"गांव में तो बिटिया बस बूढ़े बच रह गए, सबरे निकल गए शहर को..."

दो रिपोर्टर, एक दुपहिया, एक यात्रा। थोड़ी यायावर, थोड़ी पत्रकार बनकर गाँव कनेक्शन की जिज्ञासा मिश्रा और प्रज्ञा भारती ने बुंदेलखंड में पांच सौ किलोमीटर की यात्रा की और महिलाओं की नज़र से उनकी ज़िन्दगी, मुश्किलों और उम्मीदों को समझा।

Update: 2019-05-21 17:55 GMT

भाग 1:

"अपनी ज़िन्दगी बेहतर करने के लिए मैंने अपना घर (भोपाल) छोड़ा लेकिन बुन्देलखंड के इन गांवों में मैंने देखा कि लोगों को अपना घर इसलिए छोड़ना पड़ा क्योंकि वहां कोई रोज़गार नहीं है। अगर लोगों को अपने गाँव में ही काम मिले तो उन्हें घर नहीं छोड़ना पड़ेगा।"

लोखरिहा (मध्य प्रदेश) व अतर्रा (उत्तर प्रदेश)।

गाँव में मिट्टी के एक टीले पर आठ महिलाएं सर पर पल्ला रखे बैठी थीं और शहर से आई रिपोर्टर को ग्रामीण भारत की करोड़ों महिलाओं का एक शाश्वत सत्य बता रही थीं।

"अब तो मुश्किल है कि वो कभी वापस आएं," हलके हरे रंग की साड़ी पहने, पानी भरने के लिए प्लास्टिक का डब्बा लिए एक महिला ने कहा। महिला अपने बेटों के बारे में कह रही थीं जो रोज़गार नहीं होने के कारण गाँव से शहर चले गए थे।

मुझे माँ याद आ गयीं। अपना घर छोड़ना और शायद कभी वापस न जा पाना याद आ गया।

बुंदेलखण्ड क्षेत्र के लगभग सभी गाँव में इस तरह के खाली घर देखने को मिले। फोटो- प्रज्ञा भारती

हम मध्य प्रदेश के सतना जिले के एक गाँव में थे। उतर प्रदेश के चित्रकूट शहर से सुबह-सुबह अपनी स्कूटी पर निकले और बाईस किलोमीटर दूर लोखरिहा गाँव पहुंचे थे। चित्रकूट मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश की बॉर्डर पर बसा एक जिला है जो कि आधा-आधा दोनों राज्यों में है। मझगवाँ तहसील में पड़ने वाले लोखरिहा गाँव पहुंचते ही हमें पाइप से आ रहे पानी को प्लास्टिक के अलग-अलग रंगों के डब्बों में भरती औरतें मिलीं।

मझगवाँ- 

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अधिकांश के पति दूर शहरो में थे, वर्षों से।

"गांव में तो बिटिया बस बूढ़े बच रह गए हैं, सबरे निकल गए शहर को," साठ-पैंसठ साल की एक महिला ये कहने के बाद चुप हो गयीं। उनके पति गुज़र गए हैं और बेटा कोलकाता में मज़दूरी करता है। उसके बारे में पूछने पर उन्होंने जवाब नहीं दिया, बस शून्य में ताकने लगीं।

लगभग हर गाँव में हमें यही देखने को मिला कि घरों में केवल बूढ़े रहते हैं। फोटो- प्रज्ञा भारती

एक और महिला ने बताया कि उनके दो बेटे हैं, एक दिल्ली और एक कोलकाता में। वहां से कभी 100, 150 तो कभी 200 रुपए भेज देते हैं -- और वो शायद ही कभी वापस आएं।

ये बात मुझे तीन साल पीछे ले गयी। बात तब की है जब मैं ग्रेजुएशन के दूसरे साल में थी। छुट्टियां थीं तो घर गई हुई थी। मुझे कुछ बर्तन लेने थे तो भाई को बोला कि ले आए। जब वो लेकर आया तो मां बैठ कर देख रही थीं, चाय बनाने के भगोने को देख कर बोलीं, "ये इतना बड़ा क्यों ले आए हो? क्या करेगी ये इसका?" पापा ने कहा, "ठीक है काम पड़ता रहता है, काम ही आएगा, खराब तो होगा नहीं।" बात बढ़ने लगी तो मैंने कहा, "मम्मी क्यों परेशान हो मैं ले कर तो घर ही आऊंगी कौन सा कहीं छोड़ दूंगी।" इस पर भाई तपाक से बोला, "अब तो तू ही वापस आ जाए बड़ी बात है, इसे क्या लेकर आएगी?"

घरों में चिड़ियों का घोंसला, चूहे और केवल बागड़ रह गई है। फोटो- प्रज्ञा भारती

पांच साल हो गए हैं मुझे घर से बाहर आए हुए और इन सालों में त्यौहारों को छोड़ दिया जाए तो शायद ही मैं घर गई हूं!

वापस न आना बुंदेलखंड की सबसे कड़वी सच्चाई है।

मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के लगभग चौदह जिलों को समेटे बुंदेलखंड क्षेत्र शहरी, विकसित दुनिया से बहुत दूर लगता है। पलायन यहाँ लगभग हर परिवार का सच है, और पलायन के मुख्य कारण हैं पानी की कमी और बेरोज़गारी।

इस क्षेत्र की मुख्य भाषा बुन्देली है। इसे बुन्देलखंडी भी कहा जाता है।

बुंदेलखण्डी भाषा को जानने के लिए ये गीत आप सुन सकते हैं- 

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बुंदेलखंड क्षेत्र में हर साल सूखा पड़ता है। साल 2010 के बाद से लगातार सामूहिक पलायन, किसानों की आत्महत्या और महिलाओं को गिरवी रखने की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है

इस इलाके में पीने का पानी खोजना बड़ी जद्दोजहद का काम है। सतना जिले से पन्ना जाने के रास्ते में एक गाँव है महकोना। यहां की औरतें हर दिन आधे से ज़्यादा समय पानी भरने में खर्च कर देती हैं।

पानी भरने के लिए महकोना गाँव से लगभग एक किमी दूर हैंडपम्प पर लाइन लगा कर अपनी बारी का इंतज़ार करती महिलाएं। फोटो- जिज्ञासा मिश्रा

अपनी यात्रा में हम चित्रकूट, उत्तर प्रदेश से बढ़ते हुए छोटा लोखरिहा, बड़ा लोखरिहा, मझगवां गांव होते हुए सतना शहर की ओर बढ़े। सतना से महकोना गांव होते हुए पन्ना गए और वहां से वापस उत्तर प्रदेश राज्य के बांदा जिले की तहसीलों और गांवों में गए। इन सभी गांवों में पलायन नज़र आया। औरतें घर का काम करती हैं, बच्चे भटकते रहते हैं। जो लोग गांव में हैं भी वो दिन भर कुछ नहीं करते, उनके पास कोई काम नहीं है।

मह्कोना - 

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राज्य की सीमा के इस पार, उत्तर प्रदेश के बांदा शहर से लगभग 34 किमी दूर अतर्रा नाम की तहसील शुरू हो जाती है। अतर्रा तहसील में गाँव के गाँव पलायन के बाद ख़ाली हो गए हैं. कुछ बूढ़े लोग और औरतें ही बची हैं घरों में। यहां पहले चावल की मिलें चला करती थीं जिन में लगभग पांच से छह हज़ार लोग काम करते थे। मिलों के बंद होने के कारण उनके पास काम नहीं बचा और उन्हें पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

अतर्रा - 

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गाँवों से लाखों लोग रोज़गार के लिए शहर जा रहे हैं। भारत की आखिरी जनगणना (2011) के मुताबिक देश में 14.7 प्रतिशत लोग रोज़गार के लिए पलायन कर चुके थे – यानि 1.44 करोड़ लोग। ये संख्या रोज़ाना बढ़ रही है। भारत सरकार के इकॉनमिक सर्वे 2017 (आर्थिक समीक्षा) के मुताबिक वर्ष 2011 से 2016 के बीच हर साल औसतन लगभग 90 लाख भारतीय अपना घर छोड़ कर किसी और शहर में पलायन कर गए।

एक समय अतर्रा को 'धान का कटोरा' कहा जाता था। बड़ी-बड़ी चावल की मिलें यहां थीं। अब वो सिमटकर एक झोपड़ी भर की रह गई हैं। फोटो- प्रज्ञा भारती

सेन्टर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी के मार्च के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर सौ मजदूरों में से सात बेरोजगार हैं और ये प्रतिशत पिछले कुछ पर्षों से हर साल बढ़ता रहा है।

शहरों में रोज़गार के रास्ते बंद हो जाने के कारण कुछ परिवार गाँव वापस भी आ रहे हैं। पन्ना से सात किमी दूर मांझा गाँव के तमसानगर मोहल्ले में माया यादव, उनके पति, दो बेटे और दो बेटियां गाँव से हिमाचल प्रदेश राज्य के सोलन जिले की नालागढ़ तहसील के बद्दी शहर में डिब्बे बनाने वाली एक कंपनी में काम करने चले गए थे लेकिन एक साल काम कर के वापस आ गए। अब चाय की दुकान चलाते हैं।

मांझा - 

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हमने उनकी दुकान में चाय पी। चाय अच्छी थी। बातें चल पडीं तो उन्होंने अपनी बेटियों को बुलवा कर हमसे मिलवाया। उनकी बड़ी बेटी ने पढ़ाई छोड़ दी है। छोटी बेटी प्रियंका यादव सेना में जाना चाहती है।

तमसानगर से थोड़े आगे हम मांझा गाँव पहुंचे। यहां लगभग 25 परिवार रह गए हैं। गाँव के सामने निकलने वाले रास्ते पर खाने पीने की दुकान लगाने वाली केशकली यादव कहती हैं,

"सब काम बंद है। खदान वगैरह चलती थीं तो आदमियों (लोगों) का खर्चा पानी चलता था। अब कच्छु काम नई है। यहां के लोग कछु नई करत, जै फिर रए फालतू। बाहर भग गए कच्छु लोग, कच्छु जने अबे अपनी मुसीबत काट रए। औरतें कछु न कर रईं, पड़ी रहत हैं घरों में।" (मांझा में पहले कोयले और हीरे की खदाने थीं। ये खदाने जंगल की ज़मीन पर हैं कह कर उन्हें सरकार ने बंद कर दिया तब से वहां कोई काम नहीं रह गया है।)

मह्कोना जाने के रास्ते में एक साथ बैठी औरतें मिलीं। फोटो- प्रज्ञा भारती

गाँव में मिली महिलाओं की बातों ने मुझे एहसास कराया कि हम बेहतर शिक्षा और रोज़गार के अवसरों के लिए अपना घर छोड़ते हैं. कई बार हम घर से दूर रहना चाहते हैं इसलिए भी घर से बाहर निकलने की कवायद करते हैं पर उस गाँव के लोगों को इसलिए अपना घर छोड़ना पड़ा क्योंकि वहां कोई रोज़गार नहीं है। अगर लोगों को अपने गाँव में ही काम मिले तो उन्हें घर नहीं छोड़ना पड़ेगा।

केशकली यादव से बात कर हम जल्द ही अगले पड़ाव के लिए निकल पड़े, एक और गाँव की और, नए लोगों की कहानियां जानने, लेकिन मन में लोखरिहा गाँव की उस माँ की बात रह गयी थी, "गाँव छोड़ कर जाने वाले कभी वापस नहीं आ पायेंगे" - और अपने भाई की यही बात जो कभी उसने मेरे लिए कही थी।

उम्मीद है दोनों लोग कभी गलत साबित हों। 

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