ग्रामीण इलाकों की ज्यादातर लड़कियों में खून की कमी, छात्र-छात्राओं तक नहीं पहुंचती आयरन की गोलियां

ग्रामीण इलाकों की ज्यादातर लड़कियों में खून की कमी, छात्र-छात्राओं तक नहीं पहुंचती आयरन की गोलियांयूपी में कई महीनों से स्कूलों तक नहीं पहुंची गोलियां। फोटो- अभिषेक वर्मा

मीनल टिंगल

लखनऊ। यूपी की राजधानी जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर काकोरी के दसदोई प्राथमिक विद्यालय में कक्षा पांचवीं में पढ़ने वाली छात्रा मोनिका को जब स्कूल में चक्कर आया, तब उसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। जांच में पता चला कि उसमें आयरन की कमी है। डॉक्टर ने प्रधान अध्यापिका दुर्गादेवी दीक्षित को सलाह दी की छात्रा को आयरन की गोली दी जाए। मगर उसे छात्रा को दवा नहीं मिली क्योंकि स्कूल में आयरन की गोलियां कई महीनों से पहुंच ही नहीं रही हैं।

प्रदेश के ज्यादातर स्कूलों में यही हाल है। छात्राएं ही नहीं बल्कि छात्र भी एनीमिया से पीड़ित हैं। एनीमिया से बच्चों को निजात दिलाने के लिए सरकार की ओर से स्कूलों में आयरन की गोलियां बांटने का प्रावधान है। मगर महीनों से दवा की सप्लाई नहीं गई है। यूपी में वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, 10 से 19 वर्ष के किशोर-किशोरियों की संख्या 48.9 लाख है। प्रदेश में लगभग 90 प्रतिशत किशोरियां एनीमिया से पीड़ित हैं। मानकों के मुताबिक, 19 वर्ष के किशोर-किशोरियों को आयरन की गोली खानी चाहिए ताकि वे स्वस्थ रह सकें।

हमारे यहां से आरसी कर दी जाती है। इसके बाद सीएमओ पर्चेज आर्डर करते हैं। हो सकता है कि कहीं-कहीं पर्चेस ऑर्डर न किया गया हो। मैं निरीक्षण करवाऊंगा कि ऐसा क्यों हो रहा है। इसका समाधान किया जाएगा।
आलोक कुमार सिंह, निदेशक, एनएचएम

आयरन की कमी से लड़कियों हो जाती है खून की कमी।

कन्नौज स्थित उमर्दा ब्लॉक के उच्च प्राथमिक स्कूल के प्रधान अध्यापक अरविन्द का कहना है, "पिछले करीब एक साल से उनके स्कूल में बच्चों को आयरन की गोलियां नहीं दी गई हैं। एएनएम से कहा था पर कोई हल नहीं निकला। कुछ दिन पहले स्वास्थ्य विभाग की टीम भी आई। चेकअप और जांच कर चले गए मगर आयरन की गोलियां अब तक नहीं दी गईं।"

स्कूलों में आयरन की गोलियां पहुंचाने का काम स्वास्थ्य विभाग का है। इसलिए मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता। हां, यदि ऐसा हो रहा है तो मैं स्वास्थ्य विभाग से बात करूंगा और यह पूछूंगा कि दवा क्यों नहीं पहुंच रही हैं?
दिनेश बाबू शर्मा, निदेशक, बेसिक शिक्षा

यही हाल रायबरेली स्थित अमावा ब्लॉक के प्राथमिक विद्यालय पूरेमद्दू का है। स्कूल की शिक्षिका शशि सिंह ने बताया "पिछले एक वर्ष से आयरन की गोलियां स्कूल में नहीं दी गयीं हैं। एक वर्ष पहले जब गोलियां दी गयीं थीं तो कुछ बच्चों ने खायीं थी और कुछ ने नहीं, साथ ही अभिभावकों ने भी बच्चों को गोलियां देने के लिए एतराज जताया था। इसलिए स्कूल की ओर से गोलियां मंगवाने के लिए कोई पहल नहीं की गयी।"

काकोरी ब्लॉक के कठिंगरा स्थित पूर्व माध्यमिक विद्यालय के प्रधान अध्यापक शाहिद अली आब्दी कहते हैं, "निर्धनता के चलते बच्चों को अच्छा खाना तो मिल नहीं पाता है। इसलिए उनका एनीमिक होना लाजमी है। आयरन की गोलियां ही एक मात्र उपाय हैं जिनके जरिये बच्चों को एनीमिक होने से बचाया जा सकता है। कई महीने पहले स्कूल में गोलियां वितरित की गयी थीं पर अब नहीं आती हैं। मेरे पास पहले से कुछ स्टॉक रखा है जो बच्चों को दिया जाता रहा है।" बाराबंकी स्थित सूरतगंज ब्लॉक के प्राथमिक विद्यालय भिरिया के सहायक अध्यापक रमाकांत जोशी कहते हैं, "मेरे स्कूल में आयरन की गोलियां अभी तक नहीं पहुंची हैं। यह जानकारी मिली है कि बीआरसी पर यह गोलियां कुछ समय पहले पहुंचीं हैं लेकिन स्कूलों में अभी वितरित नहीं की गयी हैं।"

इस बारे में एनएचएम के निदेशक आलोक कुमार ने कहा, "स्कूल में आयरन की गोलियां न पहुंचने का कारण प्रदेश स्तर पर न तो पैसे की समस्या है और न ही आरसी यानि रेट कान्टेक्ट की। हमारी ओर से ऐसी कोई दिक्कत सामने नहीं आ रही। हां, थोड़ी सी लापरवाही जिले स्तर पर हो सकती है।" उन्होंने कहा, "नियमत: हमारे यहां से आरसी कर दी जाती है। इसके बाद सीएमओ पर्चेज आर्डर करते हैं। हो सकता है कि कहीं-कहीं सीएमओ के द्वारा अभी पर्चेस ऑर्डर न किया गया हो। मैं अपनी टीम के द्वारा यह निरीक्षण करवाऊंगा कि ऐसा क्यों हो रहा है और इसका समाधान करने की कोशिश की जायेगी।"

वहीं, बेसिक शिक्षा निदेशक दिनेश बाबू शर्मा ने कहा, "स्कूलों में आयरन की गोलियां पहुंचाने का काम स्वास्थ्य विभाग का है। इसलिए मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता। हां, यदि यह शिकायत आ रही है कि आयरन की दवा स्कूलों में नहीं पहुंच रही है, तो इस बारे में मैं स्वास्थ्य विभाग से बात करूंगा और यह पूछूंगा कि दवा क्यों नहीं पहुंच रही हैं?"

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