बेंगलुरू में बनाई गई है वैदिक गोशाला, लागत है कम फायदा है ज्यादा

बेंगलुरू में बनाई गई है वैदिक गोशाला, लागत है कम फायदा है ज्यादागौशाला का एक दृश्य।

हमारे देश में धीरे-धीरे सब कुछ हाइटेक होता जा रहा है, गोशालाएं भी, लेकिन मुंबई के रहने वाले सौरभ भट्ट ने बेंगलुरू के मालूर गाँव में एक ऐसी गोशाला बनाई है जो पूरी तरह से वैदिक है। इस गोशाला को बनाने में किसी भी तरह की स्टील और एस्वेस्टो शीट का इस्तेमाल नहीं किया गया बल्कि ये गोशाला बांस का इस्तेमाल करके बनाई गई है।

''आजकल के युवाओं को लगता है कि देसी गाय पालना घाटे का सौदा है। साथ ही उनको पालने में भी अच्छा खासा खर्चा आता है जिससे वे गायों को नहीं पालते। उनके लिए हमने एक रोल मॉडल बनाया है। ये गोशाला बहुत कम खर्च में बन जाती है'', ये कहना है सौरभ भट्ट का।

वह बताते हैं कि इस गोशाला को बनाने में स्टील और एस्बेस्टॉस शीट का इस्तेमाल नहीं किया गया है। गोशाला बनाने में हमने बांस का इस्तेमाल किया है। इसे बनाने के लिए ट्रीटेड बांस का इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए बांस को गर्म पानी में बोरिक पाउडर मिलाकर उबाला है और काजू इत्यादि के तेलों से पोलिश की गई है।

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इसमें से सिलिका और इसके मीठेपन को निकाल दिया है। इससे बांस की उम्र 55 - 60 साल हो गई है। बांस में जो मीठापन होता है उसकी वजह से इसमें कीड़े लगते हैं लेकिन जब इसका मीठापन निकाल दिया जाता है तो कीड़े लगने की संभावना भी कम हो जाती है। बांस की खास बात ये होती है कि जब ये पानी में भीगता है तो इसकी मज़बूती बढ़ती है, यानि बारिश में भीगने से भी इनपर कोई बुरा असर नहीं पड़ता।

इसकी छत बनाने के लिए पेपर पल्प की शीट्स (onduliene)का इस्तेमाल किया गया है, जिनका वज़न काफी कम होता है। इसमें एक तय तापमान रहता है जो गायों के शरीर के तापमान से उपयुक्त रहता है। सौरभ बताते हैं, '' बांसों को नट बोल्ट के ज़रिए जोड़ा गया है, जिससे अगर कभी गोशाला को विस्तार देना हो या उसकी डिज़ाइन बदलनी हो तो नट बोल्ट को खोलकर उन्हीं बासों का इस्तेमाल दोबारा किया जा सकता है।

तनाव में नहीं रहती हैं गाय

सौरभ बताते हैं कि गंदगी में रहने से गायों को भी तनाव हो जाता है, इसलिए इस गोशाला में गायों की साफ - सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है। इसके लिए गोशाला की ज़मीन को 1- 2 डिग्री की ढलान में बनाया गया है और बीच में एक नाली है जिससे सारा गोमूत्र नाली के ज़रिए एक जगह इकट्ठा हो जाता है। गोबर को भी पूरी सफाई से इकट्ठा कर लिया जाता है।

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वह बताते हैं कि गोशाला की सफाई के लिए गाड़ियों को धोने वाले कम्प्रेसर का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें पानी का कम और हवा का ज़्यादा प्रयोग होता है जिससे काफी कम पानी और समय में पूरी गोशाला साफ हो जाती है। जो पानी सफाई में इस्तेमाल होता है उसे भी एक जगह इकट्ठा कर लिया जाता है और उसे रिसाइकिल करके दोबारा उसका इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा कम्प्रेसर का इस्तेमाल करने की वजह से सिर्फ एक या दो लोग ही पूरी गोशाला की सफाई कर लेते हैं।

इतनी आई है लागत

25X80 फीट की गोशाला को बनाने में लगभग 4.5 लाख का खर्च आया है। इस गोशाला में 40 से 50 गाय बांधी जा सकती हैं। अगर इतनी जगह में स्टील और एस्बेस्टॉस की शीट का इस्तेमाल किया जाता तो लगभग 9 लाख का खर्च आता यानि पारंपरिक तरीके के बजाय अगर वैदिक तरीके से गोशाला बनाई जाए तो आधा खर्च ही होगा। वह बताते हैं कि यहां गायों को खूंटे से नहीं बांधा जाएगा, वे सब खुली रहेंगी।

केंद्र सरकार के फैसले का हुआ फायदा

सौरभ बताते हैं कि लगभग 2 महीने पहले केंद्र सरकार ने बांस को पेड़ की श्रेणी से हटाकर इसे घास की श्रेणी में डाल दिया, इससे काफी फायदा हुआ। पहले बांस को काटने पर प्रतिबंध था लेकिन घास की श्रेणी में आने के बाद इस पर लगा प्रतिबंध हट गया। पूर्वोत्तर राज्यों में पहले भी बांस काटने पर प्रतिबंध नहीं था इसलिए ज्यादातर लोग बांस वहीं से लाते थे लेकिन वहां से यहां तक लाने में ट्रांसपोर्टेशन का काफी पैसा खर्च हो जाता था लेकिन अब जब यहां भी ये प्रतिबंध हट गया है तो हमें बाहर से बांस लाने की ज़रूरत भी नहीं है।

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ट्रेनिंग भी देते हैं सौरभ

सौरभ भट्ट बताते हैं कि वह इस तरह की गोशाला को बनाने के लिए अपनी गोशाला में ट्रेनिंग भी देते हैं और इसके लिए कोई फीस भी नहीं लेते। वह कहते हैं, ‘’मेरा उद्देश्य इस काम से पैसा कमाना नहीं है, मैं काउ टूरिज्म यानि गाय पर्यटन को पूरे देश में विकसित करना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि आजकल के युवा गाय के महत्व को समझें और इससे जुड़ें इसलिए इसके बारे में मुफ्त में ही लोगों को सिखाता हूं, हां बस ये अपेक्षा रहती है कि जिसने मुझसे सीखा है वो चार और लोगों को सिखाए, जिससे ज्यादा से ज्यादो लोगों का फायदा हो सके।‘’

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