खुद कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था, लेकिन अब पूरे गांव को सिखा रही ककहरा

Neetu SinghNeetu Singh   18 April 2018 6:59 PM GMT

खुद कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था, लेकिन अब पूरे गांव को सिखा रही ककहरामहिलाओं को जागरूक करतीं चन्द्रावती देवी।

गोरखपुर। हर बच्चे को शिक्षा मुहैया कराने के लिए सरकार अनेक कार्यक्रम चला रही है। इसके बावजूद अति पिछड़े क्षेत्रों में बच्चों की शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाता है। ऐसे ही गोरखपुर के एक पिछड़े क्षेत्र में बच्चों को शिक्षित करने का एक महिला ने बीड़ा उठाया है।

गोरखपुर जिला मुख्यालय से 23 किलोमीटर दूर पिपराइच ब्लॉक से उत्तर दिशा में मियांमील गाँव निवासी चन्द्रावती देवी (55 वर्ष) जब स्कूल खुले होते हैं तो हर सुबह प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को उनके घर-घर जाकर स्कूल लेकर आती हैं, जिससे गाँव का कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे।

चन्द्रावती देवी इस गाँव की एक निरक्षर महिला थीं जब उन्हें शिक्षा का महत्व पता चला तो उन्होंने ठान ली कि हमारे गाँव का कोई भी बच्चा अब अशिक्षित नहीं रहेगा। वो बताती हैं, “गाँव के प्राइमरी स्कूल में पहले बहुत कम बच्चे पढ़ने जाते थे।

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पूरे दिन ये सब खेलते रहते थे, इनके मां-बाप भी ध्यान नहीं देते थे। कुछ बच्चे तो घर का काम ही किया करते थे और स्कूल नहीं जा पाते थे।” वो आगे बताती हैं, “जब हमने इनके घरवालों को समझाया कि अगर ये बच्चे पढ़ेंगे नहीं तो ये हमारी और आपकी तरह मजदूरी ही करते रहेंगे। शुरुआत में थोड़ा मुश्किल था इन्हें समझाना, लेकिन बाद में सब अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगे।”

“हमारी नातिन पहले स्कूल जाने में बहुत परेशान करती थी, लेकिन जबसे चाची सुबह-सुबह उसको स्कूल जाने के लिए बुलाने आती हैं वो बिना कहे तैयार हो जाती है। कई बार तो उनके आने से पहले ही तैयार बैठी रहती है।” ये कहना है इसी गाँव में रहने वाली रामवती देवी (45 वर्ष) का। चन्द्रावती देवी को ऐसा क्यों लगा कि गाँव का हर बच्चा पढ़ने जाए इस बारे में वो बताती हैं, “मेरी शादी 10 वर्ष की उम्र में हो गई थी।

स्कूल का कभी मुंह नहीं देखा था। ससुराल में दूसरों के यहां मजदूरी करके पेट भरते थे। एक दिन गाँव में बरगद के पेड़ के नीचे मीटिंग हो रही थी, उसमें महिलाओं को फ्री में पढ़ाने की बात हुई तो हमने भी पढ़ने की ठानी। महिला साक्षरता केंद्र में जाकर आठवीं तक हमने खुद पढ़ाई की और अपनी बेटी को भी पढ़ाना शुरू किया।” वो आगे बताती हैं, “मेरी बेटी इंटर पास करके इसी केंद्र में पढ़ाने लगी। मैंने गाँव के हर बच्चे को स्कूल भेजने के लिए घर-घर जाकर ये कोशिश शुरू की।” ताजा अपडेट के लिए हमारे फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए यहां, ट्विटर हैंडल को फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें।

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