बड़े बदलाव की छोटी शुरुआत, बांस के शौचालय

बड़े बदलाव की छोटी शुरुआत, बांस के शौचालयgaonconnection, बांस के शौचालय घटा रहे गाँव की गंदगी

कुड़वा (गोरखपुर)। “शौचालय बनने से कुछ हुआ हो या न हुआ हो, देर-सवेर शौच जाने की ज़रूरत महसूस होती है तो अब सोचना नहीं पड़ता”। गोरखपुर जिले के ब्लाक जंगल कौिड़या के कुड़वा गाँव की नीतू सिंह (19 वर्ष) ने जबसे होश संभाला खुले में ही शौच जाया करती थीं, लेकिन हाल ही में उनके गाँव में इसका एक सामाधान खोजा गया।

ग्रामीण भारत में ऐसी कई नीतू हैं जो रोज़ इन्हीं परेशानियों के साथ जीती हैं, कारण है धन की कमी के कारण शौचालय का ना होना। ऐसे में नीतू के गाँव में शुरुआत हुई बांस के ज़रिए शौचालय बनाने की। ऐसा एक शौचालय महज़ 3,500 रुपए में बनकर तैयार हो जाता है।

लोगों ने इस समस्या के लिए एक बीच का रास्ता निकाल लिया है। गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन ग्रुप नामक गैर सरकारी संस्था के साथ मिलकर इन गाँव वालों ने कुछ बांस के शौचालय बनाएं हैं। इन शौचालयों को बनाने की लागत लगभग 3500 रूपये (प्रति शौचालय) है। गाँव में अभी प्रयोगिक तौर पर ऐसे पाँच शौचालय बनवाए गये हैं। इनकी खासियत यह है कि इनमें मुख्य दीवारें बांस से तैयार की जाती हैं, जिसपर ऊपर से मिट्टी की परत चढ़ाकर उसे और मज़बूत कर दिया जाता है। इससे दीवारें बनाने का सबसे बड़ा खर्च कम घट जाता है।

पांच में से एक शौचालय नीतू के घर में भी बना है। वे बताती हैं, “देर-सबेर अगर शौच के लिए जाना पड़ता था तो काफी शर्म आती थी। दिन में लगभग सभी खेतों में काम चल रहा होता था, समझ नहीं आता था की कहां जाएं। रास्ते में लड़के भी तरह-तरह की बातें बोलते थे, लेकिन अब ये सब नहीं झेलना पड़ता।''

यूँ तो सरकार गाँव में शौचालय बनवाने के लिए निर्मल भारत अभियान और स्वच्छ भारत अभियान जैसी कई योजनायें ले कर आई है, जिनके तहत शौचालय निर्माण के लिए 10-12 हज़ार रुपए की धनराशि भी दी जाती है लेकिन या तो भ्रष्टाचार के कारण ये राशि ग्रामीणों तक पहुंचती नहीं, या जहां पहुंची भी वहां इतनी राशि में बने शौचालय इतने छोटे थे कि ग्रामीणों ने उनका प्रयोग केवल भूंसा-कंडे भरने के लिए किया।

कुड़वा गाँव के राजेश श्याम सिंह (48) बताते हैं, “इस गाँव के अधिकांश परिवार या तो छोटी जोत वाले किसानों के हैं, या फिर मजदूर वर्ग के।

पक्का शौचालय बनवाना हर किसी के बस का नहीं है और सरकार द्वारा जो शौचालय बनते थे उनका कोई अता पता नहीं था। संस्था की सहायता से हमने बांस के शौचालय बनवाए क्यों की बांस आसानी से गाँव में उपलब्ध हो जाता है”।

गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन ग्रुप की कौड़िया ब्लॉक की कैंप को-कोऑर्डिनेटर अंजू पाण्डेय बताती हैं, “हम इस गाँव में जब पहली बार आए तो लगा कि गाँव को साफ़ सफाई की ज़रूरत थी।

 किसी जगह खड़े होकर बात नहीं कर सकते थे इतनी गंदगी थी। ये सब सिर्फ शौचालय न होने की वजह से था।

इसके बाद गाँव वालों की सहमति से गाँव में बांस के शौचालय बनवाए गये जिसमे शुरुआत में गाँव वालों को सिर्फ मज़दूरी का पैसा देना था। शौचालय बनने में प्रयोग होने वाला सामान संस्था ने जुटाया।”

कुड़वा गाँव के ये शौचालय अभी गिनती में भले ही कम हों लेकिन जागरूकता की तरफ एक बड़ा कदम हैं।

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