दिल से जुड़ी बीमारियों की बड़ी वजह बन रहा है। यह समस्या केवल अमीर देशों तक सीमित नहीं है। भारत जैसे देशों में, जहाँ पहले कुपोषण सबसे बड़ी चिंता थी, अब उसी के साथ मोटापा और शुगर जैसी बीमारियाँ भी तेज़ी से बढ़ रही हैं।
मीठे पेयों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनमें बहुत ज़्यादा चीनी होती है, लेकिन शरीर के लिए ज़रूरी पोषण लगभग नहीं के बराबर होता है। एक बोतल कोल्ड ड्रिंक पीने से शरीर को तुरंत ऊर्जा का भ्रम तो मिलता है, लेकिन कुछ ही देर में थकान और सुस्ती बढ़ जाती है। लगातार ऐसा करने से शरीर में शुगर का स्तर बिगड़ने लगता है, वज़न बढ़ता है और धीरे-धीरे डायबिटीज़ जैसी बीमारियाँ जन्म लेने लगती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि यह नुकसान अचानक नहीं दिखता, बल्कि सालों में चुपचाप शरीर को खोखला करता है।
WHO की रिपोर्ट इस बात पर ज़ोर देती है कि बच्चों और युवाओं पर इसका असर और भी गंभीर है। कम उम्र में बनी आदतें आगे चलकर जीवन भर की बीमारी में बदल सकती हैं। यही वजह है कि इस समस्या को केवल “व्यक्तिगत पसंद” कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
मीठे पेयों पर टैक्स लगाने का विचार पहली नज़र में सख़्त लग सकता है, लेकिन WHO इसे दंड नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का औज़ार मानता है। रिपोर्ट बताती है कि जब किसी चीज़ की कीमत बढ़ती है, तो लोग उसे बिना सोचे-समझे नहीं खरीदते। कई देशों में जब मीठे पेयों पर टैक्स लगाया गया, तो लोगों ने धीरे-धीरे पानी, बिना शक्कर वाले पेय या घर में बने विकल्पों को अपनाना शुरू किया।
यह बदलाव ज़बरदस्ती नहीं हुआ, बल्कि कीमत के ज़रिये लोगों को सोचने का मौका मिला। WHO का मानना है कि यही टैक्स की असली ताक़त है, लोगों को बेहतर विकल्प चुनने की ओर धीरे से धकेलना।
अगर किसी छोटे शहर या गाँव की बात करें, तो वहाँ अक्सर लोग मेहनत के बाद ठंडा और मीठा पेय पीना राहत मानते हैं। कई बार यह बोतल पानी से सस्ती भी मिल जाती है। जब यही आदत रोज़ बन जाती है, तो बीमारी का रास्ता भी धीरे-धीरे खुल जाता है। WHO की रिपोर्ट यह समझाने की कोशिश करती है कि टैक्स लगने से यह रोज़मर्रा की आदत टूट सकती है। जब मीठा पेय महंगा होगा, तो लोग विकल्प ढूँढेंगे, छाछ, नींबू पानी, सादा पानी या घर का बना पेय।
यह बदलाव छोटे स्तर पर दिखता है, लेकिन लंबे समय में पूरे समाज की सेहत पर असर डालता है।
WHO की रिपोर्ट बच्चों को लेकर विशेष चिंता जताती है। रंगीन बोतलें, मीठा स्वाद और टीवी-सोशल मीडिया पर चलने वाले आकर्षक विज्ञापन बच्चों को आसानी से प्रभावित करते हैं। जब बच्चे रोज़ाना मीठे पेय पीने लगते हैं, तो माता-पिता को भी यह सामान्य लगने लगता है। टैक्स लगने से केवल कीमत नहीं बढ़ती, बल्कि यह एक संकेत भी देता है कि यह उत्पाद रोज़मर्रा के लिए नहीं है।
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रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि टैक्स के साथ-साथ बच्चों को लक्षित करने वाले विज्ञापनों पर नियंत्रण और स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा बेहद ज़रूरी है।
यह सवाल सबसे ज़्यादा उठता है। WHO इसे नज़रअंदाज़ नहीं करता। रिपोर्ट बताती है कि बीमारी का सबसे बड़ा बोझ ग़रीब परिवारों पर ही पड़ता है। इलाज का खर्च, काम से छुट्टी और आय का नुकसान, ये सब मिलकर परिवार को और ग़रीब बना देते हैं। अगर टैक्स से बीमारी की दर कम होती है और सरकार उस पैसे को अस्पतालों, पोषण योजनाओं और स्वास्थ्य सेवाओं में लगाती है, तो इसका फ़ायदा सीधे आम लोगों को मिलता है।
इस नज़र से देखें तो टैक्स बोझ नहीं, बल्कि लंबे समय की राहत बन सकता है।
भारत में मीठे पेयों की खपत तेज़ी से बढ़ रही है, और इसके साथ ही डायबिटीज़ और मोटापे के मामले भी। WHO की रिपोर्ट भारत जैसे देशों को यह सोचने का मौका देती है कि स्वास्थ्य नीति को केवल इलाज तक सीमित न रखा जाए। अगर बीमारी से पहले ही रोकथाम हो जाए, तो लाखों परिवारों को राहत मिल सकती है।
यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि टैक्स तभी असरदार होगा, जब उसके साथ जागरूकता, साफ़ लेबलिंग और स्थानीय स्तर पर संवाद हो। केवल क़ानून बनाना काफ़ी नहीं, लोगों को यह समझाना भी ज़रूरी है कि वे क्या और क्यों पी रहे हैं।
इसी मुद्दे पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एक विस्तृत रिपोर्ट जारी कर यह सवाल उठाया है कि क्या मीठे पेयों को सस्ता और आसानी से उपलब्ध रहने देना सही है।
WHO की रिपोर्ट साफ़ कहती है कि मीठे पेयों का बढ़ता चलन मोटापा, डायबिटीज़ और दिल से जुड़ी बीमारियों की बड़ी वजह बन रहा है। यह समस्या केवल अमीर देशों तक सीमित नहीं है। भारत जैसे देशों में, जहाँ पहले कुपोषण सबसे बड़ी चिंता थी, अब उसी के साथ मोटापा और शुगर जैसी बीमारियाँ भी तेज़ी से बढ़ रही हैं।
मीठे पेयों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनमें बहुत ज़्यादा चीनी होती है, लेकिन शरीर के लिए ज़रूरी पोषण लगभग नहीं के बराबर होता है। एक बोतल कोल्ड ड्रिंक पीने से शरीर को तुरंत ऊर्जा का भ्रम तो मिलता है, लेकिन कुछ ही देर में थकान और सुस्ती बढ़ जाती है। लगातार ऐसा करने से शरीर में शुगर का स्तर बिगड़ने लगता है, वज़न बढ़ता है और धीरे-धीरे डायबिटीज़ जैसी बीमारियाँ जन्म लेने लगती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि यह नुकसान अचानक नहीं दिखता, बल्कि सालों में चुपचाप शरीर को खोखला करता है।
WHO की रिपोर्ट इस बात पर ज़ोर देती है कि बच्चों और युवाओं पर इसका असर और भी गंभीर है। कम उम्र में बनी आदतें आगे चलकर जीवन भर की बीमारी में बदल सकती हैं। यही वजह है कि इस समस्या को केवल “व्यक्तिगत पसंद” कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
मीठा स्वाद, कड़वा असर: शुगर ड्रिंक टैक्स पर WHO की साफ़ बात
मीठे पेयों पर टैक्स लगाने का विचार पहली नज़र में सख़्त लग सकता है, लेकिन WHO इसे दंड नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का औज़ार मानता है। रिपोर्ट बताती है कि जब किसी चीज़ की कीमत बढ़ती है, तो लोग उसे बिना सोचे-समझे नहीं खरीदते। कई देशों में जब मीठे पेयों पर टैक्स लगाया गया, तो लोगों ने धीरे-धीरे पानी, बिना शक्कर वाले पेय या घर में बने विकल्पों को अपनाना शुरू किया।
यह बदलाव ज़बरदस्ती नहीं हुआ, बल्कि कीमत के ज़रिये लोगों को सोचने का मौका मिला। WHO का मानना है कि यही टैक्स की असली ताक़त है, लोगों को बेहतर विकल्प चुनने की ओर धीरे से धकेलना।
अगर किसी छोटे शहर या गाँव की बात करें, तो वहाँ अक्सर लोग मेहनत के बाद ठंडा और मीठा पेय पीना राहत मानते हैं। कई बार यह बोतल पानी से सस्ती भी मिल जाती है। जब यही आदत रोज़ बन जाती है, तो बीमारी का रास्ता भी धीरे-धीरे खुल जाता है। WHO की रिपोर्ट यह समझाने की कोशिश करती है कि टैक्स लगने से यह रोज़मर्रा की आदत टूट सकती है। जब मीठा पेय महंगा होगा, तो लोग विकल्प ढूँढेंगे, छाछ, नींबू पानी, सादा पानी या घर का बना पेय।
यह बदलाव छोटे स्तर पर दिखता है, लेकिन लंबे समय में पूरे समाज की सेहत पर असर डालता है।
WHO की रिपोर्ट बच्चों को लेकर विशेष चिंता जताती है। रंगीन बोतलें, मीठा स्वाद और टीवी-सोशल मीडिया पर चलने वाले आकर्षक विज्ञापन बच्चों को आसानी से प्रभावित करते हैं। जब बच्चे रोज़ाना मीठे पेय पीने लगते हैं, तो माता-पिता को भी यह सामान्य लगने लगता है। टैक्स लगने से केवल कीमत नहीं बढ़ती, बल्कि यह एक संकेत भी देता है कि यह उत्पाद रोज़मर्रा के लिए नहीं है।
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रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि टैक्स के साथ-साथ बच्चों को लक्षित करने वाले विज्ञापनों पर नियंत्रण और स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा बेहद ज़रूरी है।
यह सवाल सबसे ज़्यादा उठता है। WHO इसे नज़रअंदाज़ नहीं करता। रिपोर्ट बताती है कि बीमारी का सबसे बड़ा बोझ ग़रीब परिवारों पर ही पड़ता है। इलाज का खर्च, काम से छुट्टी और आय का नुकसान, ये सब मिलकर परिवार को और ग़रीब बना देते हैं। अगर टैक्स से बीमारी की दर कम होती है और सरकार उस पैसे को अस्पतालों, पोषण योजनाओं और स्वास्थ्य सेवाओं में लगाती है, तो इसका फ़ायदा सीधे आम लोगों को मिलता है।
इस नज़र से देखें तो टैक्स बोझ नहीं, बल्कि लंबे समय की राहत बन सकता है।
भारत में मीठे पेयों की खपत तेज़ी से बढ़ रही है, और इसके साथ ही डायबिटीज़ और मोटापे के मामले भी। WHO की रिपोर्ट भारत जैसे देशों को यह सोचने का मौका देती है कि स्वास्थ्य नीति को केवल इलाज तक सीमित न रखा जाए। अगर बीमारी से पहले ही रोकथाम हो जाए, तो लाखों परिवारों को राहत मिल सकती है।
यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि टैक्स तभी असरदार होगा, जब उसके साथ जागरूकता, साफ़ लेबलिंग और स्थानीय स्तर पर संवाद हो। केवल क़ानून बनाना काफ़ी नहीं, लोगों को यह समझाना भी ज़रूरी है कि वे क्या और क्यों पी रहे हैं।