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क्रिकेट का एक गुमनाम हीरो “बालू”, जिसपर तिग्मांशु धूलिया बना रहे फिल्म

लखनऊ। पान सिंह तोमर पर फिल्म बना चुके निर्माता तिग्मांशु धूलिया इस बार एक गुमनाम क्रिकेट खिलाड़ी पर बायोपिक बनाने जा रहे हैं। बॉलिवुड में खिलाड़ियों पर बायोपिक बनने का ये कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले मुक्केबाज मैरी कॉम, क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी, मोहम्मद अजहरुद्दीन और धावक मिल्खा सिंह पर भी फिल्में बन चुकी हैं। क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर पर भी योपिक बन रही है। ये सब बड़े नाम हैं। खेल के क्षेत्र में इनकी विशिष्ट पहचान है, लेकिन दलित सुमदाय के पहले नामी क्रिकेट खिलाड़ी बालू पालवणकर को बहुत कम लोग ही जानते हैं। 1900 में बालू हिंदू जिमखाना की ओर से खेलने वाले पहले दलित खिलाड़ी थे।

19 मार्च 1876 को पूना (पुणे) के धारवाड़ में एक दलित घर में पैदा हुए बालू के पिता ब्रिटिश सेना में नौकरी करते थे। बालू के बड़े भाई शिवराम भी अच्छे क्रिकेटर थे। बालू पारसी क्रिकेट क्लब में झाड़ू लगाने का काम करते थे और उन्हें तीन रुपए हर महीने मिलता था। एक बार उन्हें नेट में बॉलिंग करने का मौका मिला। बाद में जब बालू को पूना क्रिकेट क्लब भेज दिया गया तो वहां यूरोप-भारत के सबसे बेहतरीन बल्लेबाज जे जी ग्रिग ने एक बार बालू को बॉलिंग करते हुए देखा तो उनसे काफी प्रभावित हुए। ग्रिग बालू की गेंद पर बल्लेबाजी करने लगे और आउट होने पर बालू को हर बार आठ आना पुरस्कार के रूप में देते थे। बाद में उनकी सैलरी दो गुना कर दी गई।

बाएं हाथ के स्पिनर बालू को तब बैटिंग नहीं मिलती थी। क्योंकि उस समय बल्लेबाजी करना रुतबा माना जाता था। बॉलिंग के साथ-साथ अन्य काम करने की वजह से बालू की सैलरी तीन गुना तक बढ़ा दी जाती है। बालू के खेल के चर्चे धीरे-धीरे देशभर में फैलने लगे। लेकिन तब कुछ लोगों ने ये कहकर उनका विरोध किया कि वे दलित हैं, इसलिए उनको टीम में नहीं रखना चाहिए। तर्क दिया गया कि एक ही गेंद है, बालू के छूने से वो अछूत हो जाएगी।

यहां तक कि जब बालू को टीम में शामिल किया था तो उनके खाने की प्लेट और चाय पीने की कप अलग हुआ करती थी। हिंदू क्लब को यूरोपियन्स टीम ने पूना में ही क्रिकेट खिलने के लिए चैलेंज किया था। उस मैच में बालू को टीम में शामिल करने के लिए काफी जद्दोजहद हुई थी।

क्रिकेट वेबसाइट क्रिकेट कीड़ा के अनुसार इसका जिक्र जे जी ग्रिग ने एक बाद एक प्रेस इंटरव्यू में भी किया था। तब उन्होंने विरोधियों को मुर्ख कहा था और कहा कि भारत के लोग ऐसे प्रतिभाशली खिलाड़ी का कद्र नहीं करते। यहां तक कि जब बालू को टीम में शामिल किया था तो उनके खाने की प्लेट और चाय पीने की कप अलग हुआ करती थी। हिंदू क्लब को यूरोपियन्स टीम ने पूना में ही क्रिकेट खिलने के लिए चैलेंज किया था। उस मैच में बालू को टीम में शामिल करने के लिए काफी जद्दोजहद हुई थी।

अंग्रेजों को हराकर रचा था इतिहास

कुछ खिलाड़ी उनकी जाति की वजह से उन्हें टीम में खिलाने के खिलाफ थे। लेकिन अंत में उन्हें मौका मिलता है और उनकी बॉलिंग के दम पर हिंदू क्लब की टीम ने यूरोपियन्स टीम पर एतिहासिक जीत दर्ज की थी। आगे चलकर बालू को टीम में नियमित शामिल किया जाने लगा। साथी खिलाड़ियों का व्यवहार भी बदला। 1911 में बालू को इंग्लैंड जाने वाली ऑल इंडिया टीम में चुना जाता है। टीम को समरसेट के खिलाफ मैच खेलना था। टूर पर इंडिया की टीम बुरी तरह हारती है लेकिन बालू ने उस टूर पर 18.84 की औसत से 114 विकेट लिए थे। बालू अपने परिवार के साथ बॉम्बे शिफ्ट हो जाते हैं।

बालू के सबसे छोटे भाई गणपत की भी टीम में एंट्री होती है। तब उम्मीद थी कि बालू को हिंदू टीम का कैप्टन बनाया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं होता है। एमडी पाई को टीम का कैप्टन नियुक्त किया जाता है। 1920 में गणपत की मौत के बाद इसी साल बालू को भी टीम से बाहर कर दिया जाता है।

इस बीच उनका भाई शिवराम क्रिकेट के क्षेत्र में अपनी पहचान बना रहा था। शिवराम को लोग हार्ड हिटिंग बल्लेबाज के रूप में जानते थे। 1906 में दोनों की खेल की बदौलत हिंदू जिमखाना ने अंग्रेजों को हराया था जिसके बाद दोनों का नाम पूरे देश में छा गया। फिर इनको टीम के साथ ही खाने-पीने की इजाजत मिल गई। 1910 में बॉम्बे ट्रिंगुलर टीम जिसमें हिंदू, पारसी और अंग्रेज शामिल थे, इस टीम में बालू के एक और भाई पालवणकर विट्ठल को भी टीम में शामिल किया गया।

कुछ पल के लिए ही बने कप्तान

1913 में बॉम्बे ट्राइंगुलर का नाम बदलकर बॉम्बे क्वाड्रैंगुलर कर दिया जाता है क्योंकि टीम में मुस्लिम खिलाड़ी की भी इंट्री होती है। बालू के सबसे छोटे भाई गणपत की भी टीम में एंट्री होती है। तब उम्मीद थी कि बालू को हिंदू टीम का कैप्टन बनाया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं होता है। एमडी पाई को टीम का कैप्टन नियुक्त किया जाता है। 1920 में गणपत की मौत के बाद इसी साल बालू को भी टीम से बाहर कर दिया जाता है।

15.21 की एवरेज से 33 फर्स्टक्लास मैच में 179 विकेट लेने वाले बालू को कैप्टन न बनाए जाना का भी भारी विरोध हुआ था। एक मैच के दौरान जब पाई बीमार हो जाते हैं तो कुछ देर के लिए बालू को कप्तान बनाया जाता है। 1922 में एक और ब्राह्मण को जब टीम का कप्तान बनाया जाता है तब बालू भाइयों ने इसका विरोध किया। टीम का प्रदर्शन जब गिरने लगा तो बालू के सबसे छोटे भाई विट्ठल को टीम का कप्तान बनाया जाता है और वे चार साल तक टीम के कप्तान रहते हैं। 4 जुलाई 1955 को दुनिया को अलविदा कहने वाले बालू ने जाति को बेड़ियों को तब तोड़ा था जब महात्मा गांधी जातिवादिता के खिलाफ मुहिम चला रहे थे।