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बुंदेली महिलाओं की हमने सुनी कहानी थी

चित्रकूट/बांदा। रोज तड़के जंगलों में जाकर लकड़ी लाना, उन्हें बेचने के लिए ट्रेन से शहर जाना वहां से राशन लाना, मनरेगा व खेतों में काम, तेंदू पत्ते लाकर बीड़ी बनाना, ये है 80 लाख से अधिक बुंदेली महिलाओं की रोज की जि़ंदगी। 

चित्रकूट से करीब 25 किमी दूर मानिकपुर ब्लॉक के बहिलपुरवा रेलवे स्टेशन पर दोपहर 3.30 बजे काफी संख्या में महिलाएं पैसेन्जर ट्रेन से उतर कर शहर से खरीद कर लाए गए सामान को सिर पर रख कर अपने घर की ओर चल पड़ती हैं। स्टेशन के पास के गाँव करका पड़रिया में रहने वाली सावित्री ने बताया, “हम शहर लकड़ी बेचने गए थे। वहां से वापस आ रहे हैं, बाजार से राशन भी लेकर आ रहे हैं।”

बीहड़ों और जंगलों के आसपास गाँवों में रहने वाली महिलाओं की दिनचर्या सुबह चार बजे शुरू हो जाती है। गाँव की सभी महिलाएं एक साथ जंगलों में लकड़ी काटने के लिए निकलती हैं। वहां से 10 बजे तक लकड़ियां लेकर वापस आना होता है।

“लकड़ी लाने के लिए हमें 15 से 20 किमी पैदल जाना पड़ता है। एक साथ इसलिए जाते हैं कि रास्ता न भूल जाएं। दूसरे दिन ट्रेन में लकड़ी लादकर शहर में बेचने जाते हैं। हम इसलिए जाते हैं क्योंकि टिकट नहीं लेना पड़ता, आदमी लोगों को दिक्कत होती है।” सावित्री ने बताया, “एक गट्ठर लकड़ी के हमें 100 रुपये मिल जाते हैं। इससे राशन आ जाता है।” सावित्री के बगल खड़ी सुनीता अपने बच्चे को चुप कराते हुए कहा, “शादी के पहले भी यही करते थे, शादी के बाद भी यही कर रहे हैं।” 

इस संघर्ष के बीच कुछ महिलाएं नई राह भी तलाश रही हैं। चित्रकूट से 75 किमी दूर बांदा के बिसंडा ब्लॉक के बाघा गाँव की कौशल्या आईटीआई में अपनी बेटी के साथ सिलाई-कढ़ाई सीख रही हैं। “हमारे पास दो बीघा खेती थी, पति को टीबी थी, इलाज में खेत और गहने बिक गए। यहां से छूटने के बाद सड़क किनारे मजदूरी के लिए फावड़ा चलाना पड़ता है।” पल्लू से घुचघुचा आए आंसुओं को पोंछते हुए कहा, “दो बेटियां हैं, उन्हें पूरा पढ़ाना चाहते हैं। यहीं से हमारी एक लड़की पॉर्लर सीख रही है। जब अच्छे से काम सीख जाएंगे तो कुछ अपना काम शुरु करेंगे।”

बांदा के आईटीआई संस्थान में कई ऐसी महिलाएं हैं जो छोटे बच्चों को अपने साथ लेकर आती हैं सिलाई-कढ़ाई सीखने। इस उम्मीद में कि ज़िंदगी कुछ बेहतर हो जाए। 

“हमारी कोशिश है कि ब्यूटी पार्लर या सिलाई कढ़ाई का कोर्स करने के बाद इन महिलाओं का पॉर्लर या बुटीक खुलवाने में उनकी मदद करें। ताकि ये कुछ बेहतर कमा सकें।” बांदा आईटीआई में काउंसलर शालिनी जैन कहती हैं। उधर, शाम करीब चार बजे फिर चित्रकूट में बहिलपुरवा रेलवे स्टेशन पर कुछ महिलाएं अपने गट्ठरों के साथ ट्रेन के इंतजार में हैं। जो दो दिन पहले जंगलों के लिए निकली थीं। वह तेंदू पत्ता लेकर जा रही हैं। जो बीड़ी बनाने के काम आता है। 

गट्ठर की टेक लेकर बैठी चंदा को मऊरानीपुर जाना है। वह कहती हैं, “हम पत्ता तोड़ कर ले जाते हैं, तम्बाकू और धागा कंपनी देती है। घर से बीड़ी बना कर देते हैं। एक दिन में करीब 40 रुपये की बीड़ी बना लेते हैं। पूरा गाँव यही करता है।” चंदा ने आगे कहा, “यह काम हम ही लोग करते हैं। आदमियों के लिए खतरा है। उन्हें पुलिस पकड़ लेती है। बिना टिकट चलना पड़ता है। अगर टिकट लेंगे तो उसी भर का होगा। इसके अलावा घर के कई काम हैं, रात 10 बजे पानी के लिए लाइन लगाते हैं, तो कहीं 12 बजे नंबर आता है।” 

चंदा के बगल में बैठी कोसाबाई (55 वर्ष) कहती हैं, “जब से शादी हुई है यही काम कर रहे हैं। पत्ते जब तक मिलते हैं तो तोड़ लेते हैं, नहीं तो जंगलों के किनारे गाँवों के लोगों से खरीद के ले आते हैं।”