हर तीन महीने में पशुओं को दें पेट के कीड़े की दवा, बढ़ेगा उत्पादन

पशुओं के पेट में कीड़े एक बड़ी समस्या है। अगर पशुपालक अपने पशुओं को हर तीन महीने पर पेट के कीड़ें की दवा दें तो पशुपालक के लिए पशुपालन और भी मुनाफे का सौदा होगा।

लखनऊ। ज्यादातर पशुपालक जानकारी के अभाव में पेट के कीड़ें(कृमिनाशन) की दवा नहीं देते है, जिससे पशु का स्वास्थ्य तो कमजोर होता ही है साथ ही पशुपालक को भी आर्थिक नुकसान भी होता है।

"पशुओं के पेट में कीड़े एक बड़ी समस्या है। अगर पशुपालक अपने पशुओं को हर तीन महीने पर पेट के कीड़ें की दवा दें तो पशुपालक के लिए पशुपालन और भी मुनाफे का सौदा होगा। " आजमगढ़ जिले के डीगुंरपुर ब्लॅाक के पशुचिकित्सक अधिकारी डॉ सतीश कुमार यादव ने बताया,"अगर पशु के पेट में कीड़ें है तो उसको जो खिलाया जाता है उसका 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा कीड़ें खा जाते है। अगर दवा देते है तो इस 30-40 प्रतिशत होने वाले नुकसान को बढ़ाया जा सकता है। पशु स्वस्थ्य तभी होता है जब उसका पेट सही होता है पशु जो भी खाये वो पूरा का पूरा उसके शरीर में लगे।"

छोटे और बड़े पशुओं में अंत: परजीवी (अंदरूनी कीड़े) काफी नुकसान पहुंचाते हैं| अंदरूनी कीड़े जैसे फीता कृमि, गोलकृमि, परंकृमि आदि कीड़ें पशु के पेट में रह कर उस का आहार व खून पीते हैं, जिससे पशु कमज़ोर हो जाता है और बहुत सी बीमारियों का शिकार हो जाता है| बकरियों में पेट में कीड़ें होने से उनका वजन नहीं बढ़ता है जिससे पशुपालक को जितना पैसा मिलना चाहिए उतना नहीं मिलता। इसके अलावा दुधारू पशुओं में दूध उत्पादन क्षमता में कमी हो जाती है|

नवजात बच्चों को पेट के कीड़ें की डोस देने के बारे में डॉ सतीश बताते हैं, "ज्यादातर पशुपालक लापरवाही के चलते दवा नहीं देते है, जिससे आगे पशुपालक को आर्थिक नुकसान होता है। इसलिएजब बच्चा पैदा होता है तो उसके 15 दिन के बाद पेट के कीड़ें की दवा देनी चाहिए। दूसरी डोस 15 दिन के बाद बच्चे को देनी चाहिए। यानि हर महीने 15-15 दिन के अंतराल में पशुओं को दो बार कीड़ें मारने की दवा देनी है। और ऐसा सात से आठ महीने तक करना होता है। अगर बच्चों को पेट के कीड़ें के लिए सिरप देते है तो काफी अच्छा होता है।"

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हमारे देश में पशुपालन ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आय का एक बड़ा जरिया है लेकिन जानकारी के अभाव मे और आर्थिक तंगी के कारण पशुपालकों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है। 19वीं पशुगणना के अनुसार भारत में कुल 51.2 करोड़ पशु है जो कि विश्व के कुल पशुओं का लगभग 20 प्रतिशत है। भारत में लगभग 70 फीसदी बकरी और भेड़, सीमान्त और छोटे किसान या भूमिहीन मजदूरों के द्वारा पाली जाती हैं।

"पेट के कीड़ें की दवा के लिए पशुपालकों को भटकना नहीं पड़ता है निकटतम सरकारी पशुचिकित्सालयों में पेट के कीड़ें की दवा निशुल्क उपलब्ध होती है।" बाराबंकी जिले के हैदरगढ़ ब्लॉक के पशुचिकित्सक डॉ योगेश कुशवाहा ने बताया, "पशु के पेट में कीड़ें है तो जितना दूध दुधारू पशु से मिलना चाहिए उस अनुपात से नहीं मिल पाता है क्योंकि जो पशु को खिलाया जाता है उसका आधा हिस्सा कीड़ें खा जाते है, जिससे पशुओं में दूध की क्षमता लगातार घटती जाती है। इन कीड़ों से पशुओं में बांझपन की भी समस्या आती है क्योंकि जिन पशुओं में कीड़ें होते है उनका कम गर्भ ठहरता है या गिर जाता है।"

डॉ कुशवाहा आगे बताते हैं, पशुपालक को इस बात का जरूर ध्यान रखना चाहिए कि हर तीन महीने पर जो वो दवा दे रहा है वो बदल बदल के दें । उदाहरण के लिए अगर पशुपालक ने फेल्बेंडाजोल दवा दी है तो तीन बाद दूसरी कृमिनाशन दवा दें। बार-बार एक दवा इस्तमाल करने से कीड़ें उसके आदी हो जाते है।"

नवजात बच्चों में पेट मे कीड़ें होने से एक वर्ष में आठ प्रतिशत नवजातों की मृत्यु हो जाती है। इस मृत्युदर को कम करने के लिए सरकार द्धारा भी अभियान चलाया रहा है। बच्चों में पेट के कीड़ें की दवा के फायदे के बारे में डॉ सतीश बताते हैं, "दवा देने से बच्चे का शारीरिक विकास होता है। इसके साथ वजन बढ़ता है उनमें चमक रहती है और पशु समय से हीट पर आता है, जिससे वह सही समय पर ग्याभिन होता है।"

डॉ सतीश आगे बताते हैं, "पेट में कीड़ों की संख्या जब ज्यादा होती है तो उनका पेट डोलक जैसा हो जाता है। अगर उस समय भी पशुओं को दवा नहीं दी गई तो उस पशु की मौत हो जाती है। ज्यादातर पशुपालक जब पशु की स्थिति खराब हो जाती है तभी अस्पताल लेकर आते है। ऐसा बिल्कुल न करें। पेट के कीड़ें की दवा ही इसका सही उपचार है। अगर नियमित रूप से बच्चों को सात से आठ महीने तक 15-15 दिन के अंतराल पर पेट के कीड़ें की दवा दी है तो बच्चे ने मां का दूध पीया है तो वो बछिया 9 से 10 महीने में ग्याभिन हो जाती है।"

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जानें पशुओं के पेट में कीड़ें के प्रकार

पशुओं के शरीर के अन्दर पाये जाने वाले परजीवी कृमि भौतिक संरचना के आधार पर दो प्रकार के होते हैं पहला चपटे व पत्ती के आकार के जिन्हें हम पर्ण कृमि एवं फीता कृमि कहते हैं दूसरे गोल कृमि जो आकार में लम्बे गोल बेलनाकार होते हैं। इसके अलावा भी पशुओं में कई प्रकार के कीड़ें पाए जाते है।

पर्ण कृमि

यह परजीवी पत्ती के आकार की संरचना के होते है इसलिए इन्हें पर्ण कृमि कहते हैं। यह कृमि छोटे बच्चों में ज्यादा होते है। ये कीड़े पशुओं में होने के 15 दिन बाद लक्षण दिखते है। इसमें पशु चारा नहीं खाता है। उसकी आंखों से पानी गिरने लगता है पशु सुस्त हो जाता है। खून की कमी होने से पशु कमजोर होता चला जाता है। गोबर भी नहीं करता है।

फीताकृमि कृमि

इस परजीवी का शरीर चपटा होता है। इनका आकार कुछ मिलीमीटर से लेकर अनेक मीटर तक लम्बा हो सकता है इनक चपटे शरीर एवं लम्बे आकार के कारण इन्हें फीता कृमि भी कहा जाता है। यह परजीवी ज्यादातर पशुओं के भोजन नाल में पायें जाते हैं।

गोलकृमि

इन परजीवी का शरीर बेलनाकार होने के कारण इन्हें गोल कृमि कहते हैं। यह प्राय बड़े पशुओं में होता है। उनका पेट गोल होने लगता है। यह परजीवी पशुओं में खून चूसने के कारण अनीमिया, भोजन इस्तेमाल न करने के कारण कमजोरी, फेफड़ों में होने के कारण निमोनिया, आंखों में होने के कारण अन्धापन, आदि कई विभिन्न बीमारियों को बढ़ाता है।

लीवर फ्लूक

यह बीमारी पशुओं में परजीवी (फैसियोला) से होती है। पशु जब नदी तालाबों एवं पोखरों के पास घास चरने जाते है तो उसमे पाये जाने वाले घोघा में सेफैसियोला हीपेटिका नामक कीड़े निकलकर घास की पत्तियों में छिप जाते है। जब पशु इस घास को खाता है तो यह उनके पेट में से लीवर तक चले जाते है। इस रोग से संक्रमित होने के बाद पशुओं के लीवर पर प्रभाव पड़ता है और समय पर उपचार नहीं मिलने पर लीवर फट भी जाता है,जिससे पशु की मौत हो जाती है। इसमें बारिश के बाद पशु को तालाब और पोखरों के किनारे न चरने दें। भूख कम लगना, बदबूदार दस्त होना, दूध उत्पादन में कमी, गले के नीचे सूजन होना इसके लक्षण है।

पशु के पेट में कीड़ें होने के लक्षण

• अगर पशु मिट्टी खाने लगे।

• पशु सुस्त और कमजोर दिखता है।

• मैटमेले रंग के बदबूदार दस्त आते है।

• गोबर में काला खून व कीड़े दिखना।

• पशु के चारा खाते हुए भी शरीर की वृद्धि कम और पेट का बढ़ जाना

• पशु में खून की कमी होना।

• अचानक दूध कम कर देना।

• गर्भधारण में परेशानी।

महत्वपूर्ण बातें

• हर तीन महीने पर पशुओं को पेट के कीड़ें (कृमिनाशन) की दवा दें।

• पशुओं के गोबर की जांच कराने के बाद ही पेट के कीड़ों की दवाई दें। पशु के गोबर को एक छोटी डिब्बी में इकट्ठा करें।

• बीमार और कमजोर पशुओं को पशुचिकित्सक की सलाह लेकर ही कृमिनाशन की दवा दें।

• पशुओं का टीकाकरण करवाने से पहले पशुओं को आंत के कीड़ों की दवाई ज़रूर दे । टीकाकरण के बाद दवा न दें।

• अगर टीकाकरण के बाद दे रहे तो तुरंत न देकर 15 दिन के बाद ही दवा खिलाएं।

• पशुचिकित्सक की सलाह से ही कृमिनाशन की दवा दें।

• बार-बार एक ही कृमिनाशन का न दें। हर तीन महीनें पर अलग-अलग कृमिनाशन का दवा का प्रयोग करें।

• ग्याभिन पशुओं को कृमिनाशन न दें। अगर गर्भावस्था मे कृमिनाशन का प्रयोग कर रहे है तो उसको फेनसेफ आई दें। क्योंकि यह दवा ग्याभिन अवस्था के पशुओं को दी जा सकती है।

• पशुओ को शुद्ध चारा एवं दाना खिलाना चाहिए।

• साफ पानी पिलाए।


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