पुराने मंगल गीत खो रहे हैं अपनी पहचान

पुराने मंगल गीत खो रहे हैं अपनी पहचानgaonconnection

बाराबंकी । जिला मुख्यालय से लगभग 35 किमी दूर बसारा गाँव की रहने वाली सावित्री देवी (73) बताती हैं, “हमारे समय में शादी हो या बच्चा पैदा हो, मुंडन हो या तिलक चढ़ रहा हो, शुभ गीत गाए जाते थे। ये परंपरा थी और माना जाता था कि इन गीतों के गाने से जो भी काम हो रहा है वो अच्छे तरीके से पूरा होगा।” वो आगे बताती हैं, “हर कार्यक्रम के लिए अलग-अलग गीत गाए जाते थे, शादी में दूल्हे और बारातियों को गाना गाकर गाली देने का भी रिवाज था लेकिन अब ये भी खत्म हो गया है, जो महिलाएं समूह में बैठकर गाती थीं।”

पुराने गीत जैसे सोहर, बन्ना, पचरा अब केवल नाम के लिए गाए जाते हैं। शहर तो दूर की बात हैं गाँवों में भी पारंपरिक गीतों की धमक अब धीमी पड़ गई है। इसके पीछे का कारण बताते हुए बसारा गाँव की प्रीति देवी (32) बताती हैं, “अब न लोगों के पास इतना समय है और न हम लोगों को इतने गाने आते हैं, जिनके घर में बूढ़े बुजुर्ग होते हैं उन परिवारों में अभी भी ये गीत गाए जाते हैं।” गाली गाने की परंपरा भी कुछ ही घरों तक सीमित रह गई है। इसमें शादी के समय वधू पक्ष की महिलाएं वर पक्ष के लोगों को शादी के बाद खाना खिलाते समय गाली देकर गाने गाती थीं, जो शुभ माना जाता था।

अब शादी ब्याह में इन गीतों की जगह लोग फिल्मी गीतों को ज्यादा पसंद करते हैं। समारोहों में गाए जाने वाले देवी गीत और बन्ना-बन्नी के गाने फिल्मी गानों के तर्ज पर गाए जाते हैं। ‘मंडप के आरी आरी झूमें लरिया ए जी’ गाने की पंक्ति गुनगुनाती हुई सुनीता तिवारी (26 )बताती हैं, “ये गाने फिल्मी गाने के तर्ज पर है। आजकल ज्यादातर गाने जो नई पीढ़ी के लोग गाते हैं वो फिल्मी गानों पर ही बने हैं।”

जहां एक ओर पांरपरिक गानों की जगह फिल्मी गानों ने ली वहीं दूसरी ओर डीजे ने भी मनोरंजन के साधनों में विशेष बदलाव किया है। हाल ही में हुए अमित मौर्या (26) ने अपनी बहन की शादी में डीजे बुक कराया था क्योंकि ससुराल वालों की मांग थी कि बाराती डांस करेंगे। नये-नये फिल्मी गाने जैसे ही आते हैं हर डीजे वाले इसे अपनी लिस्ट में शामिल कर लेते हैं। बाराबंकी के माती बाजार के अमित म्यूजिक एंड डीजे कंपनी के मालिक आलोक कुमार बताते हैं, “अब तो गाँव में भी लोग हर छोटे-मोटे कार्यक्रमों में डीजे लगवाते हैं। यहां भोजपुरी गानों की मांग ज्यादा रहती है और जो भी नये गाने आते हैं वो बजना शुरू हो जाते हैं।

गाँवों में बदलते मनोरंजन के साधनों और विलुप्त होते पारंपरिक गीतों का कारण बताते हुए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की समाजशास्त्री डॉ. सुष्मिता सिंह बताती हैं, “बदलते समय और आधुनिकीकरण ने गाँव और शहर के बीच की दूरियां कम कर दी हैं। गाँव में भी अब लोग डीजे और म्यूजिक सिस्टमों पर गाने बजाकर थिरकने लगे हैं।’’ वो आगे बताती हैं “हां पहले दिन भर मंगल गीत गाए जाते थे अब एक दो गाने गाकर म्यूजिक सिस्टम चला दिया जाता है क्योंकि सब वही पसंद करते हैं। ”

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