डेयरी और पोल्ट्री से कमाई करनी है तो इन 3 बातों का ध्यान रखें...

Arvind ShuklaArvind Shukla   26 Jun 2018 6:05 AM GMT

नई दिल्ली। आमदनी आज के दौर में किसानों और पशुपालकों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है। लेकिन हम खुद आमदनी के बढ़ाने के लिए क्या करते हैं, पूछने पर ज्यादातर किसान और पशुपालक रटारटाया जवाब देते हैं, "हमें यही पता था, हमने वही किया।" लेकिन कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाले लोग कहते हैं हम बदलाव की जरुरत है।

कहा जाता है जब खेती से आपेक्षित मुनाफा न मिले तो पशुपालन से पैसा कमाना चाहिए। लेकिन उसके लिए जरुरी है हम जो गाय-भैंस या बकरी पाल रहे हैं उन पर पूरा फोकस करें। पशुओं की अच्छी देखभाल करें और उन्हें अच्छा चारा-पानी दें। हरियाणा के सुल्तान भैंसे के बारे में देश अक्सर चर्चा होती है, चर्चा उसकी करोड़ों रुपए की कीमत और हर साल होने वाली लाखों रुपए कीमत को लेकर होती है। लेकिन अगर इस भैंसे के मालिक कैथल जिले के बूढाखेडा गांव के नरेश बेनिवाल से पूछिए वो अपने बच्चों की तरह इसकी सेवा करते हैं।

नरेश बेनिवाल बताते हैं, "सुल्तान की रोजाना की खुराक पर करीब 2500 रुपए रोज खर्च होते हैं। सुबह शाम टहलाता हूं और साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखता हूं।" कहने का लब्बेलुआब ये है कि पशुओं से कमाना है तो उनकी सेहत का पूरा ख्याल रखें, जो पशु चारे-पानी, दवा और रखरखाव का ध्यान रखते हैं वो दूध, मांस और अंडे हर तरह से कमाई करते हैं।

सुल्तान की रोजाना की खुराक पर करीब 2500 रुपए रोज खर्च होते हैं। सुबह शाम टहलाता हूं और साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखता हूं। तब जाकर उससे कमाई होती।
नरेश बेनिवाल, मालिक सुल्तान (भैंसा) हरियाणा

नरेश बेनिवाल का भैंसा।

पिछले 40 वर्षों से पशुओं पर काम कर रहे विशेषज्ञ मोहन जे सक्सेना बताते बताते हैं, " दुनिया भर में जितने पशु हैं, उनमें से आधे हमारे देश में है। दूध उत्पादन में भी भारत अव्वल है, लेकिन जितने पशु हैं उस अनुपात में दूध नहीं होता। जिसकी वजह है, उनका सही से ध्यान न रखा जाना। यही हाल गाय-भैंस के अलावा दूसरे पशुओं का भी है।"

मोहन जे सक्सेना की बातों पर गौर करना है तो देश के किसी गांव जाकर देखिए। कुछ जागरुक पशु पालकों और डेयरी वालों को छोड़ दिया जाए तो बाकी लोग पशुओं को खास तवज्जो नहीं देते। रुखा सूखा चारा और गंदगी के बीच रखना पशुओं की नीयत सा लगता है। जिसके चलते पशु कुपोषण और बीमारियों का शिकार हो जाता है। इनमें से कुछ बीमारियां जैसे गलाघोंटू, खुरपका, मुंहपका, थनैला, पोकनी, झेर का रुकना आदि इतनी गंभीर है कि पशु की जान जा चली जाती है, क्योंकि इनका वक्त पर टीकाकरण नहीं होता है।

हमारी कोशिश जनचेनता के माध्यम से ऐसी प्रणाली विकसित करने की है कि पशु बीमार ही न हो। इसलिए जरुरी है वैज्ञानिक विधि से पशुपालन, 1- आहार अच्छा हो, 2- पशु स्वस्थ हो और तीसरा साफ सफाई।
मोहन जे सक्सेना, एमडी, आयुर्वेट और पशुधन विशेषज्ञ


पशुओं के लिए आयुर्वेदिक दवाएं बनाने वाली कंपनी आयुर्वेट के प्रबंध निदेशक मोहन जे सक्सेना किसानों को जागरुक करने पर जोर देते हुए कहते हैं, "पशुओं में दो तरह की समस्याएं प्रमुख हैं। एक वो बीमारियां जो विषाणुओं से होती हैं जैसे खुरपका-मुंहपका आदि, जबकि दूसरी वो समस्याएं होती हैं जो पशु को सही ध्यान न रखने पर होती हैं। इसलिए हमारी कोशिश जनचेनता के माध्यम से ऐसी प्रणाली विकसित करने की है कि पशु बीमार ही न हो। इसलिए जरुरी है वैज्ञानिक विधि से पशुपालन, 1- आहार अच्छा हो, 2- पशु स्वस्थ हो और तीसरा साफ सफाई।'" (देखिए वीडियो)

मोहन जे सक्सेना।

इसके साथ ही पशु का अच्छी नस्ल का होना और लगातर उसका बच्चे देना भी जरुरी है। इसका भी सीधा संबंध पशुओं की सेहत से है। कमजोर पशु के गर्भाधान में दिक्कत आती है तो बच्चे देने के बाद वो पर्याप्त दूध नहीं देती है। ऐसे में जैसे मनुष्यों के फूड सप्लीमेंट हैं वैसे ही पशुओं के लिए कई कंपनियां अच्छे चारे और उनकी सेहत से जुड़ी दवाइयां बना रही हैं। इनमें भी औषधीय दवाइयों की मांग तेजी से बढ़ी है। (देखिए वीडियो)

दुनियाभर में फूड सेफ्टी को लेकर जागरुकता तेजी से बढ़ी है। आयुर्वेट पिछले 25 वर्षों से देसी-जड़ी बूटियों अश्वगंधा, तुलसी और लहसुन आदि से दवाएं बना रहा है, इनका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता।
सुनील कुमार मारवाह, सेल्स और मार्केटिंग हेड, आयुर्वेट


पिछले 25 वर्षों से पशुओं के लिए आयुवैदिक दवाइयां बना रही डाबर ग्रुप की कंपनी आयुर्वेट के सेल्स और मार्केटिंग हेड सुनील कुमार मारवाह बताते हैं, "दुनियाभर में सेफ फूड को लेकर जागरुकता तेजी से बढ़ी है। लोग सेहतमंद खाना चाहते हैं, चाहे वो दूध मांस हो या अंडा। विदेशों में ये जागरुकता काफी है लेकिन भारत में भी लोग सचेत हुए हैं। आयुर्वेट पिछले 25 वर्षों से लहसुन, अश्वगंधा और तुलसी आदि जड़ी बूटियों दवाएं बना रहा है जो सदियों से भारत में इस्तेमाल की जा रही है, जिनका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता।'


अपनी बात सरल करते हुए मारवाह कहते है,"पोल्ट्री ऐसा बिजनेस है, जिसमें काफी एंटीबायोटिक का इस्तेमाल होता है, डेयरी आदि में केमिकल का इस्तेमाल होता है जो हमारी सेहत के लिए अच्छा नहीं। इसीलिए हम ऐसे प्रोडक्ट बनाते हैं पशु को तो सेहतमंद रखे हीं उसके दूध या दूसरे प्रोडक्ट का इस्तेमाल करने वाले भी स्वस्थ रहें।"


पशुओं का सेहतमंद और अच्छा खाना-पानी हमारे लिए इसलिए जरुरी है क्योंकि वो सीधे हमारी सेहत पर असर डालता है। पिछले दिनों ही 'सेंटर फॉर डिजीज डायनैमिक्स, इकनॉमिक्स एंड पॉलिसी के वाशिंगटन डीसी और नई दिल्ली के डायरेक्टर, रामानन लक्ष्मीनारायण की अगुवाई में किए गए एक अध्ययन में बताया गया है कि भारतीय पोल्ट्री फार्म में एंटीबायोटिक्स को चूजों को बढ़ाने और बीमारी से दूर रखने के लिए नियमित तौर पर दिया जा रहा है। पोल्ट्री फार्मों में प्रयोग होने वाली एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल में भारत मौजूदा समय में चौथे स्थान पर है। अगर पोल्ट्री उद्योग मंव ऐसे ही अंधाधुंध एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल होता रहा तो वर्ष 2030 तक भारत एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल में पहले पायदान पर होंगे।

दूध उत्पादन में नंबर एक है भारत।

ये भी पढ़ें- मोहन जे सक्सेना का इंटरव्यू : 'डेयरी से कमाना है तो दूध नहीं उसके प्रोडक्ट बेचिए'


पोल्ट्री उद्योंग में भारत तेजी से बढ़ रहा है, जो अच्छी ख़बर है लेकिन हमें सेहत के स्तर पर और जागरुक होने की जरुरत है। यही हाल डेयरी में भी है। लेकिन थोड़ी सी सावधानी और पशुओं की खानपान और सेहत का ख्याल रखकर इन्हें दूर किया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश में पशुपालन विभाग के उपनिदेशक डॉ. वीके सिंह कहते हैं, "हमारे पशुपालक पशुओं की उतना ख्याल नहीं रखते। अब पेट के कीड़ों का ही ले लो, कई पशुओं को इससे मौत हो जाती है, जबकि इसका असर दूध उत्पादन पर पड़ता है। ये समस्या दुधारु पशुओं के सड़ा-दला खाने और पोखर तालाब का गंदा पानी पीने से होती है, अगर सही समय पर इनका इलाज हो जाए तो पशु को बचाया जा सकता है।"

सुनील कुमार मारवाह (हल्की नीली शर्ट में)

आयुर्वेट के सुनील मारवाह आगे बताते हैं, " ये अच्छी बात है कि आज कल पशुपालन में युवा और पढ़े लिखे किसान आ रहे हैं जो जागरुक हैं और इसे कारोबार की तरह कर रहे हैं। वो अच्छा चारा खिलाते हैं, पशुओं को फूड सप्लीमेंट देते हैं और वो सारे उपाय करते हैं जिससे उनकी आमदनी बढ़ें।"
वो उदाहरण देते हुए कहते हैं, "देखो दूध की डिमांड तेजी से बढ़ रही है, और उसके लिए चारा बहुत जरुरी है। लेकिन जमीनें कम हो रही हैं। ऐसे में आयुर्वेट के हाइड्रोपोनिक मशीने बनाई हैं, जहां एक छोटे से कमरे में बिना जमीन के, बिना किसी पेस्टीसाइड और केमिकल के इस्तेमाल किए अच्छा और सेहतमंद चारा रोजाना तैयार किया जा सकता है।"

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