एक्सपायरी डेट से पहले ही ख़राब हो रहीं दवाएं

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लखनऊ। हम बच्चों को टीका लगवाकर सुरक्षित महसूस करते हैं। लेकिन हो सकता है कि वह टीका एक्सपायरी डेट से पहले ही ख़राब हो चुका हो। हर दवाई पर लिखा होता कि उसे किस तापमान पर रखा जाना है, लेकिन लखनऊ की दवा मंडी में कम तापमान पर रखी जाने वाली दवाइयों के गत्ते घंटों कड़ी धूप में बाहर पड़े रहते हैं।

नाम ना छापने की शर्त पर एक दवा विक्रेता ने गाँव कनेक्शन को बताया, “जीवन रक्षक दवाओं को लेकर लापरवाही हो रही है। किसी का ध्यान इधर नहीं जाता। न तो ड्रग इंस्पेक्टर ने इसे लेकर कोई कार्रवाई की और न ड्रग अथॉरिटी। अमीनाबाद की दवा मंडी में कई विक्रेता हैं जिनके पास कोल्ड स्टोर नहीं हैं, फिर भी वो खुलेआम जीवन रक्षक दवाएं बेच रहे हैं।”

यहां जीवन रक्षक दवाओं का सालाना कारोबार करीब 70 से 80 हज़ार करोड़ रुपए का है। लेकिन जीवन रक्षक दवाओं को अधिक तापमान में रखे जाने की वजह से दवा खराब होने के बावजूद उसे बाज़ार में बिक्री के लिए भेजा जा रहा है। 

इस बारे में उत्तर प्रदेश के ड्रग कंट्रोलर एके मेहरोत्रा ने कहा, “अगर नियमों का पालन नहीं हो रहा है तो यह गंभीर मुद्दा है। दवा रख-रखाव के नियमों की अनदेखी करने वालों के खिलाफ़ सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। हम ऐसी दवा कंपनियों और दवा विक्रेताओं का लाइसेंस कैंसिल कर देते हैं। दोषी पाए जाने पर तीन साल की जेल या जुर्माना भी लगाया जा सकता है।” 

आगे बताते हैं, “हर  दवा के पैकेट पर लिखा होता है कि किस लाइफ़ सेविंग ड्रग को कितने तापमान पर रखा जाए। किसी भी तरह की लाइफ़ सेविंग ड्रग को धूप में नहीं रखने से पोटेंसी (क्षमता) कम हो जाता है और दवा ठीक से काम नहीं करती।”

उत्तर प्रदेश के असिस्टेंट कमिश्नर ड्रग अनूप कुमार ने कहा, “लाइफ़ सेविंग ड्रग के रख-रखाव को लेकर किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। हम ऐसे दवा विक्रेताओं को लाइफ़ सेविंग ड्रग रखने की अनुमति नहीं देते हैं जिनके पास फ्रीज़र या दवा को ठंडी रखने की व्यवस्था न हो। ज़रूरी दवाओं को खुले में 40 डिग्री के तापमान में रखा जाना एक गंभीर मसला है। हम इसकी जांच करेंगे।’’

वहीं इस मामले में अमीनाबाद क्षेत्र के ड्रग इंस्पेक्टर संजय कुमार ने कहा, “हमने दवा विक्रेताओं को साफ निर्देश जारी किया है कि वो अपनी दुकानों में कोल्ड रूम या डीप फ्रीज़र की व्यवस्था करें। ड्रग अथॉरिटी दवा मंडियों में एक साल के दरम्यान कम से कम 100 रेड डालती है।’’

वहीं, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय कुमार ने कहा, “यह सरासर आम आदमी के जीवन के साथ खिलवाड़ है। सरकार को चाहिए कि वो कड़े से कड़ा नियम बनाए ताकि दवा कंपनियां और विक्रेता इस तरह के काम ना कर पाएं।’’

जीवन रक्षक दवाएं किसे कहते हैं?

कैंसर, एड्स, हार्ट अटैक, हाइपरटेंशन, हेपेटाइटिस-ए और बी, अस्थमा, पोलियो, टिटनस और न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर को ठीक करने के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली दवाओं को जीवन रक्षक दवाएं कहते हैं। देश में करीब दो हज़ार से ज्यादा जीवन रक्षक दवाएं बेची जाती हैं, लेकिन लखनऊ की दवा मंडी में इन दवाओं को लेकर बरती जाने वाली लापरवाही की वजह से जीवन रक्षक दवाएं बीमारी को ठीक ही नहीं कर पा रही हैं। कैंसर के चलते भारत में रोज़ाना 1300 से ज्यादा लोगों की मौत होती है।

हेपेटाइटिस-बी की वजह से करीब 6 लाख लोग अपनी जान गंवाते हैं और देश में होने वाली 35 फीसदी मौतों की वजह दिल की बीमारियां हैं। दवाओं के साथ कैसे हो रही है लापरवाही? हम यह सोचकर चिंता से मुक्त हो जाते हैं कि हमने बच्चे को खतरनाक बीमारियों जैसे-हेपेटाइटिस-बी, पोलियो और टिटनेस की वैक्सिन लगवा दी है, वो महफूज़ रहेंगे। लेकिन जो टीका लगाया गया है उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता ही ख़त्म हो गई हो।  

क्या कहते हैं नियम

  • जीवन रक्षक दवाओं को कम तापमान पर ही स्टोर किया जा सकता है।
  • जीवन रक्षक दवाओं को खुली धूप या अधकि तापमान में नहीं रखा जा सकता।
  • हर जीवन रक्षक दवा के पैकेट पर लिखा होता है कि उसे किस तापमान पर रखा जाना है।
  • रेफ्रीजरेटर में दवा ना रखे जाने पर वो खराब हो जाती हैं उसका असर कम हो जाता है। 

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