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ठेकेदार के डर से अपने बच्चे को स्तनपान नहीं करा पातीं महिलाएं

ललितपुर। मजदूरी करने वाली कमला का बच्चा कुपोषित है और वह चाह कर भी उसे स्तनपान नहीं करा पाती। क्योंकि उसे डर है अगर ठेकेदार ने देख लिया तो काम से हटा न दे।  

“हम अपने मन को मार कर काम करते रहते हैं, डर रहता है कि अगर काम के बीच में बच्चे के पास चले गए तो मालिक अगले दिन काम पर नहीं रखेगा, या पैसे काट लेगा। अब बच्चे की चीख न सुनें तो शाम का चूल्हा कैसे जलेगा।” ललितपुर से 65 किमी दूर बजरंगगढ़ गाँव में रहने वाली कमला (25 वर्ष) बताती हैं। कमला जैसी बुंदेलखंड की लाखों मजदूर महिलाओं को कष्ट है अपने बच्चे को अच्छे से स्तनपान न करा पाने का। इससे बच्चे कुपोषित रहते हैं।

ललितपुर जिला अस्पताल के अनुसार मई, 2016 में कुल 40,310 महिलाएं गर्भवती हुईं। इसमें से 2641 महिलाओं में खून की कमी पाई गई और 11,610 बच्चे कुपोषित मिले।

ललितपुर के मडावरा ब्लॉक से 18 किलोमीटर दूर पश्चिम में पहाड़ी खुर्द गाँव में रहने वाली कस्तूरी (27 वर्ष) के डेढ़ साल के बेटे दिव्यांश का वजन छह किलो है। इसी गाँव की ममता सहरिया (28 वर्ष) का दो साल का बेटा रविन्द्र सात किलो का है। दोनों कुपोषित हैं। ममता बताती हैं, “जो मिलता है वही खाकर काम पर निकल जाते हैं, अगर हम अपने बच्चों का ध्यान देंगे तो फिर काम नहीं कर पाएंगे।” 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में तरकरीबन पांच महिलाओं की प्रति घंटे प्रसव के दौरान मौत हो जाती है। देश में हर साल 45,000 महिलाओं की प्रसव के दौरान मौत हो जाती है। दुनिया भर में प्रसव के दौरान होने वाली मौतों में से 17 फीसदी अकेले भारत में हैं। इसका सबसे बड़ा कारण एनीमिया, ज्यादा खून बहना और संक्रमण है।

“वैसे तो स्तनपान कराने को लेकर महिलाएं जागरुक हैं, कुछ एक अति पिछड़े ब्लॉक हैं वहां महिलाएं काम की वजह से स्तनपान नहीं करा पाती हैं,” ललितपुर के मुख्य चिकत्सा अधिकारी डॉ. प्रताप सिंह ने कहा। 

“सहरिया आदिवासी महिलाओं की मजबूरी है मजदूरी करना, पिछले 10 साल से आशा बहू हूं, कुपोषित बच्चे तो मिले देखने को मिले, लेकिन महिलाएं नहीं मिलीं। यहाँ के लोगों का खानपान सही नहीं है जो मिलता है रूखा सूखा खा लेते हैं। काम के चलते बच्चों की ज्यादा देखभाल नहीं कर पातीं। हमे जैसे ही कुपोषित बच्चों के बारे में पता चलता है, हम तुरंत उन्हें एडमिट कराते हैं।” ललितपुर जिले के मडावरा ब्लॉक के पहाडी खुर्द गाँव की आशा बहू उर्मिला सहरिया (25) कहती हैं।

“हर महीने आशा बहुओं और आगनबाड़ी कार्यकत्रियों को प्रशिक्षण दिया जाता है, पूरे महीने इन लोगों ने क्या काम किए हैं, उसकी हम एक रिपोर्ट तैयार करते हैं, किस गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के यहाँ यह कितनी बार गई हैं।” ललितपुर में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के डिस्ट्रक्ट कम्युनिटी प्रोसेसिंग मैनेजर विजय सिंह कहते हैं।