निर्विरोध चुनी गई महिला सरपंच की कहानी: आठवीं के बाद छूट गई थी पढ़ाई, अब बेटी के साथ कर रहीं हैं बीएड

कुसुम लोधी मध्य प्रदेश की सिरसौदा ग्राम पंचायत की निर्विरोध सरपंच चुनी गई हैं। शादी होने की वजह से उन्होंने आठवीं कक्षा में स्कूल छोड़ दिया था। लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की, और अब अपनी बेटी के साथ बीएड कर रही हैं। कुसुम अपनी 'गुलाबी पंचायत' में बदलाव की एक नई बयार चलाना चाहती हैं।

Satish MalviyaSatish Malviya   28 Jun 2022 12:43 PM GMT

निर्विरोध चुनी गई महिला सरपंच की कहानी: आठवीं के बाद छूट गई थी पढ़ाई, अब बेटी के साथ कर रहीं हैं बीएड

मध्य प्रदेश में पंचायत चुनाव की घोषणा 25 मई को की गई थी। घोषणा से पहले राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि जिन पंचायतों ने महिलाओं को अपने सरपंच और पंच के रूप में पूरी तरह से निर्विरोध चुना है, उन्हें “पिंक पंचायत” कहा जाएगा। फोटो: सतीश मालवीय

सिरसौदा (रायसेन), मध्य प्रदेश। जल्दी शादी होने के कारण कुसुम लोधी को आठवीं कक्षा के बाद ही स्कूल छोड़ना पड़ा। शादी के लगभग 18 साल बाद, उन्होंने अपनी बेटी के साथ 10वीं परीक्षा दी, फिर अपनी उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी की और इस समय बेटी के साथ बीएड कर रही हैं।

और अब, रायसेन जिले के सिरसौदा गाँव निवासी 39 वर्षीय महिला को सांची ब्लॉक के सिरसौदा पंचायत का सरपंच निर्विरोध चुना गया है। उनकी पंचायत में 17 अन्य निर्वाचित महिला पंच भी हैं।

लोधी ने गाँव कनेक्शन को बताया, "मैं जानती हूं कि पंचायत कैसे काम करती है। मुझे पता है कि नई सरकारी योजनाओं के बारे में कैसे पता चलता है और उनका पालन कैसे किया जाता है और मैं यह भी जानती हूं कि अधिकारियों के साथ कैसे व्यवहार करना है, " उन्होंने कहा, "मुझे रबर स्टैंप सरपंच समझने की कोशिश मत करो। मेरा काम, मेरे होने की गवाही देगा।"

कुसुम लोधी सिरसौदा पिंक पंचायत की सरपंच हैं, जिसमें 17 अन्य निर्वाचित महिला पंच भी हैं। फोटो: अरेंजमेंट

सरपंच लोधी अपनी पंचायत में आगे क्या करने वाली हैं इस बारे में उन्होंने बताया, "मैं महिलाओं की स्वयं सहायता समूहों को मजबूत करना चाहती हूं। महिलाओं को सिंलाई का प्रशिक्षण देने और उनमें कंप्यूटर साक्षरता को बढ़ावा देने और एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र खोलने का प्लान है। हम पंचायत के गाँवों को जोड़ने के लिए पक्की सड़कें बनाने की दिशा में भी काम करेंगे।"

मध्य प्रदेश की पिंक पंचायत

मध्य प्रदेश में पंचायत चुनाव की घोषणा 25 मई को की गई थी। घोषणा से पहले राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि जिन पंचायतों ने महिलाओं को अपने सरपंच और पंच के रूप में पूरी तरह से निर्विरोध चुना है, उन्हें "पिंक पंचायत" कहा जाएगा। उन्होंने पिंक पंचायतों के लिए 15 लाख रुपये भी मंजूर किए। प्रदेश में निर्वाचित 750 सरपंचों में से 380 महिलाएं हैं।

कुसुम लोधी सिरसौदा पिंक पंचायत की सरपंच हैं, जिसमें 17 अन्य निर्वाचित महिला पंच भी हैं।

अपनी बेटी के साथ कुसुम लोधी। फोटो: सतीश मालवीय

39 वर्षीय सरपंच ने बताया, "मैं एक ऐसे परिवार से आती हूं जहां मेरी सास और ससुर दोनों ने सरपंच का पद संभाला था और मैंने देखा है कि उन्होंने कैसे मिलकर काम किया है।"

सिरसौदा गाँव के एक बुजुर्ग निवासी बालकृष्ण शास्त्री ने गाँव कनेक्शन को बताया, "हमारी पंचायत में महिला सरपंच के लिए एक सीट आरक्षित है और क्योंकि कुसुम लोधी शिक्षित हैं, इसलिए वह इस पद के लिए सबसे सही थीं। यही कारण है कि गाँवों ने सर्वसम्मति से उन्हें चुना।" उन्होंने बताया, "हमें विश्वास और उम्मीद है कि वह हमारी पंचायत के लिए अच्छी साबित होंगी।"

जंगल में बसे गाँवों को हर मौसम में सड़क की जरूरत है

सिरसौदा पंचायत में चार गाँव शामिल हैं- सिरसौदा, बरखेड़ी, इस्माइलपुरा और भीलटोरा। ये गाँव जंगलों के पास स्थित हैं और यहां पक्की सड़कें नहीं हैं। बरसात के दिनों में इन गांवों के लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

बरखेड़ी के पंच कांता बंजारा ने गाँव कनेक्शन को बताया कि बारिश के दौरान उनका गाँव बाकी दुनिया से कट जाता है। उन्होंने बताया, "वन विभाग हमें मुनासिब सड़कें बनाने की अनुमति नहीं देता है और हमें अपने खेतों के कीचड़ भरे रास्तों को अपना रास्ता बनाना पड़ता है, जब हम अपने गाँव में प्रवेश करते हैं या निकलते हैं, कभी-कभी घुटने तक गहरे कीचड़ से गुजरते हैं।" उन्होंने कहा, "कोई पुल नहीं हैं जो हमें नदियों की धाराओं को पार करने में मदद करेंगे।"


कांता ने आगे बताया कि सड़कों की कमी गाँव के निवासियों के लिए एक बड़ी चुनौती है। हमारे पुरुष रोजी रोटी कमाने के लिए घर छोड़ देते हैं। और गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को जिन्हें चिकित्सा की जरूरत होती है, उन्हें अस्पतालों ले जाना काफी मेहनत का काम होता है। गाँव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और आंगनवाड़ी की तत्काल जरूरत है। कांता के अनुसार, आशा कार्यकर्ता और सहायक नर्स मिडवाइफरी (एएनएम) कार्यकर्ता केवल एक बार ही आ सकते हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि गाँव का स्कूल पांचवीं तक ही है। उन्होंने कहा, "मैं कम से कम आठवीं कक्षा तक लाना चाहती हूं।"

बरखेड़ी की पंच ने निष्कर्ष निकाला, "हम महिलाएं स्वास्थ्य, घर और शिक्षा से संबंधित समस्याओं का खामियाजा भुगतती हैं, और यह हम पर निर्भर करता है कि हम उनसे कैसे निपटें। निर्विरोध निर्वाचित होने से हमें अपनी पंचायत में जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने और अपने गाँवों को प्रगति के रास्ते पर स्थापित करने का अवसर मिला है।"

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