ये हैं वनवासियों की तीन कारगर जड़ी बूटियां

ये हैं वनवासियों की तीन कारगर जड़ी बूटियांवनवासियों की तीन कारगर जड़ी बूटियां।

लसोड़ा

लसोड़ा को हिन्दी में ‘गोंदी’ और ‘निसोरा’ भी कहते हैं। इसके फल सुपारी के बराबर होते हैं। कच्चा लसोड़़ा का साग और आचार भी बनाया जाता है। पके हुए लसोड़े मीठे होते हैं तथा इसके अन्दर गोंद की तरह चिकना और मीठा रस होता है। लसोड़ा मध्यभारत के वनों में देखा जा सकता है, यह एक विशाल पेड़ होता है जिसके पत्ते चिकने होते है, आदिवासी अक्सर इसके पत्तों को पान की तरह चबाते हैं। इसकी लकड़ी इमारती उपयोग की होती है। इसे रेठु के नाम से भी जाना जाता है, हालांकि इसका वानस्पतिक नाम कार्डिया डाईकोटोमा है। आदिवासी लसोड़ा का इस्तेमाल अनेक रोगनिवारणों के लिए करते हैं, चलिए जानते हैं लसोड़ा के बारे में..

लसोड़ा की छाल को पानी में घिसकर प्राप्त रस को अतिसार से पीड़ित व्यक्ति को पिलाया जाए तो आराम मिलता है। छाल के रस को अधिक मात्रा में लेकर इसे उबाला जाए और काढ़ा बनाकर पिया जाए तो गले की तमाम समस्याएं खत्म हो जाती है। लसोड़े की छाल को पानी में उबालकर छान लें। इस पानी से गरारे करने से गले की आवाज खुल जाती है। इसके बीजों को पीसकर दाद-खाज और खुजली वाले अंगों पर लगाया जाए आराम मिलता है।

लसोड़ा का चूर्ण शरीर के लिए लाभदायक

डांग-गुजरात के आदिवासी लसोड़ा के फलों को सुखाकर चूर्ण बनाते हैं और मैदा, बेसन और घी के साथ मिलाकर लड्डू बनाते हैं, इनका मानना है कि इस लड्डू के सेवन शरीर को ताकत और स्फ़ूर्ती मिलती है। लसोड़ा के पत्तों का रस प्रमेह और प्रदर दोनों रोगों के लिए कारगर होता है। लसोड़ा की छाल का काढा तैयार कर माहवारी की समस्याओं से परेशान महिला को दिया जाए तो आराम मिलता है। इसकी छाल की लगभग 200 ग्राम मात्रा लेकर इतने ही मात्रा पानी के साथ उबाला जाए और जब यह एक चौथाई शेष रहे तो इससे कुल्ला करने से मसूड़ों की सूजन, दांतो का दर्द और मुंह के छालों में आराम मिल जाता है। छाल का काढ़ा और कपूर का मिश्रण तैयार कर सूजन वाले हिस्सों में मालिश की जाए तो फायदा होता है।

अडूसा

मध्य और पश्चिम भारत के वनों में प्रचुरता से पाए जाने अडूसा को आदिवासी अनेक हर्बल नुस्खों के तौर पर अपनाते हैं। प्राचीन काल से अडूसा का उपयोग कई बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता रहा है और इस जिक्र आयुर्वेद में भी देखा जा सकता है। अडूसा का वानस्पतिक नाम अधाटोड़ा जियलेनिका है। चलिए जानते हैं अडूसा से जुड़े आदिवासियों के जोरदार नुस्खों को..

कफ को दूर करने के लिए अडूसा की पत्तियों के रस को शहद में मिलाकर दिया जाता है। कम से कम 15 पत्तियों को कुचल लिया जाए और इसमें दो चम्मच शहद मिलाकर रोगी को हर चार घंटे के अंतराल से दिया जाए तो खांसी में तेजी से आराम मिलता है। इसी नुस्खे से अस्थमा का इलाज भी होता है।

टीबी मरीज पीएं काढ़ा

पातालकोट के आदिवासी टीबी के मरीजों को अडूसा की पत्तियों का काढ़ा बनाकर 100 मिली रोज पीने की सलाह देते हैं। करीब 50 ग्राम पत्तियों को 200 मिली पानी में डालकर उबाला जाए और जब यह आधा शेष बचे, रोगी को दिया जाए, आराम मिलता है।

कफ को बाहर निकाले

अडूसा शरीर में जाकर फेफड़ों में जमी कफ और गंदगी को बाहर निकालता है। इसी कारण इसे ब्रोंकाइटिस के इलाज का रामबाण माना जाता है। आयुर्वेदिक दवाइयों में अडूसा का प्रयोग किया जाता है।

दिल के मरीजों के लिए फायदेमंद

दिल के मरीजों को अड़ूसा की पत्तियों और अंगूर के फलों का समान मिश्रण का रस पीना चाहिए। आदिवासियों के अनुसार हृदय की समस्याओं में आराम के लिए इस नुस्खे का इस्तेमाल बेहद कारगर होता है। अडूसा के फलों को छाया में सुखाकर महीन पीसकर 10 ग्राम चूर्ण में थोड़ा गुड़ मिलाकर 4 खुराक बना लिया जाए और सिरदर्द शुरू होते ही 1 गोली खिला दिया जाए तो तुरंत लाभ होता है।

भृंगराज

नदी, नालों, मैदानी इलाकों, खेत और उद्यानों मे अक्सर देखा जाने वाला भृंगराज आयुर्वेद के अनुसार बड़ा ही महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है। ग्रामीण अंचलों मे ब्लैक बोर्ड को काला करने के लिये जिस पौधे को घिसा जाता है, वही भृंगराज है। इसका वानस्पतिक नाम एक्लिप्टा प्रोस्ट्रेटा है। आदिवासी भृंगराज को अनेक हर्बल नुस्खों में औषधि के तौर पर उपयोग में लाते हैं। चलिए जानते हैं किस तरह आदिवासी भृंगराज का इस्तेमाल करते हैं।

भृंगराज के संपूर्ण पौधे का रस पीलिया में दिया जाता है। आदिवासी हर्बल जानकारों के अनुसार प्रतिदिन आधा गिलास रस पीने से एक सप्ताह के अंदर ही पीलिया के रोगी को राहत मिल जाती है। इस हेतु भृंगराज के पौधे (करीब 50 ग्राम) को लगभग 100 मिली पानी में कुचलकर छानकर उपयोग में लाया जाता है।भृंगराज की पत्तियों का रस शहद के साथ मिलाकर देने से बच्चों को खांसी में काफी आराम मिलता है। दिन में कम से कम 3 बार करीब 10 ग्राम पत्तियों को कुचलकर रस तैयार करना चाहिए।

पातालकोट के आदिवासियों का मानना है कि यदि इसकी पत्तियों के रस को मसूड़ों पर लगाया जाए और कुछ मात्रा माथे या ललाट पर लगाई जाए तो सिरदर्द में अतिशीघ्र आराम मिलता है।हाथीपांव या एलिफ़ेंटेयासिस होने पर तिल के तेल के साथ भृंगराज की पत्तियों के रस को मिलाकर पांव पर लेपित करने से फ़ायदा होता है।

माइग्रेन और सिर दर्द में रामबाण भृंगराज की पत्तियां

माइग्रेन या आधा सिरदर्द होने पर भृंगराज की पत्तियों को दूध में उबाला जाए व इस दूध की कुछ बूंदें नाक में डाली जाए तो आराम मिलता है। यदि बकरी का मिल जाए तो परिणाम और भी बेहतर मिलते हैं। त्रिफला, नील और भृंगराज तीनों एक-एक चम्मच लेकर 50 मिली पानी में मिलाकर रात को लोहे की कड़ाही में रख देते है। प्रातः इसे बालों में लगाकर, इसके सूख जाने के बाद नहा लिया जाता है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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