बीटेक की पढ़ाई छोड़कर ओडीएफ मिशन से जुड़ 22 वर्षीय शिखा बदल रहीं लोगों की सोच

Ajay MishraAjay Mishra   5 Jan 2019 11:05 AM GMT

बीटेक की पढ़ाई छोड़कर ओडीएफ मिशन से जुड़ 22 वर्षीय शिखा बदल रहीं लोगों की सोच

कानपुर। ''ऐसी पढ़ाई या नौकरी से क्या फायदा जो दूसरों की मदद न कर पाए। ऐसी पढ़ाई मेरे लिए तो बेकार है। लोगों की सोच बदलकर हजारों गांव को खुले में शौच से मुक्त कराना ही मेरा मकसद है।'' यह कहना है 22 साल की शिखा वर्मा का।

उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के ब्लॉक चौबेपुर के गाँव उदैतपुर की रहने वाली पूर्व प्रधान सियादुलारी की इस 22 साल की बेटी ने बीटेक की पढ़ाई इसलिए छोड़ दी कि उसका गांव से लगाव हो गया।


शिखा वर्मा बताती हैं, ''साल 2016 में मैं बीटेक कर रही थी। छुट्टियों के दिनों में गांव आई तो देखा गांव को गंदगी से दूर करने के लिए शौचालय बनवाने का अभियान चल रहा है। समाजसेवा के हिसाब से मुझे यह अच्छा लगा, इसलिए पढ़ाई छोड़ दी और लोगों को जागरूक करने में लग गई।''

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एक सवाल के जवाब में शिखा बताती हैं, ''पहले तो माता-पिता ने बीटेक पढ़ाई न छोड़ने को कहा लेकिन बाद में उन्होंने मेरी बात मान ली। अब घरवाले मेरा सहयोग करते हैं।'' आगे बताया, ''वर्ष 2010-15 तक मेरी मां ग्राम प्रधान रहीं। उनका भरपूर सहयोग किया। एक बार विकास भवन कानपुर पहुंची तो

वहां सीएलटीएस के तहत कार्यक्रम चल रहा था वह मुझे अच्छा लगा। उसके बाद से जोरशोर से एसबीएम (ग्रामीण) से जुड़ गई। प्रधान उदैतपुर विद्या सागर कहते हैं, ''शिखा बेटी राष्ट्रीय धर्म निभा रही है। कानपुर जनपद में सबसे पहले 12 मई 2016 को मेरा गांव ओडीएफ हुआ था। शिखा अच्छा काम कर रही है। वह शासन की ओर से दूसरे जिलों में स्वच्छता के प्रति लोगों को प्रचार-प्रसार और जागरूक कर रही है।''

''सबसे पहले वर्ष 2016 में अपनी ग्राम पंचायत को खुले में शौच से मुक्त कराया। पहले स्वच्छाग्रही रही और कई गांवों में भी ट्रिगरिंग कर ओडीएफ कराया। अब मैं स्टेट ट्रेनर हूं और यूपी के फतेहपुर, जालौन, शाहजहांपुर, झांसी, कानपुर और कानपुर देहात जिलों में ट्रेनिंग दे चुकी हूं।''
शिखा वर्मा, स्टेट ट्रेनर, एसबीएम-ग्रामीण

पिता किसान, कक्षा आठ पास मां का मिला भरपूर सहयोग

शिखा ने बताया, ''पिता आनंद कुमार हाईस्कूल पास हैं। मेरे पिता दो भाई हैं। उनके बीच में सिर्फ दो बीघा जमीन है। करीब दो बीघा बंटाई पर खेती कर रखी है। गेहूं और राई अधिक होती है। मां सियादुलारी प्रधान रह चुकी हैं। वह कक्षा आठ पास हैं। दो बड़ी बहनों की शादी हो चुकी है। छोटा भाई शिवम का नेवी में सिलेक्शन हो चुका है। परिवार का काफी सपोर्ट रहता है।''

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पहले करते थे कमेंट, अब मांगते हैं नौकरी

स्टेट ट्रेनर शिखा ने बताया, ''जब हम लोग निगरानी समिति और ट्रिगरिंग के तहत गांवों में जाते थे तो तरह-तरह के कमेंट करते थे। उस समय सुन लेते थे। अगर जवाब देती तो बुरा लगता और काम भी नहीं कर पाती, लेकिन अब पूछते हैं कि कहीं जगह तो मेरी बिटिया को भी जोड़ लो।''


छोटा बताकर जब चयन से कर दिया मना

अतीत में खोकर शिखा बताती हैं कि ''करीब दो साल पहले स्टेट से फोन आया और लिखित परीक्षा देने गई तो पास हो गई। बाद में इंटरव्यू के दौरान मनोज शुक्ल सर ने मुझे छोटा बताकर चयन करने से मना कर दिया। मैंने कहा कि मेरी उम्र पर मत जाइए अगर लिखित और इंटरव्यू परीक्षा में पास हूं तो अंक के आधार पर मेरा चयन कर लीजिए। यह सुनकर मुझे बहुत खराब लगा। पर मैंने हिम्मत नहीं हारी। बाद में मैं एक डाक्टर के पास भी गई और उनसे बड़ी होने की दवा भी पूछी। उन डाक्टर ने समझाकर मुझे घर भेज दिया। उस दौरान पंचायती राज विभाग के ही ओमप्रकाश मणि सर ने मनोज सर से कहा, इसके बाद दोनों लोगों के सहयोग से चयन हो सका।''

''बच्चे खुश रहें तो हम लोग भी खुश हैं। अगर परिवार का साथ रहे तो लड़कियां हर क्षेत्र में काम कर आगे निकल सकती हैं। बेटी का मन न लगने से उसने बीटेक की पढ़ाई छोड़ दी और स्वच्छ भारत मिशन से जुड़ गई। हम लोग सपोर्ट करते हैं।''
सियादुलारी, चैबेपुर-कानपुर, (शिखा की मां)

गांव वालों को बता रहीं अधिकार

'गांव कनेक्शन' को शिखा ने बताया कि ''इस साल मैं एमए फाइनल समाजशास्त्र में हूं। साथ ही 'तीसरी सरकार' अभियान में काम कर रही हूं। इसमें बताया जाता है कि परिवार न टूटें। छोटे लड़ाई-झगड़े पुलिस तक न पहुंचे। घर और गांव में ही निपटाए जाएं। पहले परिवार का एक मुखिया होता था। सब लोग उसकी बात मानते थे। इसी तरह अभियान में काम हो रहा है। लोगों को अधिकार के बारे में बताया जा रहा है, वह यह न समझें कि गांवों में हर काम प्रधान ही कराते हैं।''

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