सिंचाई का नया तरीका: ग्लूकोज की खाली बोतलें भर सकती हैं किसान की खाली जेब

सिंचाई का नया तरीका: ग्लूकोज की खाली बोतलें भर सकती हैं किसान की खाली जेबछोटे किसानों के लिए कारगर है ग्लूकोज की बोतलों से सिंचाई का तरीका। 

झाबुआ (मध्य प्रदेश)। ग्लूकोस की बोतल का नाम सुनते ही ज़ेहन में अस्पताल का बेड नजर आता है। लेकिन कभी आप ने सुना है कि खेतों में फसल को ग्लूकोज की बोतल चढ़ाई जा रही है। शायद नहीं, लेकिन ये सत्य है। मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के एक किसान ने सिंचाई के लिए कम पानी का ऐसा हल खोजा कि इसे जानकर आपको हैरत हो।

मध्य प्रदेश का झाबुआ जिला आदिवासी बाहुल्य पिछड़ा क्षेत्र है। यहां लहराती ऊबड़-खाबड़ भूमि, खंडित जोत, वर्षा आधारित खेती, सतही और क्षरीय मिट्टी है, जिसके चलते उत्पादन कम होता है। किसान अक्सर नुकसान उठाते हैं। जिले में सिंचाई के बहुत अच्छे इंतजाम नहीं है। किसानों को बरसात के पानी पर भी ज्यादा निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन इसी झाबुआ जिले के निवासी रमेश बारिया (58 वर्ष) नाम के एक किसान ने इस समस्या का बहुत ही नायाब तरीका खोज निकाला। तरीका भी ऐसा कि खर्चा नाम मात्र का।

रमेश बताते हैं, "कई वर्षों से देरी से आने वाले मानसून ने किसानों के दिल की धड़कने बढ़ी दी थीं। बड़े किसान और टीवी-अखबारों में ड्रिप इरीगेशन यानी बूंद-बूंद सिंचाई की बाते कर रहे थे। इसमें फायदा भी दिख रहा था लेकिन मेरे पास इसके लिए पैसे नहीं थे।” वो आगे बताते हैं,

"इस बीच मेरी मुलाकात कुछ कृषि वैज्ञानिकों से हुई। वैज्ञानिकों ने मेरे समस्या सुनी और उन्होंने आइडिया दिया कि ग्लूकोज की बेकार बोतलों में पानी भरकर फसल को पानी दें। इससे कम पानी में उनका काम हो जाएगा और लागत भी ना के बराबर आएगी। बस फिर क्या था। मैंने छह किलो ग्लूकोज की बेकार बोतलें 20 रुपए प्रति किलो के हिसाब से खरीदीं। जो कुल 350 बोतलें थीं।"

लेकिन अब समस्या इन बोलतों में पानी भरने की थी। इतने मजदूर लगाना और भी खर्चीला सौदा था। ऐसे में रमेश की जुगत फिर काम आई। उन्होंने परिवार को ये जिम्मेदारी दी। वो फोन पर बताते हैं, "फिर मैंने अपने बच्चों को जिम्मेदारी थी की वो रोजाना स्कूल जाने से पहले सुबह-सुबह इन बोतलों में पानी भरकर जाएं।"

सिंचाई के नए तरीके इस्तेमाल के लिए रमेश बारिया को कई सम्मान भी मिल चुके हैं। फोटो साभार

इस तरह रमेश ने करीब सवा बीघा खेत में कद्दू और करेले की फसल को पानी दिया और देरी से आए मानसून के नुकसान के असर उनकी फसल का काफी कम हुआ था। रमेश के पास सवा बीघा ही खेती है लेकिन अपनी मेहनत और सूझबूझ के चलते अच्छी कमाई करते हैं। पहली साल कद्दू और करेले से उन्हें 15000 से ज्चादा की आमदनी हुई थी।

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर इस जुगाड़ को सही ढंग से इस्तेमाल किया जाता है तो प्रति हेक्टेयर प्रति सीजन प्रति फसल डेढ़ से पौने दो लाख रुपए का लाख कमाया जा सकता है। रमेश को इस नायाब तरीके को खोज निकालने के लिए कई सम्मान मिल चुके हैं। उनकी इस उपलब्धि के सम्मान में रमेश बारिया को जिला प्रशासन और कृषि मंत्री, मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रशंसा प्रमाण पत्र से सम्मानित किया गया।

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