ये बच्चे कबाड़ की चीजों से बना रहे उपयोगी सामान, कर रहे जरूरतमंदों की मदद

ये बच्चे कबाड़ की चीजों से बना रहे उपयोगी सामान, कर रहे जरूरतमंदों की मददधर्मेन्द्र कुमार पढ़ाई के साथ बच्चों को बना रहे हुनरमंद 

अगर आपके घर में पुराने कपड़े, खिलौने, प्लास्टिक के डिब्बे, कोल्डड्रिंक की बोतलें, पुराने बर्तन, कापी-किताबें जैसे कई सामान घर के कबाड़ में पड़े हैं तो आप उन्हें इस बस्ती के बच्चों तक पहुंचा दें। आपके इतने सहयोग से आपके बेकार पड़े सामान से न सिर्फ कई जरूरतमंदों की मदद हो पाएगी बल्कि इन गरीब बच्चों की पढ़ाई भी पूरी होगी।

जो वस्तुएं हमारे और आपके लिए पुरानी या बेकार हैं उसे इस बस्ती के बच्चे उपयोगी सामान बनाकर उन्हें जरूरतमंदों तक पहुंचाते हैं। एक गैर सरकारी संस्था की मदद से ये छोटे बच्चे अपने इस हुनर से न सिर्फ गरीबों की मदद कर पा रहे हैं बल्कि सीखने के दौरान बनाए सामान को कई हजार रुपए में बेचकर अपनी पढ़ाई भी पूरी कर रहे हैं।

इरम सिद्द्द्की (15 वर्ष) ने बड़े ही उत्साह के साथ कहा, “हमारे लिए बाजार से ट्वायलेट क्लीनर खरीदना बड़ा मुश्किल है क्योंकि हमारे पास ज्यादा पैसे नहीं है। हम अपने घर के सब्जी के छिलके से एक ऐसा क्लीनर बना लेते हैं जिससे किचन से लेकर ट्वायलेट तक साफ़ हो जाता है। इस क्लीनर का हम तो इस्तेमाल करते ही है, बाजार में एक लीटर 10 रुपए का बेच भी देते हैं।”

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इरम सिद्दकी पढ़ाई के साथ जरूरतमंदों की करती है मदद

पुराने सामान को इतनी मेहनत करके नया क्यों बनाती हो इस सवाल के जबाब में इरम ने कहा, “हम गरीब परिवार में भले ही जन्मे हैं पर हमें दूसरों की मदद करना अच्छा लगता है। हम अपने आस-पास देखते हैं कई बच्चों के पास पढ़ने के लिए कापी-किताब और बैग नहीं होता है, पहनने के लिए चप्पल नहीं होती, ठंड बचाने के लिए कपड़े नहीं होते हैं, खेलने के खिलौने नहीं होते।” हम इसलिए पुराने सामान से मेहनत करके उसे काम का सामान बनाते हैं जिससे इन लोगों की हम मदद कर पायें।”

इरम की तरह इस बस्ती के सैकड़ों बच्चे कुछ ऐसा ही सोचते हैं। अपने इस प्रयास से ये बच्चे अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपनी तरह हजारों बच्चों की मदद करने में सक्षम हैं। इरम सिद्द्द्की कानपुर नगर के जूही परमपुरवा मलिन बस्ती की रहने वाली हैं। कहने को तो ये बस्ती जिला मुख्यालय से महज चार किलोमीटर दूर है पर इस बस्ती के और आसपास की कई बस्तियों के परिवार सुविधाओं से पूरी तरह से वंचित हैं।

परमपुरवा, तोतापुरवा, जालपा नगर, जूही खुर्द बस्तियों में रहने वाले ज्यादातर परिवार दिहाड़ी मजदूरी करके अपने बच्चों का भरण-पोषण करते हैं। इरम भी उन्हीं वंचित परिवारों में से एक परिवार की बेटी है। चार बहनों में इरम सबसे बड़ी है इनके पापा दिहाड़ी मजदूरी करके पूरे परिवार का खर्चा चलाते हैं। पढ़ने में होशियार इरम में तमाम हुनर भी हैं। आठवीं में पढ़ने वाली इरम में आत्मविश्वास है कि वो पढ़ लिखकर एक दिन गवर्नर जरुर बनेगी।

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क्लीनर बना रहे ये बच्चे हैं खुश

आपका बेकार सामान जरूरतमंदों का जीवन करे गुलजार की सोच रखने वाली एक संस्था ने इस अभियान का नाम ‘मोक्ष’ रखा है। कानपुर, महाराजगंज, गोरखपुर जिले से सोशल मीडिया के जरिए पुराना सामान इकट्ठा करने की मुहिम चल रही है। पुराने सामान से ये बच्चे राखी, बैग, गुलदस्ते, पेन स्टेण्ड, कूड़ादान, लैम्प, बैग, क्लीनर, सजावट का सामान, गमले, हर उम्र के लिए कपड़े, खाद जैसे कई तरह के सामान बनाने का हुनर रखते हैं।

पिछले तीन वर्षों में मोक्ष नाम के इस अभियान ने अबतक कानपुर के साथ-साथ यूपी के कई जिलों में हजारों जरूरतमंदों की मदद की गयी है। वर्तमान समय में इस अभियान के पास सात हजार से ज्यादा परिवारों को मदद करने का सामान उपलभ्ध है। छठी कक्षा में पढ़ने वाले हैदर ने बताया, “हम हर दिन अपनी पढ़ाई करते हैं, रविवार या छुट्टी के दिन आस पास की बस्ती के सारे बच्चे मिलकर इस तरह का सामान बनाना सीखते हैं। हम अपने आस पास कोई भी पुराना सामान देखते हैं तो उसे संभाल कर लेते हैं जब मौका मिलता है तो उसे काम का सामान बना देते हैं।”

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कुछ इस तरह से सजावट का सामान बनाते हैं ये बच्चे

कानपुर नगर में झुग्गी-झोपड़ी और मलिन बस्ती में काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था सम्राट अशोक मानव कल्याण समिति (साहवेस) की नींव परमपुरवा बस्ती में ही रहने वाले धर्मेन्द्र कुमार (40 वर्ष) ने लगभग 15 साल पहले रखी थी।” धर्मेन्द्र बस्ती की तरफ पक्के बने घरों को देखते हुए कहते हैं, “आज जो इस बस्ती में कुछ पक्के मकान दिखाई दे रहे हैं, आज से कुछ साल पहले तक यहां सिर्फ टट्टर लगे थे। मेरा खुद का बचपन यहां बने एक मन्दिर में गुजरा है। पिता जी ने पान की दुकान से जैसे-तैसे हम चार भाई-बहनों को पाला। मैंने यहां की गरीबी को बहुत करीब से न सिर्फ देखा है बल्कि जिया भी है।”

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संस्था के संस्थापक धर्मेन्द्र कुमार ने बताया घर में ही बन जाता है क्लीनर

इतना बताते-बताते भावुक हुए ने धर्मेन्द्र ने कहा, “पढ़ाई के समय ही ठान लिया था कि मुझे नौकरी नहीं करनी है, इस बस्ती के लिए ही कुछ करना चाहता था, जिससे यहां के बच्चों को पेटभर खाना मिल सके, शिक्षा मिल सके, पहनने के जरुरी कपड़े मिल सकें। इसी सोच के साथ इस संस्था की शुरुआत की थी। मोक्ष अभियान से पिछले साल शादी के कार्ड से बने बैग और क्लीनर को लगभग 40 हजार रुपए में बेचा गया था। कई जिलों में कई संस्थाओं को पुराने सामान से उपयोगी सामान कैसे बनाया जाता है इसका प्रशिक्षण भी देता हूँ। इससे जो भी पैसा मिलता है उससे आसपास बस्ती के बच्चों को शिक्षा में मदद की जाती है।”

धर्मेन्द्र के प्रयास से अब तक शिक्षा से वंचित 10 हजार से ज्यादा बच्चों को शिक्षा मिल चुकी है। सैकड़ों बच्चों को शिक्षा के साथ हुनरमंद बनाया जा रहा है जिससे ये आगे चलकर अपना रोजगार शुरु कर सकें और हजारों जरूरतमंदों की मदद कर सकें।

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ये बच्चे न सिर्फ पढ़ाई कर रहे बल्कि इतनी कम उम्र में जरूरतमंदों की मदद भी कर रहे हैं

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