डॉक्टरों की ज़िद: चार दिन और 20 मौतें

अमित सिंहअमित सिंह   3 Jun 2016 5:30 AM GMT

डॉक्टरों की ज़िद: चार दिन और 20 मौतेंgaonconnection

लखनऊ। केजीएमयू में 30 मई को शुरू हुई डॉक्टरी हड़ताल चौथे दिन आखिरकार ख़त्म हो गई लेकिन खत्म होते-होते कई परिवारों का गहरा ज़ख्म भी दे गई। ट्रॉमा सेंटर के कर्मचारियों के मुताबिक सीनियर डॉक्टरों ने भी लापरवाही की, जिसकी वजह से जानें गईं। नोटिस के बावजूद केजीएमयू के सीनियर डॉक्टर समय पर नहीं पहुंचे।

जूनियर डॉक्टरों का कहना है कि उन्होंने मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया के फैसले को लेकर डॉक्टरों ने 12 मई को ही अपना विरोध जताया था।   

क्या चाहते हैं हड़ताली डॉक्टर?

पहली मांग- यूपी सरकार फैसला जल्दी करें। इसके लिए एक कमेटी बनाए। जिससे फैसला जल्दी सामने आए। फैसला जो भी होगा वो मंज़ूर है। 31 जुलाई ज्यादा लंबा समय है। दूसरी मांग- जिनका दाखिल हुआ है सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक उनका दाखिला नहीं किया जाए। क्योंकि एक सीट पर दो लोगों की नियुक्ति नहीं हो सकती। डॉक्टरों ने तब ही हड़ताल पर जाने के संकेत दे दिये थे। ऐसे में हड़ताल अकस्मिक नहीं थी, तो केजीएमयू प्रशासन ने बैक अप प्लान क्यों नहीं तैयार किया? ट्रामा सेंटर के एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘’डॉक्टरों की लापरवाही की वजह से मरीजों की जान गई है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के फैसले से हर कोई वॉक़िफ़ था, लेकिन फैसले के बारे में न तो केजीएमयू प्रशासन ने और न सीनियर डॉक्टर्स ने कोई बात कही। काउंसलिंग के दौरान भी किसी को इस बारे में नहीं बताया गया। और जैसे ही काउंसलिंग के नतीजे घोषित किए गए डॉक्टरों ने हंगामा करना शुरु कर दिया।’’ कर्मचारी ने कहा, ‘’400 से ज्यादा सीनियर डॉक्टर यहां काम करते हैं जिनकी सैलरी लाखों में है लेकिन उन्होंने जिम्मेदारी के साथ ड्यूटी नहीं निभाई जो मरीज़ इमरजेंसी में आए भी प्राथमिक उपचार कर उन्हें दूसरे अस्पतालों के लिए रेफर कर दिया गया।’’

वहीं जूनियर डॉक्टर अपना पक्ष रखते हुए कहते हैं कि उनके अंधेरे में रखा गया। जूनियर डॉक्टर प्रतीक कुमार यादव के मुताबिक़, ‘’मेरी पहली काउंसलिंग में 33वीं रैंक मिली। जिसमें मैंने एम-एस ऑर्थोपैडिक विषय लिया। 15 दिन मैंने काम किया और 15वें दिन मुझे पता चला कि नए नियमों के मुताबिक़ हम सब इनकी मेरिट में नहीं हैं। मेरे पिता कॉन्सटेबल हैं उन्होंने अपनी पूरी कमाई मेरी पढ़ाई पर खर्च की और मैंने अपनी पूरी जिंदगी किताबों के साथ बिता दी।’’ जूनियर डॉ. कुलजीत सिंह का कहना है, ‘’हम 12 मई से हड़ताल पर बैठे हैं अभी तक किसी ने ख़बर तक नहीं ली। हमनें इस उम्मीद से हड़ताल की, कि हमारा भविष्य खराब नहीं होगा। मेरे पिता किसान है उन्होंने अपने खेत बेचकर मुझे डॉक्टर बनाया है।’’

जूनियर डॉक्टर निर्भय ने कहा, ‘’सुप्रीम कोर्ट में हमारे बारे में बात हो रही है और हमें ही इसके बारे में नहीं पता। हमारी एक भी बात सुप्रीम कोर्ट में नहीं रखी गई और सुप्रीम कोर्ट को ये भी नहीं बताया गया कि हमारा दाखिला हो चुका है।’’

 रिपोर्टर - अमित सिंह/स्वाति शुक्ला

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