प्रसूताओं में दूध स्रावण की समस्या का पारंपरिक समाधान

प्रसूताओं में दूध स्रावण की समस्या का पारंपरिक समाधानदूध स्रावण से संबंधित समस्याओं से ग्रसित माता स्वयं तनावग्रस्त हो जाती हैं और अक्सर प्रसूताओं में चिड़चिड़ेपन की एक वजह यह भी होती है।

बच्चों के लिए माँ के प्यार, दुलार, स्नेह और त्याग के लिए माँ सदैव पूजनीय है। मातृत्व का जन्म भी उसी समय होता है जब माँ एक संतान को जन्म देती है। माँ का दूध सारे मातृत्व का निचोड़ होता है जो संतान को माँ की तरफ से दिया जाने वाला सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण प्रेममयी उपहार होता है।

हमारे देश में सभी माताएं अपने शिशुओं का स्तनपान कराती हैं, परन्तु पहली बार माँ बनने वाली माताओं को शुरू में स्तनपान कराने में अक्सर दिक्कतें आती हैं। आधुनिक विज्ञान इस बात की तरजीह भी देता है कि माँ का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम और संपूर्ण आहार है किंतु कभी-कभी संतान के जन्म के बाद माता के स्तनों से दूध का स्रावण ठीक तरह से नहीं हो पाता या बिल्कुल भी नहीं होता। दूध स्रावण से संबंधित समस्याओं से ग्रसित माता स्वयं तनावग्रस्त हो जाती हैं और अक्सर प्रसूताओं में चिड़चिड़ेपन की एक वजह यह भी होती है। इस सप्ताह हम चर्चा करेंगे आदिवासियों के उन हर्बल नुस्खों की जो प्रसूता महिलाओं में दूध ना आने की शिकायत में काफी हद तक कारगर माने जाते हैं।

फायदेमंद है लहसुन

लहसुन की एक दो कलियां सुबह शाम चबाने से माता के दूध का स्रावण नियमित होने लगता है और माना जाता है कि लहसुन की कलियां माता के दूध की अशुद्धियों को भी दूर कर देती हैं वैसे भी लहसुन के एंटीबैक्टिरियल गुणों की पैरवी आधुनिक विज्ञान भी करता है। आदिवासियों के अनुसार लहसुन की कलियां चबाने वाली माँ का दूध शिशुओं को कुपोषण व अतिसार जैसी बीमारियों से बचाता है।

चौलाई की भाजी कारगर

चौलाई की भाजी माताओं में दूध के स्रावण को नियमित करने के लिए काफी कारगर मानी जाती है। पातालकोट के हर्बल जानकार मानते हैं कि चौलाई की भाजी को सुखाकर चूर्ण तैयार किया जाए और इसकी 5 ग्राम मात्रा दूध में मिलाकर प्रतिदिन दिन में 3 बार लिया जाए तो माँ का दूध निरंतर और सही तरह से स्रावित होने लगता है।

सुवा है वरदान

जिन माताओं में प्रसूति पश्चात स्तनों में दूध बनने या दूध के निकलने में बाधा होती हैं सुवा उनके लिए वरदान की तरह है। प्रतिदिन सुवा का चूर्ण लगभग 1 ग्राम दिन में 4-5 बार लेने से काफी फायदा होता है। सुवा के साथ समान मात्रा में शतावर की जड़ों मिश्रण भी लिया जाए तो तेजी से असर करता है।

जीरे का उबला हुआ पानी

माताओं को जीरा का उबला हुआ पानी पिलाया जाए तो दूध संबंधित समस्याओं में तेजी से फायदा होता है। डाँगी आदिवासियों के अनुसार जीरा पाचक होता है और पेट से अम्लता या एसिडिटी को दूर करने के लिए उत्तम है। एक तरफ यह माँ के शरीर में रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है वहीं दूसरी तरफ माता के दूध में किसी भी तरह की अशुिद्ध हो, समाप्त कर देता है।

गाय का दूध फायदेमंद

प्रसूता महिला को गाय के दूध (150 मिली) के साथ मुलेठी (2 ग्राम) दिन में दो से तीन बार पिलाया जाए तो दूध का स्रावण सामान्य होने लगता है।

दलिया व पपीता पुष्टिकारक

आदिवासी गेंहू के दलिया (लगभग 50 ग्राम) में दूध (250 मिली) मिलाकर इसे पकाते हैं और इसे प्रसूता महिला को दिन में कम से कम एक बार जरूर खिलाते हैं, दलिया खिलाने के बाद माता को पपीते का सेवन भी कराया जाता है। माना जाता है कि यह पुष्ठिकारक होता है और माता के दूध को और भी शक्तिवर्धक बनाने में मदद करता है।

पारंपरिक नुस्खे अपनाते हैं आदिवासी

गुजरात में डाँग जिले के भील आदिवासी एक पारंपरिक नुस्खे को तैयार कर प्रसूता माता को खिलाते हैं। तिल, मुलेठी, अश्वगंधा, जीवंती और गुड़ की समान मात्रा ली जाती है। गुड़ को किसी बर्तन में डालकर गर्म किया जाता है, जब यह पिघल जाता है तो इसमें तिल, मुलेठी, अश्वगंधा, जीवंती और थोड़ी मात्रा में कद्दु के बीज डाल दिए जाते हैं और हल्का ठंडा होने पर इनके लड्डु तैयार किए जाते है। प्रतिदिन सुबह एक लड्डू खिलाने से माता के दूध का स्रावण सही और नियमित हो जाता है।

एक बार काढ़े का भी करें सेवन

डाँग गुजरात में माता के दूध में किसी तरह के संक्रमण या अशुद्धि को दूर करने के लिए अनंतमूल, चिरायता, गिलोय, अदरक और शतावर का काढ़ा तैयार किया जाता है और माता को दिन में कम से कम एक बार पिलाया जाता है। पातालकोट में भी आदिवासी गुडुची और जीवंती की समान मात्रा लेकर काढ़ा बनाते हैं और माता को प्रतिदिन एक बार इसका सेवन कराया जाता है। भुमकाओ (हर्बल जानकार) का मानना है कि स्वस्थ महिलाओं को इस काढ़े का सेवन करना चाहिए, हितकर होता है।

काले तिल का करें सेवन

काले तिल के बीजों का सेवन और तिल के बीजों को दूध में पीसकर प्रसूता महिलाओं की छाती में लेप किया जाए तो स्तनों से दूध आना शुरू हो जाता है।

माता को दें गिलोय का काढ़ा

गिलोय का काढ़ा बनाकर एक कप दिन में दो बार देने से प्रसूता महिला में दूध आने का क्रम सुचारु हो जाता है। माना जाता है कि प्रसव के पश्चात निरंतर गिलोय रस देने से माता की सेहत भी बेहतर होती है और रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

नागरमोथा के ताजे पौधे का काढ़ा

नागरमोथा के ताजे पौधे को पानी में उबालकर काढ़ा तैयार कर प्रसूता महिलाओं के पिलाने से स्तनों का दूध शुद्ध होता है और दूध बढ़ता है, जिन्हे दूध कम आने की शिकायत हो, उन्हें भी काफ़ी फायदा होता है।

दें सप्तपर्णी छाल का रस

पातालकोट के आदिवासियों का मानना है कि प्रसव के बाद माता को यदि सप्तपर्णी छाल का रस पिलाया जाता है तो माता के स्तनों से दूध स्त्रावण की मात्रा बढ़ जाती है।

रोज़ खाएं अरबी की सब्जी

प्रसव के बाद माताओं में दूध की मात्रा कम बनती हो तो अरबी की सब्जी प्रतिदिन देने से अतिशीघ्र फायदा होता है। अरबी के पत्ते डंठल के साथ लिए जाए और पानी में उबालकर पानी को छान लिया जाए, इस पानी में उचित मात्रा में घी मिलाकर 3 दिनों तक दिन में दो बार दिया जाए तो भी फायदा होता है।

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