पशुपालक तीन महीने में एक बार तीन रूपए खर्च करके बढ़ा सकते हैं मुनाफा

पशुओं के सड़ा-गला खानें या पोंखर- तालाब का या फिर गन्दा पानी पीने आदि कारणों से पशुओं के पेट में कीड़े पड़ जाते है, जिसका सीधा असर पशु के उत्पादन पर पड़ता है। कभी-कभी पशुओं की मौत भी हो जाती है।

Diti BajpaiDiti Bajpai   14 July 2018 11:01 AM GMT

पशुपालक तीन महीने में एक बार तीन रूपए खर्च करके बढ़ा सकते हैं मुनाफा

खैराबाद (सीतापुर)। सरला देवी (30 वर्ष) को अब पता है कि उन्हें तीन-तीन महीने पर अपने पशु को पेट के कीड़े की दवा देनी है और दवा देने से कितना मुनाफा होगा इसके बारे में भी पूरी जानकारी है।

छोटे पशुपालकों को उन्नत तरीके से पशुपालन करने और उनकी आमदनी बढ़ाने के लिए हेस्टर और गाँव कनेक्शन ने एक मुहिम शुरू की है। इसमें उत्तर प्रदेश के दस जिलों के गाँवों में पशु चौपाल का आयोजन किया जा रहा है। इस चौपाल में छोटे पशुपालकों को पशुओं के टीकाकरण से लेकर उनके पोषण की पूरी जानकारी दी जा रही है।

सीतापुर जिले के खैराबाद ब्लॉक के मुलाहिमपुर गाँव में पशु चौपाल का आयोजन किया गया। "हमको जानकारी नहीं थी कि बकरियों के भी पेट में कीड़े होते है। जो दवा मिली है उसको तो पशुओं को देंगे। अगर हर महीने ऐसे जानकारी मिलती रहे तो हमारे लिए आसानी हो जाए। गाँव में डॉक्टर भी नहीं आते है।" पशु चौपाल में आई सरला देवी ने बताया। मुलाहिमपुर गाँव में लगभग सभी महिलाएं बकरी पालन करती है लेकिन जानकारी के अभाव के कई बार उनको नुकसान उठाता पड़ता है। इसी नुकसान को कम करने के लिए इस मुहिम की शुरूआत की गई है।


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"जब बकरियां चरने के लिए जाती हैं तो जो पत्तियों और घास में कीड़े होते है वो चरते-चरते उनके पेट में चले जाते है। जब पेट में चले जाते है तो आप वह कुछ भी चर के आए उनके शरीर को नहीं लगता है इससे उनका वजन नहीं बढ़ता है, जिससे पशुपालकों को काफी नुकसान होता है।" सीतापुर में आयोजित कार्यक्रम में पशुपालकों को जानकारी देते हुए हेस्टर के सीनियर एरिया सेल्स मैनेजर लालजी द्विवेदी ने बताया, "अगर पशुपालक तीन महीने में तीन रूपए खर्च करके अपने पशु को फेनसेफ आई दवा तो वह इस नुकसान से बच सकता है। यह दवा गाभिन पशु को दी जा सकती है।"

पशुओं के सड़ा-गला खानें या पोंखर- तालाब का या फिर गन्दा पानी पीने आदि कारणों से पशुओं के पेट में कीड़े पड़ जाते है, जिसका सीधा असर पशु के उत्पादन पर पड़ता है। कभी-कभी पशुओं की मौत भी हो जाती है। पशु के गोबर की जांच से ही पेट के कीड़ों की जानकारी मिलती है। यह रोग बड़े पशुओं को और छोटे पशुओं का होता हैं । इस रोग से ग्रस्त पशु चारा- दाना तो बराबर खाता- पीता रहता है, लेकिन उसका शरीर नहीं पनपता हैं। इसके लक्षण है वो मिट्टी खाने लगता है और उसको मैटमेले रंग के बदबूदार दस्त आने लगते है।


पशुओं में टीकाकरण कराना बहुत जरूरी है क्योंकि टीकाकरण पशुओं की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करता है। कार्यक्रम में मौजूद सीतापुर जिले के कृषि विज्ञान केंद्र के पशु वैज्ञानिक डॉ आनंद सिंह ने बताया, "सरकार द्ववारा निशुल्क टीकाकरण किया जाता है। टीकाकरण पशुओं को संक्रामक रोगों से भी बचाता है साथ ही पशु स्वस्थ रहता है पशुओं के उत्पादन में भी वृद्धि होती है।"

कार्यक्रम में मुलाहिमपुर गाँव के ग्राम प्रधान भी मौजूद रहे। सीतापुर जिले के कटिया के केवीके में मृदा वैज्ञानिक डॉ सचिन प्रताप सिंह तोमर ने बताया, "पशुपालक सही समय पर पशुओं टीकाकरण उनके रख-रखाव पर ध्यान दें तो कम लागत मे अच्छा मुनाफा कमा सकते है।"

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पशुओं का वजन बढ़ानें के लिए दे प्रोटीन-सी

हेस्टर के सीनियर एरिया सेल्स मैनेजर लालजी द्विवेदी ने बताया, "बकरियों में कई बार वजन न बढ़ने की समस्या आती है जबकि पशु चरने भी जाता है। ऐसे में

बड़े पशुओं को 100 एमएल और बकरियों को 15 से 20 एमएल प्रोटीन सी देना चाहिए।"

गाँव के पशुपालक की समस्या सुलझाने के लिए बने हेस्टर मित्र

मुलाहिमपुर गाँव की विमला देवी और जियाउलहक को हेस्टर मित्र बनाया गया है। "इन मित्रों को कंपनी के द्ववारा टीकाकरण व पशु के पालन-पोषण की ट्रेंनिग दी जाएगी ताकि गाँवों के पशुपालकों को यह जागरूक कर सके। इनको किस बीमारी में कौन सी दवा या घरेलू नुस्खें अपनाएं ये भी बताया जाएगा।" हेस्टर के सीनियर एरिया सेल्स मैनेजर लालजी द्विवेदी ने बताया।






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